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रामनवमी महिमा – भाग १

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चैत्र माह के प्रारंभ होते ही सृष्टि में नई ऊर्जा का संचार होता है, पेड़ो और पोधों में नई कोंपले आने लगती हैं। वातावरण में अनेक परिवर्तन देखने को मिलते हैं, प्रकृति नए रूप और नए रंग में निखरने लगती है। जल प्रलय से सृष्टि को बचाने हेतु महा विष्णु जी ने इसी माह में प्रथम अवतार लेकर वैवस्वत मनु जी की नौका को जल के विशाल सागर से बाहर निकाला था। इन्हीं प्रथम अवतार मत्स्यावतार श्री विष्णु जी ने महाराज मनु जी से सृष्टि का नए रूप में निर्माण करने को कहा। इसी चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा से सृष्टि की रचना आरंभ हुई, जिसे सनातन धर्म को मानने वाले नव वर्ष के रूप में मनाते हैं।

प्रभु आज्ञा का प्रीतिपूर्वक पालन करते हुए महाराज मनु ने इकहत्तर चतुर्युग पर्यंत पृथ्वी पर राज किया। भवन में रहते रहते ही उन्हें वृद्धावस्था ने घेर लिया, उनके मन में बड़ी पीड़ा हुई कि हरी भक्ति बिना ही जीवन व्यतीत हो गया।

होइ न बिषय बिराग, भवन बसत भा चौथपन।
हृदयँ बहुत दु:ख लाग, जनम गयउ हरिभगति बिनु॥

इस प्रकार से विचार कर महाराज मनु ने अपना राज पुत्र उत्तानपाद को दे दिया और स्वयं सहगामिनी देवी शतरूपा जी के साथ हरी भक्ति का विचार कर वन की ओर प्रस्थान किया। वनों में नैमिषारण्य वन की महिमा हर वेद पुराण आदि ने की है, जहाँ के तीर्थ और सिद्ध साधक विख्यात हैं। देवी शतरूपा सहित महाराज मनु भी हर्षित हृदय से इसी वन में आये।

तीरथ वर नैमिष विख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता।

गोमती तट के निकट पहुँच मनु दम्पति ने निर्मल जल में स्नान किया। उनके आगमन का समाचार सुन ऋषि मुनि और सिद्ध समाज के साधक उनसे मिलने आये। ऋषि मुनियों ने उन्हें आदरपूर्वक नैमिषारण्य के सभी तीर्थ करवाये और उन तीर्थों की महिमा का वर्णन भी कह सुनाया।

अनेक वर्षों तक वन में रहकर मनु दम्पत्ति ने कठोर तप किया, उनके तप से प्रसन्न हो ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव जी ने आकर उनसे वर मांगने को कहा, पर मनु महाराज के मन में उन निर्गुण, अखंड और अनादि देव के दर्शन करने की अभिलासा थी। जिनकी वेदों पुराणों में नेति नेति कहकर व्याख्या की गयी है और जिनके अंश से ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी जन्म लेते रहते हैं।

नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा॥
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना॥

दस सहस्त्र वर्षों के अपार तप को देख प्रभु साकेतविहारी, जो वर्षाकालीन मेघों के समान श्याम श्रीविग्रह हैं और जिनकी शोभा का वर्णन श्री गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री मानस में किया हैं, वे प्रभु श्री अनादि, अनंत प्रकट हुए और मनु दम्पति को दर्शन देकर वर मांगने को कहा। मनु दम्पति ने उन देव की बारंबार पूजा कर, प्रभु से ये वर माँगा “ प्रभु, हम आपके समान पुत्र चाहते हैं” । प्रभु ने कहा मै अपने समान कहाँ जाकर खोजूँ, इसलिए मैं स्वयं ही तुम्हारे पुत्र रूप में जन्म लूँगा।

दानि सिरोमनि कृपानिधि, नाथ कहउँ सतिभाव।
चाहउँ तुम्हहि समान सुत, प्रभु सन कवन दुराव॥

देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले॥

आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई॥

अनेक वर्ष बीतने पर सरयू नदी के तट पर बसे कोशल जनपद की अयोध्या नगरी में चक्रवर्ती राजा दशरथ हुए। वे इक्ष्वाकु कुल के अतिरथी वीर थे। एक समय पुत्र प्राप्ति की इच्छा से अश्वमेघ यज्ञ करने का विचार उनके मन में हुआ, और उन्होंने सुमंत जी से कहा’ “तुम हमारे सब गुरुओं और श्रेष्ठ पुरोहितों को शीघ्र बुला लाओ।“

सब पुरोहितों के आने पर महाराज दशरथ ने उनसे अपने विचार कहे, जिसकी सभी पुरोहितों ने प्रशंसा की और इसे शुभ विचार बताया। वशिष्ठ आदि पुरोहितों ने महाराज से कहा, “आप सरयू तट पर यज्ञ मंडप बनवाइये और यज्ञ सामग्री एकत्रित कर अश्वमेघ का अश्व छोडिये, इससे आपके पुत्र प्राप्ति का मनोरथ अवश्य ही पूरा होगा।

ब्राह्मणों के जाने के बाद सुमंत जी ने महाराज से एक कथा कह सुनाई जो सनत्कुमार जी ने ऋषियों से कही थी और जिसे सुमंत जी ने ऋषियों के संपर्क से सुन रखी थी। किसी समय अंग देश के राजा रोमपाद के यहाँ दुर्भिक्ष पड़ेगा। उस समय वे कश्यप मुनि के पोत्र और ऋषि विभंडक के पुत्र ऋषि श्रुंग जी को अपने देश बुला कर उनसे अपनी पुत्री शांता का विवाह कर देंगे। उन ऋषि के प्रताप से उस नगर में वर्षा होने लगेगी और जल्द ही दुर्भिक्ष भी जाता रहेगा।

इस प्रकार से कहकर सुमंत जी ने महाराज दशरथ से कहा, “ महाराज वे ऋषि श्रुंग अपनी अर्धांगिनी देवी शांता के साथ उसी नगर में सुखपूर्वक रहते हैं।“ सनत्कुमार के कथनानुसार उन्हीं ऋषि श्रुंग को बुलवाकर यदि आप यज्ञ करेंगे और उस यज्ञ में उन्हें ऋत्विज बनाएंगे तो आपके चार प्रतापी पुत्र होंगे।

वंशप्रतिष्ठानकराः सर्वलोकेषु विश्रुताः ||

एवं स देवप्रवरः पूर्वं कथितवान्कथाम् |
सनत्कुमारो भगवान्पुरा देवयुगे प्रभुः |

वे पुत्र वंश बढ़ाने वाले और सारे संसार में विख्यात होंगे। इस प्रकार सनत्कुमार जी ने ये कथा बहुत पूर्व अर्थात इस चतुर्युगी के प्रथम सतयुग में कही थी।

सन्दर्भ :-

  • श्री रामचरितमानस भावार्थबोधिनी हिंदी टीका, श्री तुलसीपीठ संस्करण – स्वामी रामभद्राचार्य जी महाराज
  • श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण (सचित्र, केवल भाषा) – गीताप्रेस गोरखपुर
  • श्रीमद्वाल्मीकी रामायण (हिन्दीभाषा अनुवाद सहित) – चतुर्वेदी द्वारकाप्रसाद शर्मा
  • श्री रामचरितमानस (हिंदी अनुवाद) – हनुमानप्रसाद पोद्दार – गीताप्रेस गोरखपुर

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