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..अनोखा मोड़..


समन्दर की गहराईयों में रहने वाली एक मछली जिसे बाहर की इस दुनिया के बारे में कुछ भी नही पता, और अचानक उसे कुछ ऐसी शक्ति देकर बाहर भेज दिया जाए जिससे वह बाहर भी रह सकती है, तो उस समय जो उस मछली का अनुभव होगा कुछ ऐसा ही अनुभव मुझे अद्वैत वेदान्त के मास्टर्स कोर्स में प्रवेश मिलने पर मिला।

कुछ महीनों पहले जब मैं सामान्य छात्रों की तरह स्कूल में इंटरमीडिएट कर रही थी उस समय मेरे वर्तमान और भविष्य के बीच मे एकदम स्वच्छ, पारदर्शी शीशा था। मेरे पिताजी जो प्रिंटिंग का कार्य करते हैं तथा माँ जो एक सामान्य गृहणी हैं उन दोनों ने मेरे भविष्य की कुछ अलग ही कल्पना की थी। मैने भी उनकी तरह यही सोचा था कि मैं गणित और भौतिक विज्ञान आदि विषयों को आगे भी पढूंगी किन्तु अचानक से कुछ दिन पहले ही मुझे संस्कृत में उच्च शिक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा मेरे पथप्रदर्शक गीता परिवार के राष्ट्रिय उपाध्यक्ष डॉ.आशु गोयल जी द्वारा मिली। कुछ दिनों की चर्चा के बाद मैंने भी अपने जीवन को संस्कृत शिक्षा के सोपान पर ही प्रशस्त करना निश्चित कर लिया

इसे देव का सुयोग कहूं या मेरे पूर्वजन्मों का पुण्योदय या साक्षात भगवान व स्वामीजी की कृपा कि जिस समय संस्कृत में ही उच्चशिक्षा प्राप्त करने का निश्चय हमने किया उसी समय हमारे गुरुदेव प.पू. स्वामी गोविन्द देव गिरि जी महाराज को चिन्मय विश्वविद्यापीठ के ट्रस्टियों द्वारा इस अद्वैत वेदांत के विलक्षण कोर्स के बारे में सूचना प्राप्त हुई जिसके लिए वह सुयोग्य विद्यार्थियों का चयन करना चाहते थे। उन्होंने अपने प्रिय शिष्य डॉ. आशु गोयल जी को ऐसे कुछ छात्रों का चयन करने के लिए कहा और आशु भैया ने मुझे व मेरी दो मित्रों को इस विषय की सूचना दी। यह ऐसा हुआ जैसे एक स्वाति नक्षत्र की बूँद हजारों किलोमीटर का सफर तय करके स्वयं किसी सीप तक पहुँच कर मोती के रूप में परिणत हो जाती है।

प्रवेश परीक्षा की अच्छी तैयारी करके उसको उत्तीर्ण करना ही त्वरित लक्ष्य हो गया। ऋषिकेश में प्रवेश परीक्षा दी व उत्तीर्ण की सूचना पाकर दो ही दिन में अपने घर से २७०० किलोमीटर दूर पांच वर्षों के लिए एक अनजाने, अकल्पनीय जगत के लिए प्रस्थान किया । यहाँ आने के बाद एक नए जगत से परचिय हुआ। आचार्यों के बीच संस्कृत माध्यम में गुरुकुल पद्धति से पढ़ना यह ऐसा हो गया जैसे पहले मानो मुझे दुनिया किसी और रंग की दिख रही थी और एकाएक किसी दूसरे ही रंग में सब कुछ दिखने लगा। केरल की भाषा अलग, वेशभूषा अलग, भोजन आदि भी अलग था किंतु बहुत ही जल्दी मैं यहाँ दूध में पानी की तरह मिलती चली गयी। यह विषय पढ़ने के बाद मुझे ऐसा लगा मानो मैं इसी के लिए बनी थी। मैं इसे बड़े ही रुचि के साथ पढ़ रही हूँ।

चिन्मय विश्वविद्यालय में आने के बाद प्रातः स्मरणीय हमारी संस्कृति के आधार स्तम्भ आद्य शंकराचार्य के जन्मस्थल का दर्शन कर हम अभिभूत हुए। इस दिव्य मनोरम प्राङ्गण की कल्पना तो मैं स्वप्न में भी नही कर सकती थी और उसके बाद प.पू. स्वामी चिन्मयानन्द जी का परिचय मिला, यह स्थान उनकी भी तपोभूमि रही व उनकी गहन साधना के स्वर आज भी इस प्राङ्गण में गूंजते हैं, यह अनुभव में आया।

शिशुपाल वध में कहा गया है क्षणेक्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः।अर्थात् जो हर क्षण नवीन लगे वही रमणीयता का रूप है।

इस वाक्य को विश्विद्यालय ने सम्यक् प्रकार से अंगीकृत किया। यही कारण है कि वेदान्त विषय के साथ अंग्रजी का ज्ञान व आधुनिक उपकरणों जैसेकम्प्यूटर और प्रॉजेक्टर आदि का प्रयोग तथा शास्त्राध्ययन हेतु किसी एक विशेष वर्ग समूह को ही प्रवेश दिया जाना चाहिए या स्त्रियों का प्रवेश वर्जित किया जाना चाहिए, ऐसी परम्पराओं में स्थिति व कालानुसार कुछ परिवर्तन किया गया। समाज की आवश्यकताओं को देखकर विश्वविद्यालय द्वारा उठाया गया यह कदम सभी के लिए अत्यंत लाभदायक है।

भारतीय संस्कृति की सेवा हेतु इस स्थान का चयन व इसकी संकल्पना करने वाले प.पू. स्वामी तेजोमयानंद जी महाराज के चिर स्पन्दन प्राप्त हुए और स्वामी अद्वयानन्द जी महाराज व स्वामी शारदानंद जी महाराज के दर्शन हुए व उनके आशीर्वाद प्राप्त हुए। ऐसे दिव्य महापुरुषों को साक्षात् अनुभव करना और उनके मार्गदर्शन में अपने जीवन का निर्माण करना मेरे लिए स्वप्नजगत के समान है।

इसके बाद मैं पीएचडी करना चाहती हूँ, मैं वेदान्त के अन्तरतम ज्ञान को जानना चाहती हूँ। मेरे जीवन का मुख्य लक्ष्य भगवद्गीता और संस्कृत व भारतीय संस्कृति का प्रचार व प्रसार है। इस विश्वविद्यालय में जहाँ गौरी मैंम, व तुलसी गुरुजी जैसे श्रेष्ठ विद्वत जनों का सान्निध्य मिला, प्रवेश प्राप्त करने के बाद अब मुझे पूर्ण विश्वास हो गया है कि मैं अपने जीवनलक्ष्यों को कुशलता से साधने योग्य बन सकूंगी।

The present author is a recipient of the Smt. Jayalakshmi Narasimhan Endowment for Women Journalists and Public Intellectuals.


Kavita Varma

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