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हिन्दू मंदिरों में शिव- भाग -६-जङ्गम लिङ्ग


आमतौर पर भारत के बच्चों का वेकेशन मामा के घर उत्पात करते हुए गुजरता है। मैं भी कोई अपवाद नहीं था। गर्मियों की छुट्टियों में ट्रेन की खिड़कियों से लहलहाते खेतों का आनंद लेते हुए गाँव पहुंचना, रात में माँ (मम्मी की दादी) के पास कहानियां सुनने के लिए बच्चों का जमावड़ा लगना और सुबह देसी घी के साथ मक्के की रोटी का स्वाद लेना। इन सभी अविस्मरणीय क्षणों को मैं हमेशा संजोये रखता हूँ।  

उन दिनों मम्मी की दादी की उम्र करीब अस्सी वर्ष रही होगी। माँ अपने आध्यात्मिक ज्ञान एवं अनुभव से गाँव का मार्गदर्शन करतीं। उनके पास बच्चों से लेकर बूढ़ों तक, पुरुषों से लेकर महिलाओं तक सभी अपनी समस्याएं लिए आते और माँ उनका समाधान करतीं।  

अस्सी वर्ष की आयु में भी दैनिक शिव मंदिर में दर्शन के लिए जाने की उनकी दिनचर्या कभी टूटी हो ऐसा मुझे याद नहीं। जब झुर्रियों वाले हाथों से वे  घर के आँगन में लगे पौधों से पुष्पदल चुनतीं तब मैं भी उनकी सहायता करता। जब वे जल पात्र, बिल्व पत्र लिए शिवालय जातीं तब मैं भी उनकी ऊँगली थाम लेता। 

गाँव का पुराना जर्जरित शिवालय पिछले दिनों किये गए जीर्णोद्धार के बाद अब काफी बदल गया है लेकिन उन दिनों वह पुराना मंदिर मेरे लिए बड़े आकर्षण का केंद्र था। मंदिर में गंगाअवतरण एवं शिव परिवार के राजा रवि वर्मा प्रेस से मुद्रित मनमोहक लिथोग्राफ्स लगाए गए थे। शिवर्चना के दौरान माँ को पहली बार मैंने अक्षत से शिवलिङ्ग बना कर उसकी पूजा करते हुए देखा। आश्चर्यवश मैंने गर्भगृह में  शिवलिङ्ग  के होते हुए पार्थिव लिङ्ग की पूजा का कारण उनसे  पूछ लिया। माँ ने सौम्य हास्य के साथ प्रत्युत्तर में कहा “शिवजी के अक्षत से निर्मित पार्थिव/क्षणिक लिङ्ग की पूजा से घर में अन्न के कोठार भरे रहते हैं।”

इस एक उत्तर ने मेरे मन में प्रश्नों की श्रृंखला खड़ी कर दी। यदि अक्षत लिङ्ग की अर्चना करने से महादेव अन्न का वरदान देते हैं  तो जो लोग  मिट्टी, पुष्प एवं आटे जैसे द्रव्यों से लिङ्ग निर्माण कर उनका अनुष्ठान करते हैं उन्हें भी विभिन्न प्रकार का फल मिलता ही होगा। जैसे जैसे मैं बड़ा होता गया मेरे प्रश्न और जिज्ञासा में भी उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई। इन सभी प्रश्नों के उत्तर हमारे पौराणिक एवं शास्त्रीय ग्रंथों में उपलब्ध हैं। 

श्रीमद भागवत महापुराण में क्षणिक प्रतिमाओं के विषय में निम्नलिखित श्लोक प्राप्य है जिसमे पार्थिव / क्षणिक मूर्ति निर्माण के लिए उपयुक्त द्रव्यों की नामावली दी गई है।  

शैली दारुमयी लौही लेप्या  लेख्या च सैकती ।
मनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्टविधा स्मृता ॥  

इस श्लोक के अनुसार पाषाण, लकड़ी, धातु, मिट्टी, प्राकृतिक रंग, रेत, रत्न, जैसे सात द्रव्यों से क्षणिक प्रतिमा निर्माण का विधान है किन्तु इस सगुणोपासना के लिए प्रयुक्त द्रव्यों की सूचि में आश्चर्यजनक रूप से ‘मनोमयी’ प्रतिमा का भी वर्णन किया गया है जो निर्गुण उपासना का प्रतीक है। हिन्दू परंपराओं में आप उस अनंत तत्व को साकार तथा निराकार दोनों  स्वरूपों में आराधना कर सकते हैं और यह श्लोक इसी बात का प्रमाण है।  

श्रीमद भागवत में हमें प्रतिमा विज्ञान के विषय में प्राथमिक परिचय प्राप्त होता है लेकिन स्थावर, जङ्गम एवं क्षणिक प्रतिमाओं का विस्तृत अभ्यास करने के लिए हमें शैवआगम तथा मयमतम जैसे प्रतिमाविज्ञान के बृहद ग्रंथों का अभ्यास करना आवश्यक हो जाता है। बालमन में उठ रहे प्रश्नों का उत्तर ढूंढने के लिए मैंने भी पुस्तकालयों में पुरातत्व विषयक पुस्तकों का मार्ग चुना। 

पुरातत्व की पुस्तकें अपनेआप में अनंत ज्ञानकोष के समान होती हैं। इनके अध्ययन से आप स्थापत्य, कला, गणित, इतिहास, पौराणिक कथाएं और हिन्दू दर्शन का अकूट निधि प्राप्त कर सकते है। भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों के लोक जीवन, संस्कृति, कला, परम्पराएं एवं भाषाओं में इतनी भिन्नता होते हुए भी सहस्रों वर्षों से ऐक्य कैसे बना रहा है इसका रहस्योद्घाटन भी इन्हीं पुस्तकों में छिपा हुआ है।  

उपरोक्त वर्णित द्रव्यों से निर्मित जङ्गम/अचल लिङ्गों की विस्तृत जानकारी कुछ इस प्रकार है।  

 मृणमयी

मृणमयी लिङ्ग दो प्रकार के होते हैं।  पक्की मिट्टी से या कच्ची मिटटी से बने लिङ्ग। कामिकागम के अनुसार नदी तट से या पर्वतों से संग्रहित की गई धवल रंग की मिट्टी को दूध, दही, घी या गेहूं के आटे जैसे माध्यमों से गूंद कर पखवाड़े या माहभर के लिए सूर्य प्रकाश में सुखाया जाता है। कच्ची मिट्टी से निर्मित लिङ्ग का पूजा में प्रयोग जमीन जायदाद की अभिलाषा से किया जाता है। पक्की मिट्टी के लिङ्ग का प्रयोग अभिचारिक कार्यों (शत्रुविनाश) के लिए किया जाता है।   

लोहज

स्वर्ण, चांदी, पीतल, तांबा, सीसा, लौह, घंट के लिए प्रयुक्त अष्टधातु या पञ्चधातु, पारा, कांसा या टिन जैसी धातुओं से लोहज लिङ्गों का निर्माण किया जाता है। राजसी वैभव की आकांक्षा रखने वाले मनुष्यों को स्वर्ण लिङ्ग का अनुष्ठान करना चाहिए किन्तु स्वर्ण लिंगों की पूजा के नियम बहुत कठिन होते हैं। रावण हमेशा अपने पास स्वर्ण लिङ्ग रखता था।  

रत्नज

मोती, मूंगा, पुखराज, पन्ना, वैदुर्य, बिल्लौर, स्फटिक तथा नीलम जैसे सात प्रकार के रत्नों से बने शिव लिङ्गों को रत्नज श्रेणी में रखा गया है।  

दारुज

समी, मधुका, मण्डूक, कर्णिकार, टिंडुक, अर्जुन, पीपल, औदुम्बर जैसे वृक्षों से बनाए जाने वाले काष्ठ लिंगों को दारुज कहा गया है। इनके उपरांत जिन पौधों से दूधिया प्रवाही द्रव्य होता है उनका प्रयोग नहीं काष्ठ लिंग निर्माण में किया जाता है। कामिकागम जैसे ग्रंथों में काष्ठ के चंदन, खदिर, साल, बिल्व, बदर, देवदारू जैसे प्रकारों को भी मान्यता दी गई है।

शैलज

लिंगायत, वीर शैव जैसे शैव संप्रदाय के अनुयायी जङ्गम शैलज लिङ्ग धारण करते हैं। स्थावर लिङ्गों की भाँती शैलज जङ्गम लिङ्गों में ब्रह्मभाग एवं विष्णुभाग के साथ लिङ्ग निर्माण नहीं किया जाता। पीठिका और शिवलिङ्ग का निर्माण एक ही अखण्ड पाषाण से किया जाता है।

क्षणिक

अनुष्ठान के पश्चात जिन्हें विसर्जित कर दिया जाता है उन लिङ्गों को क्षणिक लिङ्ग श्रेणी में रखा जाता है। रेत से बनाए जाने वाले (सैकती), कच्चे एवं पक्के चावल (अक्षत), नदी की मिट्टी जैसे क्षणिक लिङ्ग  प्रचलन में हैं।

रोगमुक्ति हेतु गोबर, उल्लासपूर्ण जीवन के लिए मक्खन, ज्ञानप्राप्ति हेतु रुद्राक्ष बीज, सौभाग्य हेतु चन्दन, सभी इच्छाओं से मुक्ति हेतु गुड़, शारीरिकसौष्ठव हेतु आटा, दीर्घायु हेतु पुष्प और मोक्ष हेतु कुश के लिङ्गों का अनुष्ठान किया जाता है। 

विविध आगमों में इन लिङ्गों के निर्माण, अनुष्ठान तथा फल के विषय में भिन्न वर्णन हो सकते हैं इसीलिए तजज्ञों का परामर्श लिए बिना यह अनुष्ठान नहीं करने चाहिए। 

(इस श्रृंखला का प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ और पंचम भाग)

(Image credit: prajavani.net)


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