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हिन्दू मंदिरों में शिव- द्वितीय भाग


प्रथम भाग में हमने शिव मूर्तियों का प्राथमिक वर्गीकरण लिंग तथा रूप प्रतिमा के तौर पर किया है किन्तु एक प्रतिमा ऐसी है जिसे आप लिंग भी कह सकते हैं और रूप भी, क्योंकि यह प्रतिमा इन दोनों का समन्वय है। चलिए जानने का प्रयास करते हैं कि यह प्रतिमा कैसे लिंग तथा रूप प्रतिमाओं को जोड़ती है।

लिंगोद्भवमूर्ति में ईशान कल्प की शुरुआत में भगवान ब्रह्मा-विष्णु विवाद के दौरान भगवान शिव की उत्पत्ति का निरूपण किया जाता है। एक समय जब श्री विष्णु जल की गहराईयों में विचरण कर रहे थे तभी उनके समीप एक तेज रौशनी हुई और उससे चतुर्मुख ब्रह्माजी प्रकट हुए। श्री ब्रह्मा ने अपने समक्ष विष्णु को देखा और अपना परिचय देते हुए स्वयं को ब्रह्मांड के निर्माता के रूप में प्रस्तुत किया और श्री विष्णु से उनकी पहचान पूछी। विष्णु ने उत्तर में अपना परिचय देते हुए स्वयं को ब्रह्मांड का वास्तुकार बताया। दोनों ही देवता स्वयं को सृष्टि का निर्माता मानते थे और इसी कारण यह चर्चा विवादों में परिवर्तित होते देर ना लगी।

विवाद उग्र रूप लेता जा रहा था। दोनों ही देव पराजय स्वीकारने को तैयार नहीं थे। विवाद के चरम पर सैंकड़ों ज्वालाओं से धधकता एक विशाल अनंत स्तम्भ प्रकट हुआ। ब्रह्मा तथा विष्णु इस अद्भुत दृश्य को देख कर विवाद भूल गए और इस अग्नि स्तम्भ का निरीक्षण करने लगे। दोनों ने तय किया कि जो भी इस विशाल स्तम्भ का छोर ढूंढ लेगा वही विजेता होगा और ऐसा करने में असमर्थ को पराजय स्वीकारनी होगी। श्री ब्रह्मा ने हंस का रूप धारण किया और स्तम्भ के उर्ध्व दिशा में प्रयाण किया। श्री विष्णु वराह का रूप धर के स्तम्भ का छोर ढूंढने के लिए पाताल की ओर चले गए।

इस ज्वलंत स्तंभ का रहस्य खोजने के दोनों देवताओं के प्रयास निरर्थक साबित हुए। दोनों में से कोई भी इसका छोर नहीं ढूंढ पाया। उन्हें पता चल चुका था कि निश्चित रूप से रहस्यमयी स्तम्भ उन दोनों के अनुमान से अधिक ही कुछ था जिसका परिमाण निकालने में दोनों ही असमर्थ रहे थे। इस प्रकार आश्चर्य से भरे वह दोनों अग्नि के इस स्तंभ की प्रशंसा करने लगे और उससे से अपनी पहचान बताने के हेतु प्रार्थना करने लगे।

उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर इस उग्र स्तम्भ-लिंग से सहस्र भुजाओं के साथ सूर्य, चँद्र तथा अग्नि को अपने नेत्रों में समाहित करते शिव प्रकट हुए। त्रिशूल धारण किए, सर्पों का यज्ञोपवीत पहने हुए शिव ने मेघगर्जना और मृदंग के नाद समान ध्वनि से ब्रह्मा और विष्णु को संबोधित करते हुए कहा “हम तीनों वास्तव में एक ही तत्त्व के तीन रूप हैं लेकिन अब ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के तीन पहलुओं में विभाजित हो गए हैं। मेरे दक्षिण भाग से ब्रह्मा और वाम भाग से विष्णु का उद्भव हुआ है।” भविष्यवाणी करते हुए उन्होने कहा कि “आने वाले समय में ब्रह्मा विष्णु से पैदा होंगे और मैं स्वयं विष्णु के क्रोधित माथे से जन्म लूंगा।’’ इस प्रकार घोषणा करते हुए महेश्वर अन्तर्द्धान हो गए। ब्रह्मा और विष्णु ने शिव के इस लिंग स्वरुप की स्तुति की और इस तरह से संसार में लिंग-पूजा का आरम्भ हुआ।

अग्नि-स्तंभ के शीर्ष की खोज करते हुए ब्रह्मा ने केतकी के पुष्पदल से उसके वहां होने की वजह पूछी, इस पर पुष्पदल ने उत्तर दिया कि वह महेश्वर के मस्तक से फिसल कर वहां गिरा था। इस संवाद के पश्चात् ब्रह्मा जी ने विष्णु से झूठ बोलते हुए कहा कि उन्होंने महेश्वर का मस्तक ढूंढ लिया था और केतकी का पुष्प इस बात का साक्षी है। इस असत्य भाषण की वजह से आज भी श्रापित ब्रह्माजी की देवालयों में पूजा नहीं होती।

मंदिरों में लिंगोद्भवमूर्ति:

यह प्रसंग दक्षिण भारतीय मंदिरों (मुख्यतः तमिल मंदिरों) में शिल्प और चित्र के माध्यम से दर्शाया जाता है। दक्षिण भारत के आगम ग्रंथों में इस प्रतिमा के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। एक ओर शिल्परत्न के अनुसार त्रिशूलधारी शिव द्विभुज होने चाहिए तो दूसरी ओर कारण आगम के अनुसार चतुर्भुज होने चाहिए। उर्ध्व हस्तों में परशु और काला हिरन तथा शेष दो हाथ अभयमुद्रा और वरदमुद्रा में होने चाहिए। अंशुमान आगम के अनुसार चँद्रशेखर के रूप में भगवान शिव को लिंग के अग्रभाग पर उकेरा जाना चाहिए। चलिए कुछ मंदिरों की यात्रा करते हैं और इस प्रतिमा की बारीकियों का अवलोकन करते हैं।

आठवीं शताब्दी में पल्लव राजा राजसिम्हा द्वारा निर्मित कांचीपुरम के कैलाशनाथार मंदिर की लिंगोद्भवमूर्ति शास्त्र में वर्णित निर्देश के बहुत करीब है। चँद्रशेखर के रूप में भगवान शिव की आठ भुजाएँ हैं जिनमें अभय-मुद्रा तथा कट्यावलम्बित मुद्रा भी समाविष्ट है। बाकी भुजाओं में परशु, शूल तथा अक्षय माला है। चतुर्भुज विष्णु को वराहरूप में दिखाया गया है और यह दो हाथों से भूमि प्रवेश का प्रयास करते हैं और बाकी दो भुजाओं में शंख और चक्र धारण किये हैं। श्री ब्रह्मा को हंस के रूप में आकाश गमन करते दिखाया गया है। प्रशस्ति मुद्रा में चतुर्भुज ब्रह्मा और विष्णु की आकृतियाँ लिंग के दोनों ओर स्थित हैं।

तंजावुर तथा गंगईकोंडा के दोनों बृहदेश्वर मंदिर और दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर चोल स्थापत्य का उत्कृष्ट उदहारण है। इन मंदिरों में शिव को चतुर्भुज दिखाया गया है। शिल्प का बाकी का निरूपण कैलाशनाथार मंदिर जैसा ही है।

रानी लोकमहादेवी ने अपने पति के विजयोत्सव हेतु पट्टाडक्कल के विरुपाक्ष मंदिर का निर्माण कराया था। यहाँ लिंगोद्भव शिल्प में विष्णु तथा ब्रह्मा के उपशिल्पों का अभाव है।

अरुणाचलेश्वर का तिरुवनमलै शिव के अग्नि तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है तो इस परिसर में लिंगोद्भव का शिल्प होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ठीक वैसे ही त्र्यंबकेश्वर का ज्योतिर्लिंग भी महत्वपूर्ण है। यहीं पर लिंगोद्भव का प्रसंग घटित हुआ था और इस स्थान पर शिव द्वारा ब्रह्मा को श्रापित किये जाने के पश्चात क्रोधित ब्रह्मा ने भी शिव को श्राप दिया था। इसी वजह से यहाँ शिवलिंग धरातल से नीचे है।

एल्लोरा के राष्ट्रकूट स्थापत्य दशावतार गुफा में इस शिल्प का चित्रण इतना वास्तविक है की अग्निस्तम्भ से ज्वालाएं भी स्पष्ट देखी जा सकतीं हैं। इन मंदिरों के अतिरिक्त तिरुमय गुफा मंदिर तथा आंध्र प्रदेश के आलमपुर में तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित स्वर्ग मंदिर भी दर्शनीय है।

यदि आप सोचते हैं कि लिंगोद्भव का शिल्प उत्तर भारत में नहीं है तो आप गलत हैं। क्योंकि राजस्थान के सीकर

में दसवीं शताब्दी में निर्मित हर्षनाथ मंदिर में लिंगोद्भव का अनूठा शिल्प प्राप्त किया गया है जो अब अजमेर संग्रहालय की शोभा बढ़ा रहा है।

(इस श्रृंखला का प्रथम भाग)

 


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