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हिन्दू मंदिरों में शिव- भाग -४- स्थावर लिंगों का वर्गीकरण तथा स्वयंभू लिंग प्रतिमाएं


स्कन्द पुराण में कहा गया है अनंत आकाश लिंग स्वरूप है और पृथ्वी उसका आधार है। संपूर्ण ब्रह्मांड और सभी देवता अंत में लिंग में ही समाहित हो जाते हैं।

आकाशं लिंगमित्याहु: पृथ्वी तस्य पीठिका ।
आलय: सर्व देवानां लयनार्लिंगमुच्यते ॥

भारतीय मंदिरों में शिव की श्रृंखला में अब तक हमने लिंगोद्भव तथा एकपाद प्रतिमाओं की चर्चा में लिंगपूजा का इतिहास तथा महत्व जाना है। शिव के सभी स्वरूपों में सबसे प्रचलित एवं प्रख्यात भी लिंग प्रतिमाएं ही हैं लेकिन जब हम लिंग प्रतिमाओं के विषय में ज्यादा गहराई से जानने का प्रयास करते हैं तब कुछ अद्भुत एवं रहस्यमय तथ्य हमारे सामने प्रस्तुत होते हैं।

लिंग पुराण तथा अन्य आगम ग्रंथों में शिवलिंगों का विस्तृत वर्गीकरण किया गया है। मूल रूप से इन्हें स्थावर लिंग तथा जङ्गम लिंग में विभाजित किया जाता है। स्थावर लिंग को स्थिर लिंग या अचल लिंग भी कहा जाता है।

लिङ्गं द्वयमितिप्रोक्तं चलं चैव अचलं तथा ।
चल लिङ्गे सदावासं पूजयेत् परमेश्वरम् ॥
स्थिरलिङ्गे देवन्तु मन्त्रसंस्कार पूर्वकम् ।
मन्त्रहीने तु लिङ्गस्य केवलाकृति मात्रकम् ॥
चललिङ्ग विशेषन्तु गुरूदेवो महेश्वर ।
(मकुटागम)

गीर्वाण भाषा में ‘लिंग’ शब्द का एक अर्थ ‘प्रतीक’ या ‘चिन्ह’ भी होता है। दुर्भाग्य से प्रचलित मान्यताओं में उचित ज्ञान के अभाववश कुछ लोग शिवलिंग की व्याख्या पुरुष प्रजननांग के रूप में कर देते हैं और सामान्यजन इसे ही शिवलिंग का एकमात्र अर्थ समझ लेते हैं।

प्रतीकों या चिन्हों की चर्चा का सबसे रोचक पहलू यह है कि भारत के सभी देवी देवताओं की मूर्तियां एक तरह से किसी न किसी दैवीय तत्व के प्रतीक ही तो हैं। आदिकाल में जब पूजा-अर्चना के लिए प्रतीकों की आवश्यकता होगी तब हमारे पूर्वजों ने शिव के लिंगोद्भव की कथा तथा पुराणों में प्राप्य ज्योतिर्लिंग कथाओं के भौगोलिक स्थानों पर ऐसे ही शैव प्रतीकों के रूप में स्वयंभू लिंग की पूजा का प्रारम्भ किया होगा। संभवतः इन्हीं प्रतीकों के ऊपर मंदिर स्थापत्यों के निर्माण से आरम्भ हुई कलायात्रा समय के साथ भव्य देवालयों में परिवर्तित हो गई।

जब हम भारतीय मंदिरों के विषय में चिंतन करते हैं तब एक रसप्रद विचार यह भी आता है कि हमारे पूर्वजों द्वारा निर्मित सभी कलात्मक और भव्य स्थापत्यों के प्रेरणास्त्रोत मंदिरों के गर्भगृहों में स्थित शिव के यह “स्वयंभू लिंग” ही रहे होंगे।

अचल लिंग (स्थावर अथवा स्थिर लिंग प्रतिमाएं) (Image courtesy: Google)

आगम ग्रंथों के अनुसार शिव के लिंग स्वरूपों में स्वयंभू लिंगों को ‘उत्तमोत्तम’ माना गया है। देवों तथा शिव गणों द्वारा स्थापित दैवीय/गण लिंगों को ‘उत्तम-मध्यम’ की श्रेणी में रखा गया है। इसी प्रकार से सुरों,असुरों तथा ऋषियों (आर्ष लिंग) द्वारा स्थापित लिंग ‘उत्तमोधम’ तथा मनुष्य द्वारा निर्मित मानुष लिंगों को ‘मध्यमोधम’ कहा गया है।

‘किरणागम’ स्वयंभू, आर्ष और दैविक लिंगों को रूप और माप के नियमों से ऊपर रखता है। इन लिंगों की पहचान केवल उनके निर्धारित आकार से की जाती है। दैविक लिंग ज्योति आकार के होते हैं लेकिन कुछ स्थानों पर यह अंजलि मुद्रा में जुड़े हस्ताकार में भी होते हैं। गण लिंगों का आकार नींबू, सेब या ताड़गोला (ताड़ के फल) जैसा होता है तथा आर्ष लिंगों का आकार श्रीफल (नारियल) जैसा गोलभीय होता है। देवों, गणों और ऋषियों द्वारा स्थापित लिंगों में ब्रह्मसूत्र का अभाव होता है।

मानुष लिंगों का विस्तृत वर्गीकरण सर्वदेशिक, सर्वतोभद्र (सर्वसम), वर्धमान (सुरेद्य), शैवाधिक, स्वस्तिक, त्रेभागिक के रूप में किया गया है जिनके विषय में हम आने वाले भागों में चर्चा करेंगे।

शैव आगमों के अभ्यास से ज्ञात होता है कि एक ओर कामिकागम स्थावर लिंगों का वर्गीकरण छह प्रकार में करता है तो दूसरी ओर मकुटागम मात्र चार प्रकार के स्थिर लिंगो के बारे में चर्चा करता है। यद्यपि स्थावर लिंगों के वर्गीकरण में विभिन्न आगमों के कथनों में स्पष्ट विविधता है किन्तु व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो उनमें कोई विशेष अंतर नहीं है‌। कुछ आगमग्रन्थ सभी प्रकार के लिंगों को प्रमुख श्रेणियों में समाहित करते हैं। अन्य आगम इस सूची को श्रेणियों तथा उपश्रेणियों में विभाजित करते हैं।

स्वयंभू लिंग

कामिकागम के अनुसार जो अनादिकाल से अस्तित्व में हैं तथा जिनका उद्भव प्राकृतिक रूप से किसी विशेष भौगोलिक स्थान पर भगवान शिव द्वारा किया गया है। उस प्रकार के लिंगों को स्वयंभू लिंग कहा जाता है। यह लिंग इतने महत्वपूर्ण हैं कि दावानल, नदियों की बाढ़, वन्य प्राणियों के अतिक्रमणों जैसे प्राकृतिक कारणवश या विधर्मियों के विध्वंस, मतिभ्रष्ट मनुष्यों के द्वारा खंडित किये जाने पर उन्हें पुनःस्थापित करने की आवश्यकता नहीं होती है।

यदि किन्हीं कारणों से स्वयंभू लिंग का हिस्सा खंडित हो जाए, उस परिस्थिति में इस क्षतिग्रस्त भाग को सोने या ताम्बे जैसी धातुओं के माध्यम से शिवलिंग के साथ जोड़ दिया जाता है। अधिक नुकसान की स्थिति में खंडित हिस्से को विसर्जित कर शिवलिंग की पूजा में कोई आपत्ति नहीं प्रकट की गई है। यदि दुर्घटनावश स्वयंभू लिंग पूरी तरह से नष्ट हो जाये तो यह वहां के राजा तथा सुरक्षा व्यवस्था की लापरवाही का प्रमाण है। ऐसी स्थिति में राजा द्वारा प्रायश्चित तथा पदत्याग के लिए भी विधान है।

भारतवर्ष पर हुए विधर्मी आक्रमणों के पश्चात लिखे गये वामदेव कृत “जीर्णोद्धार दशक” जैसे ग्रंथों में विग्रहों के पुनःस्थापन एवं देवालयों के जीर्णोद्धार के विषय में विशद चर्चा की गई है। यह तो सर्वविदित है कि ग़ज़नवी, ग़ोरी तथा अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक कफूर जैसे धर्मांधों द्वारा भारतवर्ष में विस्तृत विनाश किया और ध्वस्त खंडित मंदिरों की अवदशा हुई। इस कारण हिन्दू राजाओं की अनुपस्थिति तथा भीरु प्रजा की अवहेलना झेलते इन मंदिरों को बिना राज्याश्रय खंडहरों में परिवर्तित होते देर ना लगी।

त्रावणकोर राज्य के विख्यात पुरातत्वविद् गोपीनाथ राव के अनुसार भारतवर्ष में वाराणसी, प्रयाग, गया, प्रभास, पुष्कर, अवंति (उज्जैन), गोकर्ण, नागेश्वर, महेश्वर तथा हेमकूट जैसे ६८ भौगोलिक स्थानों पर प्रमाणित स्वयंभू लिंग प्राप्य हैं। लेकिन स्वयंभू लिंगों की प्रसिद्धि के कारण हर गाँव, नगर के शिवालय में स्वयंभू लिंग होने का दावा किया जाता है।

वैसे तो हर एक स्वयंभू लिंग के साथ जुड़ी रोचक पौराणिक कथाओं और इतिहास पर अलग से लेख लिखा जा सकता है किन्तु एक अद्भुत स्वयंभू लिंग के उल्लेख के बिना यह लेख अधूरा माना जाएगा।

यह अनूठा स्वयंभू लिंग वर्ष के मात्र कुछ माह तक प्रकट स्थिति में रहता है अन्यथा विलुप्तप्रायः होता है। दुर्गम मार्गों से होते हुए की जानेवाली इस स्वयंभू लिंग की यात्रा में प्राकृतिक कठिनाइयों के उपरांत विधर्मी आक्रमणों का भी भय बना रहता है। क्या आप बता सकते हैं कि यहाँ किस प्रसिद्ध लिंग का उल्लेख किया गया है?

(Image credit: rgyan.com)


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