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Krishnasakshi – By Pratyasha Nithin


Excerpts from the book “Krishnasakshi” by Author Pratyasha Nithin

कृष्णदास कानपुर शहर की सीमा पर स्थित पुराने गिरिधर मंदिर में कम से कम पैंतीस साल से पुजारी के रूप में अपने गिरिधारी की सेवा कर रहे थे| सीमा पर स्थित होने के कारण मंदिर में वैसे तो ज्यादा लोग नहीं ही आते थे पर फिर भी इतने सालों से देखते रहने के कारण वो मंदिर आने जाने वाले लोगों की प्रकृति, कुछ पल के उनके व्यवहार से पहचान जाते थे| आने जाने वाले लोग अलग अलग किस्म के होते थे| ऐसे लोग जो मंदिर अपने परिवार के साथ कभी कभार घूमने आ जाते थे, या फिर ऐसे लोग जो अपनी समस्याएं ले कर आते और कृष्णदास से समस्या निवारण के लिए की जा सकने वाली पूजा पाठ के बारे में विचार विमर्श करते, ऐसे लोग भी थे जो कुछ संकल्प ले कर मंदिर में विशेष सेवा करवाते, और ऐसे भी लोग थे जो कहने को तो दर्शन के लिए आते थे पर उनका ध्यान गिरिधर को छोड़कर इधर उधर की बातों में ही रहता था| कृष्णदास ज्यादातर गर्भगुड़ी में पूजा अर्चना में ही अपना समय बिताते| आने जाने वालों को तीर्थ और प्रसाद देने जितना ही उनका लोगों के साथ संपर्क रहता था| ज्यादा से ज्यादा कभी कभार लोगों की समस्याएं सुनकर उनको अपनी समझ के अनुसार वो कुछ साधना सम्बन्धी सलाह दे दिया करते थे| इससे ज्यादा कौन कैसा है, अपने जीवन में क्या करता है, या कैसे रहता है, इस सब को जानने की उनकी तनिक भी अभिलाषा नहीं थी|

पर आज बात कुछ अलग थी| आज उनकी जिज्ञासा समय के साथ बढती ही जा रही थी| शाम के सात बज चुके थे और अब उनसे रहा नहीं जा रहा था| वैसे तो दोपहर के समय कृष्णदास अपने गिरिधारी को सुला कर खुद थोड़ी देर आराम कर लिया करते थे; पर आज, आज ना तो उनके गिरिधारी को आराम मिला था और ना ही उन्हें| मंदिर के एक कोने में बैठी एक पच्चीस या छब्बीस साल की लड़की इसका कारण थी| कृष्णदास ने इतने सालों में पहली बार किसी को इतनी देर मंदिर में एकटक गिरिधारी पर नजर गड़ाए बैठे देखा था| वो लड़की सुबह लगभग ग्यारह बजे की आई थी और आते ही एक कोने में बैठ गयी थी| तब से उसकी नजर गिरिधारी पर से हटी ही नहीं थी| आज तो मंदिर में कुछ लोग भी आये थे, इस कारण थोड़ी देर चहल पहल भी हुई थी, घंटे भी बजे, बच्चे चिल्लाये, पर उस लड़की की नजर नहीं झपकी| क्या वो समाधि में थी? पर ऐसा कैसे हो सकता था? आज तक खुद कृष्णदास कभी ऐसी समाधि में नहीं गए थे| पर लड़की नाटक भी करती नहीं लग रही थी| नाटक करने वाले का ध्यान इतनी देर तक ना भटके, ऐसा तो हो ही नहीं सकता था| और फिर नाटक करने का कोई कारण भी तो नहीं था| उस लड़की में जरूर कुछ तो बात थी| उसके ध्यान ने कृष्णदास को मजबूर कर दिया था कि वो दोपहर को गर्भगुड़ी के द्वार बंद ना करें|

मंदिर आये हुए एक दर्शनार्थी को तीर्थ दे कर विदा करने के बाद कृष्णदास तीर्थ का लोटा ले कर उस लड़की के पास आये| लड़की का रंग साँवला और आँखें बड़ी थीं| आँखें और बाल गहरे भूरे रंग के थे| उसका चेहरा गोल और गर्दन थोड़ी छोटी थी| उसकी लम्बाई भी थोड़ा कम ही थी| लड़की ने धानी रंग की कमीज और पीले रंग का सलवार पहना था| लड़की के माथे का सिन्दूर काफी था जानने के लिए कि वो शादीशुदा था| पास आने पर कृष्णदास को लड़की के चेहरे और हाथों में लगी पुरानी हुई कुछ चोटों के निशान भी दिखे| उसके पीछे एक काले रंग का बैग पड़ा था| ना जाने किस विपत्ति से वो गुजर रही थी| पर जो भी हो, अब तो वह गिरिधारी की शरण में थी और गिरिधारी अपनी शरण आये लोगों का हमेशा ध्यान रखते हैं, ऐसा सोचकर कृष्णदास के चेहरे पर एक मुस्कान छा गयी|

कृष्णदास ने लड़की को बिटिया कह कर आवाज दी, पर लड़की का ध्यान नहीं हटा| उनका बिल्कुल मन नहीं था कि ऐसे में वह उसे परेशान करें, पर बाहर अँधेरा होने को आया था और मंदिर शहर के बाहर था| ऐसे में लड़की को घर जाने में दिक्कत हो सकती थी| साथ ही वह घंटों से भूखी प्यासी बैठी हुई थी| कृष्णदास ने फिर से आवाज दी, और जब इस बार भी लड़की का ध्यान उन पर नहीं आया तब उन्होंने लड़की के सर पर हाथ रखते हुए उसे बुलाया “बिटिया, सुनो, तुम ठीक तो हो?”

About the Author:

प्रत्याशा नितिन

प्रत्याशा नितिन कर्नाटक प्रांत के मैसूर नगर की निवासी हैं | वह एक लेखिका एवं चित्रकार हैं | वो धर्म सम्बन्धी कहानियां लिखना पसंद करती हैं | उनका उद्देश्य ऐसी कहानियां लिखने का है जो लोगों को अपनी जड़ों से वापस जोड़ सकें एवं उनके मन में भक्ति भाव जागृत कर सकें | उनकी हिंदी एवं अंग्रेजी में लिखी कहानियां प्रज्ञाता नामक ऑनलाइन पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं | साथ ही उन्होंने दो लघुकथाएँ “मायापाश” और “झूठ की परत” भी भी लिखी हैं|

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