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आयुर्वेद की कथा – तृतीय भाग – सुश्रुत संहिता


धन्वंतरि समारम्भां, जीवकाचार्य मध्यमाम् ।
अस्मद् आचार्यपर्यन्ताम्
, वन्दे गुरु परम्पराम् ॥

हम पहले ब्रह्मा से आरम्भ हुई और इंद्र द्वारा ऋषि भारद्वाज तक लाई गयी आयुर्वेद की ऋषि परंपरा की बात कर चुके हैं। वृद्ध-त्रयी के सुश्रुत जिस परंपरा में आते हैं उसे भास्कर परंपरा भी कहा जाता है। भास्कर परंपरा के अनुसार, सृष्टि के सर्जक ब्रह्मा से आयुर्वेद का ज्ञान सूर्यदेव को प्राप्त हुआ। सूर्यदेव ने आयुर्वेद का ज्ञान भगवान धन्वंतरि को दिया। समुद्रमंथन के समय धन्वंतरि का लोक में आविर्भाव हुआ। उन्होंने पृथ्वी पर आयुर्वेद का ज्ञान ऋषि भारद्वाज को दिया।

सुश्रुत संहिता, गरुड़ पुराण, हरिवंश पुराण के अनुसार प्रथम धन्वंतरि फिर से मृत्युलोक में अवतरित हुये। उन्होंने काशी नरेश धन्वराज के पुत्र दिवोदास के रूप में जन्म लिया। उन्होंने इस भूमंडल पर अष्टांग आयुर्वेद का उपदेश किया। फिर दिवोदास धन्वंतरि ने विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत को ये ज्ञान दिया। सबसे पहले शल्य (सर्जरी) की बात महर्षि सुश्रुत ने करी थी। वेदों में जो जो विभाग हैं, उन्हें लेकर सुश्रुत ने एक परंपरा चलाई, जो सुश्रुत संहिता नाम से ग्रथित हुई।

सुश्रुत परंपरा में दो प्रकार के सुश्रुत का वर्णन है, एक वृद्ध सुश्रुत हैं जिन्होंने ये ग्रंथ लिखा और प्रतिसंस्कार सुश्रुत ने किया। उसके बाद के काल में वह दूषित होने लगी, जिसके संशोधन का कार्य नागार्जुन ने किया । वह सुश्रुत के प्रसिद्ध प्रतिसंस्कर्ता माने जाते हैं। दोनों संहिता की परंपरा के मूलभूत विषय एक ही हैं परंतु केंद्र बिंदु अलग हैं।

प्रसिद्ध आयुर्वेद टीकाकार चक्रपाणि की सुश्रुत पर मधु-कोष व्याख्या प्रसिद्ध है। सुश्रुत की 10-15 प्रामाणिक व्याख्या उपलब्ध हैं। विशेषकर डलहनाचार्य की सुश्रुत व्याख्या बहुत प्रसिद्ध है।

सुश्रुत के विषय में आधुनिक काल की एक रोचक घटना का वर्णन यहाँ करना उचित है। इसका उल्लेख 1794 में छपी ब्रिटिश जेंटलमैन’स मैगज़ीन में मिलता है।

सन 1780 में मैसूर में आक्रमणकारी हैदर अली का राज्य था। हैदर अली और अंग्रेजों के बीच में मुठभेड़ें होता रहती थीं। अंग्रेजों की सेना में कार्यरत एक सैनिक सुल्तान के द्वारा पकड़ा गया। वह छोड़ देने के बाद पुनः ऐसा दुस्साहस न करे, इसलिए उसकी नाक काट दी गयी।

उसके अधिकारी कर्नल पुट को एक व्यापारी से कर्नाटक के सीमांत प्रदेश के एक गाँव में एक कुम्हार वैद्य के बारे में पता चला जो शल्य चिकित्सा (surgery) करके कटी नाक को जोड़ सकता था। वह वैद्य सुश्रुत परंपरा का वैद्य था। उस वैद्य ने सैनिक की नाक की सर्जरी करी, जिसे आजकल rhinoplasty (राइनोप्लास्टी) कहा जाता है। उसे तीन दिन तक वहाँ रखा गया, स्वस्थ होकर जब वहाँ अन्य लोगों से मिला तो किसी को देखा कर पता ही नहीं चला की उसकी नाक की शल्य चिकित्सा हुई है। जब कर्नल ने स्वयं बताया कि शल्य चिकित्सा हुई है और ध्यानपूर्वक देखने पर लोगों को कुछ चिन्ह भी दिखाई दिये तब उन्हें ये चमत्कार ही लगा कि नाक वापस जुड़ गयी। यह सबके लिए अविश्वसनीय था कि जैसे दो पृष्ठ आपस में जुड़ जाते हैं वैसे ही मनुष्य के शरीर के अंग को भी जोड़ा जा सकता है। कर्नल पुट ने अपने इस अनुभव को इंग्लैंड की संसद में विस्तार से बताया। उसकी बात सुनकर जोसफ कार्पो नामक एक प्रसिद्ध चिकित्साविद शल्य चिकित्सा सीखने भारत आया । सीखने की तीव्रतम इच्छा अभीप्सा बहुत बड़ा कारण होती है। 15 वर्ष यहाँ रहकर उसने शल्य चिकित्सा सीखी। फिर इंग्लैंड जाकर उसकी शाला (medical college) स्थापित करी । वहाँ चिकित्सकों को प्रशिक्षित किया और आज हम जिसे प्लास्टिक सर्जरी और राइनोप्लास्टी कहते हैं उसका विकास किया। वह अपने छात्रों को बताता था की कैसे भारत में गुरुकुल शिक्षा पद्धति से चिकित्सा भी सिखाई जाती है। वहाँ बहुतों की चिकित्सा भी करी जाती है, अधिकतर निःशुल्क होती है, और कभी कुछ लिया भी जाता है तो वह बहुत साधारण मूल्य होता है। पुरस्कार स्वरूप अथवा अपनी क्षमता के अनुरूप जो भी रोगी देता है, वह स्वीकार्य होता है। चिकित्सा जगत में जो पढ़ता है और जो पढ़ाता है, वह साथ-साथ चिकित्सा कर के भी सीखता चला जाता है।

ब्रिटानिका इनसाइक्लोपीडिया में भी ‘फादर ऑफ सर्जरी’ ढूंढे तो सुश्रुत का नाम अंकित है। विश्वभर में सर्जरी के लिए सुश्रुत को याद किया जाता है। भारत के किसी सर्जरी मेडिकल कॉलेज में सुश्रुत नहीं पढ़ाई जाती ।

सुश्रुत संहिता का केंद्रबिंदु शल्य चिकित्सा है (जैसे चरक का काय चिकित्सा है)।

किस अवस्था में शल्य की आवश्यकता होती है, उसमें किस प्रकार के साधनों का प्रयोग होता है/करना चाहिये, शल्य क्रिया कैसे करनी है, शल्य क्रिया के पश्चात क्या करना है, क्रिया के लिए मूर्छित कैसे करना है, जैसे अनेक विषयों का वर्णन सुश्रुत संहिता में प्राप्त होता है। सुश्रुत में ऐसे साधन का भी वर्णन है जिससे खड़े एक बाल के दो टुकड़े किये जा सकते हैं। जब न्यूरो सर्जरी होती थी तब मस्तिष्क की जो बहुत सूक्ष्म नसें हैं, उसकी सर्जरी के लिए इस साधन कैंची का उपयोग होता था । सुश्रुत में 127 प्रकार के साधनों का उनके चित्र सहित वर्णन मिलता है ।

सुश्रुत संहिता सब प्रकार की शल्य चिकित्सा के संदर्भ में विस्तार से बताती है। ये कल्पना शास्त्र नहीं है, अपितु वास्तविक धरातल पर सिद्ध हुई बात है । प्लास्टिक सर्जरी के लिए शरीर के किस भाग से त्वचा लेनी है, उसका भी वर्णन है।

अलग अलग ऋषि-मुनियों की अलग अलग विषयों में श्रेष्ठता है ये संस्कृत के जानकर जानते हैं जैसे –

निदाने माधव: श्रेष्ठ: – निदान में माधव को प्रधान माना जाता है ।

शारीरे सुश्रुत: स्मृतः – शरीर क्रिया विज्ञान (physiology) और शरीर रचना विज्ञान (anatomy) में सुश्रुत को याद किया जाता है ।

वाग्भट्ट को सूत्र में, आहार-विहार, विधि-निषेध में वाग्भट्ट को प्रमाण माना जाता है।

चरकस्तु चिकित्सके – चिकित्सा में चरक मुनि को प्रमाण माना जाता है।

(क्रमशः)

(इस श्रृंखला का प्रथम और द्वितीय भाग)

(Image credit: Dharmawiki.org)

 

 


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