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हिन्दू मंदिरों में शिव- भाग – ५-मानुष लिङ्ग परिचय


शैव सम्प्रदायों में लिङ्गार्चा का विशेष महत्त्व है। सामान्य जन के लिए स्वयम्भू लिङ्ग तथा ज्योतिर्लिंगों का दर्शन दुर्लभ है इसीलिए मानवसर्जित लिङ्गपूजा का प्रारम्भ हुआ। शिवालयों में स्थापित मानुष लिङ्गों के निर्माण, आकार तथा प्रतिष्ठा के भी विशेष विधान हैं। 

समराङ्गण सूत्रधार के अनुसार विष्णु, ब्रह्मादि देवताओं के लिङ्गों की प्रतीकोपासना भी किसी समय प्रचलन में थी। कोपेश्वर, कोल्हापुर तथा भुवनेश्वर के मंदिरों में ऐसे लिङ्ग आज भी पूजे जाते हैं।

पीठं प्रासादरूपं च यथेष्टं कारयेद् बुधः
पूर्वोक्ते पौरुषे लिङ्गे पीठव्यासादि पूर्ववत्
तन्मानेन विमानानां विस्तारं सम्यगुच्यते
पीठस्य द्विगुणं गेहं चतुः पञ्चगुणं तु वा
लिङ्गं महत्त्वधिष्ठाने चार्धे स्थिते च मध्यमम्
समाप्ते च विमाने स्यात् कन्यसं स्थापयेद् बुधैः
(मयमतम्

मानुष लिङ्ग 

पिछले भाग में हमने स्थावर लिङ्गों का वर्गीकरण तथा स्वयम्भू लिङ्ग के बारे में चर्चा की। डॉ द्विजेन्द्रनाथ शुक्ल तथा टी गोपीनाथ राव लिखित ग्रंथों में मनुष्यों द्वारा निर्मितस्थावर मानुष लिङ्गोंके शिलालक्षण, पीठिका, विशेषताओं के विषय में विस्तृत चर्चा की गई है। लिङ्ग की ऊंचाई, चौड़ाई जैसे आयामों तथा आकारादि के विनियोग व्यवस्थानुसार इन्हें विविध श्रेणियों में कैसे वर्गीकृत किया गया है। 

प्रतिष्ठा:

एक ओर रूप प्रतिमा की पूजा सगुणोपासना है तो लिङ्ग प्रतिमा निराकार ब्रह्म का प्रतीक है। अन्य देवताओं के विग्रहों की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है लेकिन समस्त सृष्टि के प्राण शिव देवाधिदेव हैं इसीलिए शिवलिङ्ग की प्राणप्रतिष्ठा नहीं की जाती, मात्र प्रतिष्ठा की जाती है।

शिलालक्षण:

शिल्पशास्त्र के ग्रन्थ ‘मयमतम्’ के अनुसार निष्कल, सकल तथा मिश्र तीनों प्रकार के लिङ्गों का निर्माण पुंशिला से (‘सकलं निष्कलं मिश्रं कुर्याद् पुंशिलया सुधीः’) और स्त्रीशिला से पीठिका का निर्माण करने का विधान है।  

निष्कलं सकलं मिश्रं लिङ्ग श्चेति त्रिधा मतम्  
निष्कलं लिङ्ग मित्युक्तं सकलं बेरमुच्यते
मुखलिङ्गतया मिश्रं लिङ्गञ्चाकृतिसन्निभैः
बिम्बमूर्तिः शरीराभा विश्वमूर्तिस्वरूपकैः

लिङ्ग पीठिका:

पीठिका को लोक भाषा में पिण्डिका भी कहा जाता है। लिङ्ग आधेय  है तो पीठ आधारऔर इन दोनों के संयुक्त स्थापत्य को ‘आधाराधेय’ कहा जाता है। पीठिका को उसके आकारानुसार चतुरश्रा, षोडषकोणा, अष्टकोणा, आयता तथा वर्तुल में वर्गीकृत किया जाता है। इसके उपरांत पीठिका के भद्र, वज्र, महावज्र, चंद्र, श्रीकर, विकर, महाम्बुज तथा सौम्यक तथा श्रीकाम्य जैसे प्रभेद हैं।   

आकृति:

मानुष लिङ्गों के अन्य प्रभेदों की चर्चा करें तो जिन लिङ्गों पर अधोलंब रेखाएँ उकेरी गई हों उन्हें धारलिङ्ग कहा गया है, इनमें रेखाओं की सँख्या ५ से ६४ तक होती है। इन अधोलंब रेखाओं को ब्रह्मसूत्र कहा जाता है।    

लिङ्ग की ऊंचाई:

जैसे कि हमने लिंगोद्भवमूर्ति तथा एकपादमूर्ति की चर्चा के समय देखा, ब्रह्मा एवं विष्णु भी शिव के अंश हैं। वही संकल्पना लिङ्ग निर्माण में भी उपयोग में ली जाती है। मानुष लिङ्गों के सबसे निचले हिस्से को ब्रह्मभाग  कहा जाता है और इसका आकार चौकोर होता है। लिङ्ग के मध्य भाग को विष्णुभाग  कहते हैं और इसका आकार अष्टकोण होता है। 

Credit: wikipedia

ब्रह्मभाग धरातल के भीतर और विष्णुभाग लिङ्गपीठिका में समाहित होते हैं इसीलिए यह दोनों हिस्से हमारे नेत्रों से ओझल ही रहते हैं। लिङ्ग के जिस हिस्से की हम अर्चना करते हैं उसे रुद्रभाग कहा जाता है और बहुतायत यह वर्तुलाकार होता है।  

लिङ्ग के विविध भागों की ऊंचाई के प्रमाणानुसार उन्हें सार्वदेशिक, सर्वतोभद्र (सर्वसम), वर्धमान (सुरेढय), शैवाधिक, स्वस्तिक (अनाढ्य), त्रैराशिक (त्रैभागिक) तथा आढ्य लिङ्ग जैसे नामों से पहचाना जाता है। यदि हम इन जटिल शास्त्रीय नामों में उलझे बिना इन्हे समझने का प्रयास करें तो इन्हे पहचान पाना बहुत ही आसान है।   

जिन लिङ्गों में रुद्रभाग का प्रमाण ब्रह्मभाग एवं विष्णुभाग से अधिक होता है उन्हें ‘शैवाधिक’ लिङ्ग कहा जाता है। जिन लिङ्गों में ब्रह्मभाग से होते हुए रुद्रभाग तक लिङ्ग की ऊंचाई में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है उन्हें ‘वर्द्धमान’ कहा जाता है। और जिन लिङ्गों में ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव के भागों की ऊंचाई एकसमान हो उन्हें ‘सर्वतोभद्र’ या ‘सर्वसम’ कहा जाता है।   

जब लिङ्ग की ऊंचाई गर्भगृह के अनुपात में बनाई गई हो तो वैसे लिङ्गों को सार्वदेशिक लिङ्ग  कहा जाता है। स्वस्तिक लिङ्ग में ब्रह्मभाग, विष्णुभाग तथा रुद्रभाग की ऊंचाई का प्रमाण २ : : ४ रखा जाता है।  

इन सभी प्रभेदों में सबसे जटिल त्रैराशिक लिङ्गों का अनुपात है। चलिए इसे उदाहरण के साथ समझने का प्रयास करते हैं। यदि त्रैराशिक लिङ्ग की ऊंचाई ९ फ़ीट है तो उसमें चौकोर ब्रह्मभाग का नाप २ फ़ीट, अष्टकोणिय विष्णुभाग के हर पक्ष का नाप ब्रह्मभाग के सानुपातिक प्रमाण में होगा तथा रुद्रभाग की त्रिज्या १ फुट होगी। आढ्य लिङ्गों में इन तीनों भागों का प्रमाण ८|| : : || रखा जाता है। 

इस वर्गीकरण में तथा इनके ब्रह्मभाग, विष्णुभाग तथा रुद्रभाग के अनुपातों में आगम ग्रंथों में भी कुछ स्थानों पर वर्णन में वैविध्य पाया गया है।   

लिङ्ग की चौड़ाई:

लिङ्ग की चौड़ाई (गोलाई) के प्रमाणानुसार उन्हें जयद, पौष्टिक तथा सर्वकामिक प्रकारों में विभाजित किया गया है। तदुपरांत भारतवर्ष के विशाल भूखण्ड में भौगिलिक स्थानों के कारण जयद, पौष्टिक तथा सर्वकामिक लिङ्गों को नागर, द्रविड़ तथा वेसर की श्रेणियों में भी वर्गीकृत किया जाता है। प्रस्तुत कोष्ठक में इन लिङ्गों का विवरण दिया गया है।  

आकार:

इसके उपरांत लिङ्गों के उर्ध्वभाग के आकारानुरूप इन्हें छत्राकार, त्रिपुषाकार, कुक्कुटाण्डाकार, बुद्बुदसद्दश तथा अर्धचन्द्राकार में भी वर्गीकृत किया जाता है।  

मानुष लिङ्गों  की अन्य विशेषताएं:

सर्वसमलिङ्गों के रूद्रभाग पर वामदेव, तत्पुरुष, अघोर, ईशान तथा सद्योजात जैसे शिव के पञ्चरूपों का चित्रण किया जाता है और यहीं से शिव के लिङ्ग स्वरुप रूप प्रतिमाओं में परिवर्तित होते प्रतीत होते हैं।

Sahasra linga – Ashapuri, Bhopal.

लिङ्ग के रूद्रभाग पर उकेरे गए उपलिङ्गों की संख्यानुसार इनके अष्टोत्तरशतलिङ्ग (१०८) तथा सहस्रलिङ्ग (१०००) जैसे नामकरण भी किये जाते हैं। 

उपासना की सुगमता तथा सर्वसाधरणप्रियता के कारण “चल लिङ्ग” के प्रचलन में आए होने की सम्भावना को नकार नहीं सकते। अगले भाग में हम इन्हीं चल लिङ्गों  के विषय में चर्चा करेंगे।

(इस श्रृंखला का प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ भाग)

(Featured Image credits: dailyartmagazine.com)


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