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महर्षि अगस्त्य – भाग २

अगस्त्य

पिछले अंक में हमने यह जाना था कि महर्षि अगस्त्य आर्यों की उस महान ऋषि परंपरा से थे जिनके द्वारा स्थापित पीठ के उत्तराधिकारी भी उनके नाम से ही जाने गये। 

आइये आगे पढ़ते हैं…

अगस्त्य सुदूर दक्षिणी सिरे पर पांड्यों के राज्य स्थित कुमार कार्तिकेय के स्कंधावार जैसे आश्रम में पहुंचे  जो तारकासुर का वध करने के पश्चात महारुद्र से रूठकर तमिल भाषी जनसमूहों के बीच आ बसे थे। वहां उनके जनहितकारी कार्यों ने उन्हें लोक में इतना पूजित कर दिया कि उन्हें स्थानीय देवता “मुरुगन” के रूप में ही पूजा जाने लगा था। यहाँ उन्होंने  कुमार कार्तिकेय के चरणों में बैठकर स्थानीय भाषा तमिल सीखी तथा  विभिन्न युद्ध कलाओं का अभ्यास रुद्रों की परंपरा में नये सिरे से किया।

स्वयं कद में छोटे होने के कारण उन्होंने महारुद्र शिव द्वारा विकसित  विश्व की पहली मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण कार्तिकेय से लिया तथा उसे स्थानीय आबादी को भी सिखाया ताकि वे राक्षसों के हमले व जंगली पशुओं से स्वयं का बचाव कर सकें। उनके द्वारा प्रचारित यह शैली “वर्म्मक्कलै” के नाम से कलारी आर्ट का पहला स्कूल बनी।

दक्षिण का द्वार खुल जाने के कारण वानर, ऋक्ष, जैसी टॉटेम आधारित किंपुरुष जातियाँ वर्तमान कर्नाटक के किष्किंधा क्षेत्र में बसने लगीं। गरुड़ों की बस्तियां  गोमांतक अर्थात गोआ क्षेत्र में तथा यक्ष बस्तियां आंध्र क्षेत्र में फैलने लगीं।

लंका स्थित राक्षसों ने खतरा भांप लिया तथा दक्षिण भारत पर आक्रमण किया लेकिन देवगण पहले ही पहुंच चुके थे। राक्षस बुरी तरह पराजित हुये तथा लंका के दुर्ग को खाली करके भाग गये।

लेकिन कालिकेय अभी भी शक्तिशाली थे तथा वे नौकाओं में आकर तटवर्ती क्षेत्रों में बसे तमिल जातियों के गांवों में हत्या, लूट तथा बलात्कार के तांडव मचाकर वापस समुद्र में भाग जाते।

इंद्र ने एक सैन्य टुकड़ी भेजी लेकिन कालिकेय उनके हाथ नहीं आ रहे थे। एक बार फिर अगस्त्य से संपर्क किया गया।

अगस्त्य ने नारियल के तनों के चपटे बेड़ों व विशाल नावों पर आधारित “जन-नौसेना”  का निर्माण किया।

कालिकेय फिर आये पर इस बार आर्य, देव तथा तमिल सेनायें अगस्त्य के नेतृत्व में तैयार थीं। कालिकेय पीछे हटे लेकिन नावों के बेड़ों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। ऐसे ही एक बेड़े पर कमर तक पानी में खड़े अगस्त्य को नेतृत्व करते देख मिथक जन्मा कि उन्होंने समुद्र को पीकर सुखा दिया तथा समुद्र केवल उनकी कमर तक गहरा था।

चारों ओर शांति स्थापित हो गई तथा अगस्त्य भी रचनात्मक कार्यों में व्यस्त हो गये।

उन्होंने तमिल व्याकरण की रचना की, पांड्यों के यहाँ प्रथम संगम का निर्देशन किया। स्थानीय तमिल जातियों को उन्नत कृषि, गोपालन की उच्च तकनीकें तथा नौ परिवहन सिखाया।

चारों ओर शांति स्थापित हुई  लेकिन यह शांति आने वाले एक ऐसे भयानक तूफान से पहले की शांति भर थी जो बाली से लेकर अफ्रीका के तटों तक तथा लंका से अफगानिस्तान तक अपना असर छोड़ने वाला था।

हुआ कुछ ऐसा कि सुदूर उत्तर से पुलस्त्य कुल के कुछ आर्य कबीले भी आंध्र में आ बसे थे जिनके कुलपति थे विश्रवा। विश्रवा के दो पुत्र हुये जो बहुत योग्य निकले।

छोटे पुत्र ने कैलाश पर महारुद्र के संरक्षण में शिक्षा प्राप्त की।  वह यक्षों के संरक्षक पद “कुबेर” पर नियुक्त किया गया तथा निर्जन पड़ी लंका में यक्षों के साथ बस गया।

इधर ज्येष्ठ पुत्र ने अगस्त्य आश्रम में शिक्षा प्राप्त की तथा  द्वितीय अगस्त्य के रूप में पीठ के कुलपति बने। उन्होंने पूर्व अगस्त्य द्वारा विदर्भ के राजा को गोद  गई एक अनाथ कन्या से विवाह किया तथा उसे पूर्व कुलपति पत्नी की ही उपाधि दी-”लोपामुद्रा”।

लोपामुद्रा द्वारा धन की इच्छा व्यक्त करने पर उसे पूरा करने के प्रक्रम में उन्होंने अपनी यात्रा प्रारंभ की तथा वर्तमान महाराष्ट्र में बादामि नामक स्थान पर  इल्वल तथा वातापि नामक दो राक्षस व्यापारियों के आतंक से संसार को मुक्ति दिलाई जो भोजन निमंत्रण के बहाने छलपूर्वक ऋषियों की हत्याएं करवा रहे थे।

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