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प्राचीन भारतीय विज्ञान – भाग ३

राजा रवि वर्मा

पिछले भाग में हम बात कर रहे थे समाज में व्याप्त कुछ अंधविश्वासों की। क्या इनके पीछे कोई वैज्ञानिक तथ्य भी हैं? आइये देखते हैं।

माँ ने आगे बताया कि जिन मान्यताओं का वैज्ञानिक तर्क खो गया है, अब उसे सुलभता से अंधविश्वास करार दिया जाता है, जबकि उनका प्राथमिक उद्देश्य दिन प्रतिदिन के जीवन को सुगम और आसान बनाना था। मैं यह स्वीकार नहीं कर सका। उदाहरण के लिए, महिलाओं को मासिक धर्म के समय अशुद्ध मान कर अलग रखने के पीछे क्या तर्क हो सकता है? क्या यह अज्ञानता नहीं थी?

माँ ने हँसते हुए मुझसे पूछा कि क्या मैंने कभी पीरियड्स का अनुभव किया है? क्या बेतुका सवाल है! मैं एक लड़का हूं, तो मुझे पीरियड्स कैसे आ सकते हैं? माँ ने स्पष्ट किया कि जब एक महिला पीरियड से गुज़रती है, तो उसे न केवल रक्त की हानि होती है, बल्कि उनका पूरा शरीर एक कठिन प्रक्रिया से गुजरता है। कई महिलाओं को तो मतली, ऐंठन और तीव्र दर्द का भी अनुभव होता है।

ऐसी स्थिति में, महिला को आराम की आवश्यकता होती है और वह शारीरिक श्रम करने में सक्षम नहीं होतीं। उन्हें आराम करने का अवसर देने के लिए, उन्हें खाना पकाने, सफाई आदि जैसे किसी भी कार्य को करने से प्रतिबंधित किया गया था। इस प्रथा का प्रारंभ तो स्त्रियों को विश्राम देने के रूप में शुरू हुआ, किन्तु जैसे-जैसे समय के साथ हम इस वैज्ञानिक तर्क को भूलते गए यह महिलाओं के विरुद्ध भेद-भाव का उपकरण होता गया।

चलो मैंने यह भी मान लिया, लेकिन संतानहीन महिलाओं को बरगद के वृक्ष की परिक्रमा करने के लिए क्यों कहा जाता है? ऐसा तो नहीं है कि बरगद के पेड़ के आस-पास कि हवा में औषधीय गुण होते हैं या परिक्रमा से हो रहे व्यायाम से कुछ मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं जिससे संतान उत्पत्ति में सहायता होती है? और अगर ऐसे ठोस वैज्ञानिक कारण थे, तो पुरुषों को यह परिक्रमा करने के लिए क्यों नहीं कहा गया? एक दंपति के निःसन्तान होने का कारण पुरुष भी तो हो सकता है?

माँ जानती थी कि मैं इस प्रथा का उपहास कर रहा था, लेकिन उन्होंने आक्षेप नहीं किया और बड़े धैर्य से समझाया। दुर्भाग्य से, समाज की दृष्टि में संतानरहित होने पर दोष महिला पर डाला जाता रहा है। एक महिला पर बच्चे पैदा करने के लिए परिवार और समाज का मानसिक दबाव होता है। जब अनेक उपायों के बाद भी एक महिला के बच्चे नहीं होते, तो इस बात का उसके मानस पर प्रभाव पड़ता है और वह डिप्रेशन और अन्य मानसिक रोगों का शिकार हो सकती है।

ऐसी स्थिति में, उस महिला को एक ऐसे आत्मीय समूह की आवश्यकता होती है जो उसकी मानसिक स्थिति को समझ सके और उसे सांत्वना प्रदान कर सके। चूंकि निःसंतान महिलाओं को प्रातःकाल में बरगद के पेड़ की परिक्रमा की सलाह दी जाती है, इसलिए सुबह के समय ऐसी कई महिलाएं वहां एकत्र होती हैं। एक दूसरे को देख उन महिलाओं को यह सम्बल मिलता है कि वह अकेली नहीं है  इसी मानसिक तनाव का सामना कई अन्य महिलाएं भी कर रही हैं।

देखते ही देखते ऐसी महिलाओं का एक समूह बन जाता है और वे एक दूसरे को सांत्वना देती हैं, कुछ हमारे प्रसिद्ध आलकोहोलिक्स अनानमस की तरह। इस प्रकार, ऐसी महिलाओं को एक समान कार्य करने के लिए कहने के पीछे का विचार यह था कि वे एक सहायता समूह बना सकें, विचारों और संभावित समाधानों के साथ एक-दूसरे की मदद कर सकें।

मैं प्राचीन भारतीयों की दूरगामी सोच और सटीक समझ का कायल हो गया – उन्होंने न केवल दिन-प्रतिदिन की समस्याओं का समाधान किया, बल्कि जटिल मनोवैज्ञानिक समस्याओं का भी निवारण खोज निकाला।

Featured Image: Maharashtrian lady (Raja Ravi Varma)


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