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भारतीय सांस्कृतिक विचारधारा – भाग १

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भारतीय संस्कृति विश्व के पुरातन संस्कृतियों में से एक है। कई विद्वान भारतीय संस्कृति को विश्व की सर्वाधिक प्राचीन संस्कृति मानते हैं। भारतीय संस्कृति चीन, रोम, मिस्र, यूनान, सुमेर की संस्कृतियों से भी प्राचीन मानी जाती है। यह संस्कृति व सभ्यता प्राचीन होने के साथ साथ सदैव समृद्ध भी रही है। विज्ञान का क्षेत्र हो या राजनितिक या कलात्मक, भारतीय संस्कृति सदैव से हर क्षेत्र में अग्रणी रही है। हम अपने इतिहास का अवलोकन करें, तो हमें ऐसे कई लिखित तथ्य मिल जाएंगें, जिससे यह ज्ञात होता है की हमारी सभ्यता और संस्कृति कई मायने में ऐतिहासिक समृद्ध रही है। इसी ऐतिहासिक सांस्कृतिक विचारधारा ने भारत को आज भी समस्त विश्व में एक परिचय एवं नाम दिया है, जिसके कारण हमारे राष्ट्र को कला, विज्ञान, राजनीती एवं कई अन्य विषयों की जननी माना जाता है।

संस्कृति हमारे संस्कारों की परिचायक होती है, जो कई वर्षों के जीवन मूल्यों से बनती है। इस कारण हर सभ्यता की एक सांस्कृतिक पहचान होती है। संस्कृति ही सभ्यता की भी जननी होती है, जो जीवन व्यापन करने के क्रिया से जानी जाती है। भारत की संस्कृति और सभ्यता ने न केवल जीवन शैली के बारे में विश्व को बताया है, अपितु विज्ञान एवं गणित के क्षेत्र में भी इसका योगदान अतुलनीय है। कई ऐसी खोज, जो भारत में हज़ारों वर्ष पहले की जा चुकी थी, उसे पाश्चात्य दुनियाँ ने बाद में जाना और समझा।

वेदों एवं उपनिषदों में विज्ञान को धर्म का अभिन्न अंग माना गया है। वेदों को ज्ञान के सिद्धांत स्रोत के रूप में कई वैज्ञानिक खोजों और आविष्कारों का आधार बनाया गया है। विज्ञान के सन्दर्भ में ज्ञान की खोज उस वक़्त के परिपेक्ष्य में भी बहुत ही आधुनिक थी। आज के अधिकांश खोजों को वेदों, पुराणों एवं उपनिषदों में संदर्भित किया गया है, एवं उनके अस्तित्व के प्रमाण भी उपलब्ध हैं। कई वैदिक अवधारणाएं विज्ञान पर ही आधारित हैं। उदाहरणार्थ वास्तुशास्त्र का विज्ञान वेदों में उपलब्ध है। बौद्धों का स्तूप एवं पुराने मंदिरों की वास्तुकला इसके द्योतक हैं। ये विशाल एवं सटीक संरचनाएं इस बात को स्थापित करती हैं कि हज़ारों वर्ष पहले भी भारत की वास्तुकला बहुत विकसित थी।

आयुर्वेद को सनातन विज्ञान कहा जाता है। आयुर्वेद को दुनिया भर में स्वीकार किए जाने वाले पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में से एक माना जाता है। भारत में औषधीय पौधों का एक विशाल भंडार है जिसे पारंपरिक चिकित्सा उपचारों में उपयोग किया जाता रहा है। पारंपरिक प्रणालियों में वैकल्पिक दवाएं जड़ी-बूटियों, खनिजों और कार्बनिक पदार्थों से प्राप्त होती रही हैं, जबकि हर्बल दवाओं की तैयारी के लिए केवल औषधीय पौधों का उपयोग किया जाता है। चिकित्सा की इस पारंपरिक प्रणाली में प्राचीन ज्ञान अभी भी पूरी तरह से नहीं खोजा गया है। आयुर्वेद की उत्पत्ति प्राचीन काल से भी प्राचीनतम है। भारत मसालों और रत्नों की सबसे प्रसिद्ध भूमि रही है। आयुर्वेद का समृद्ध इतिहास रहा है; हालाँकि, इसके प्रति दृष्टिकोण में कुछ कमियाँ थीं, जिसने इसके विकास को चिकित्सा प्रणाली के क्षेत्र में कुछ बाधित कर दिया। उस वक़्त भी कुछ हर्बल दवाओं के सक्रिय घटक ज्ञात नहीं थे, और आज भी कई दवाओं को अभी भी अपने सक्रिय घटक के लिए और अन्वेषण की आवश्यकता है।

चिकित्सा के क्षेत्र में भी आयुर्वेद में न केवल औषधियों का वर्णन है, अपितु शल्यचिकित्साओं का भी विस्तारपूर्वक वर्णन है। कुछ जड़ी-बूटियों के साथ सोना, चांदी, जैसे धातुओं का सम्मिश्रण का उपयोग भी वैदिक काल में किया जाता था, जो आज भी किया जा रहा है। भगवन श्री धन्वंतरि आज भी महान चिकित्सक के रूप में जाने एवं पूजे जाते हैं। इधर कुछ समय से जटिल गणित के लिए आयुर्वेदिक गणित की भी उपयोगिता बढ़ गई है। यह बहुत ही सरल भी है। राजा अशोक द्वारा भारत में बनाए गए कई पत्थर स्तंभों में संख्या प्रणाली के संरक्षित उदाहरण हैं।

रासायनिक विज्ञान के क्षेत्र में भी ऐतिहासिक भारत का विशेष योगदान रहा है। Sugar, Camphor जैसे शब्दों की उत्पत्ति संस्कृत से ही है। प्राचीन स्थलों पर खुदाई से धातु के टुकड़ों के अवशेषों का पता चलता है, जो यह स्थापित करता है की उस वक़्त भी इनका उपयोग किया जाता था। संयंत्र स्रोतों से रंजक बनाना, अलंकरण बनाने के लिए सजावटी चांदी, सोना और अन्य तकनीकों का उपयोग इत्यादि कई साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं की रसायन विज्ञान का भी उस वक़्त उपयोग होता था।

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