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प्राचीन भारतीय विज्ञान – भाग ४

maharashtrian lady

प्राचीन भारत कि ऐसी अनूठी वैज्ञानिक सोच ने मेरी जिज्ञासा को जागृत कर दिया था। मैं अब माँ का मजाक नहीं उड़ा रहा था। मैं वास्तव में जानना चाहता था और मैंने माँ पर प्रश्नों की वर्षा कर दी। जुलाई से अक्टूबर के बीच चौमासे के चार महीने की अवधि के दौरान विवाह आदि जैसे आयोजनों को मनाने पर प्रतिबंध के बारे में क्या? माँ ने बताया कि चौमासा आम तौर पर वर्षा ऋतु के दौरान आता है, और यह नई फसल के बीज बोने का समय होता है।

बीज बोना एक श्रमपूर्ण कार्य है और इसके चलते और किसी बात के लिए समय नहीं रहता। आर्थिक परिस्थिति से देखा जाए तो पिछली फसल कटाई से मिला धन भी अब तक खर्च हो चुका होता है। और एक व्यावहारिक कारण भी है: भारी वर्षा में विवाह जैसे बड़े आयोजन भी कहाँ संभव होते है?

यह तर्क भी समझ में आ गया। तो क्या अधिक मास के दौरान अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करने के पीछे भी कुछ ऐसा ही कारण है? माँ ने कारण स्पष्ट करने के लिए मुझसे एक सवाल पूछा। मान लो कि तुम्हें 30 दिनों का वेतन पर 35 दिन गुजारा करना पड़े तो तुम क्या करोगे? मैंने तुरंत जवाब दिया, मैं कम खर्च करूंगा ताकी उतने ही पैसों में 5 और दिन निकल जाए। बिल्कुल सही! माँ ने समझाया कि हमारा पंचांग चंद्र के चक्र काल पर आधारित है, किन्तु ऋतुओं का आवागमन और उनके अनुसार कृषि और व्यापार का चक्र सूर्य पर आधारित है।

चंद्रमा पंचांग का वर्ष सौर पंचांग वर्ष की तुलना में लगभग 11 दिन छोटा होता है। अतः ऋतु और उसपर निर्भर कृषि प्रक्रिया को समक्रमिक बनाए रखने ले लिए इन दोनों पंचांगों को समक्रमिक बनाना आवश्यक है। इसी कारण चंद्रमा पंचांग में हर तीसरे साल लगभग 29 दिनों का अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है जिसे अधिक मास कहते है। परंतु इस अधिक मास के हिसाब से कोई विस्तारित व्यावसायिक चक्र नहीं होता है! इसलिए, परिवारों को उतनी ही आय में अधिक दिनों तक गुजारा करना पड़ता है। प्रमुखतः इसी कारण से अधिक मास में विवाह और अन्य समारोहों के आयोजन के स्थान पर पूजा पाठ और धार्मिक कार्यों में समय लगाने का सुझाव दिया गया है।

रसोईघर में हमारी चर्चा इस बात से शुरू हुई थी कि प्राचीन भारतीय विज्ञान किस प्रकार भौतिक या शारीरिक स्तर पर मानव जीवन की सहूलियत सुनिश्चित करता है, और बात बढ़ते-बढ़ते मानसिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक कल्याण पर संपन्न हुई। जिस चतुराई से माँ ने चर्चा को आगे बढ़ाया, मुझे प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक सोच में एक भव्य दृष्टिकोण का अनुमान होने लगा। मैं माँ से इस दृष्टिकोण और उसके संगठन को जानने के लिए उत्सुक था।

खीर भी अब बन चुकी थी। माँ ने खीर परोसते हुए उत्तर दिया। वैसे तो वर्गीकरण की कोई औपचारिक या प्रलेखित प्रणाली नहीं है, लेकिन सारी प्राचीन भारतीय विचारधारा का एक ही प्राथमिक लक्ष्य है: आत्म-बोध। मानव जीवन का लक्ष्य ही यही है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों को अर्जित करते हुए आत्म-बोध तक पहुँचा जाए। समस्त प्राचीन भारतीय विचार, चाहे वह भौतिक विज्ञान हो, सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र या दर्शनशास्त्र, सभी इन पुरुषार्थों को प्राप्त करने के निमित्त हैं।

शास्त्र कहते हैं कि मोक्ष या आत्मबोध केवल धर्म के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। सच्चे धर्म का अभ्यास केवल तभी किया जा सकता है जब कोई व्यक्ति काम से मुक्त हो या इच्छाओं को पार कर ले। इच्छापूर्ति के लिए अर्थ या धन का होना आवश्यक है। और चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करके अंततः आत्मबोध तक पहुंचने के लिए व्यक्ति के शरीर और मन का स्वस्थ और दृढ़ होना अनिवार्य है।

उदाहरण के लिए अगर आज की हमारी चर्चा को देखा जाए तो मासिक धर्म के समय महिलाओं को विश्राम शरीर को स्वस्थ रखने के लिए है तो निःसंतान महिलाओं से बरगद के पेड़ की परिक्रमा करवाना मानसिक दृढ़ता को बनाए रखने के लिए है। चौमासे में सीधा-साधा जीवन व्यापन आर्थिक कल्याण के साथ साथ धार्मिक कल्याण भी सुनिश्चित करता है।

माँ ने अपनी व्याख्या पूरी की और मैंने खीर। मुसकाते हुए मैंने खाली कटोरी माँ की ओर बढ़ाया और माँ ने उसे पुनः खीर से भर दिया।

Featured Image: A Maharashtrian Lady Near the Well by Raja Ravi Varma


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