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आयुर्वेद की कथा – चतुर्थ भाग – वाग्भट्ट

वाग्भट्ट की गरिमा कलियुग के प्रमुख वैद्य के रूप में प्रदर्शित है। क्योंकि उन्होंने कलियुग में आहार-विहार के नियम-सिद्धांतों का पालन न करने के कारण होने वाले रोगों व उनके निदान पर मुख्य कार्य किया है।

आयुर्वेद की कथा – तृतीय भाग – सुश्रुत संहिता

सबसे पहले शल्य (सर्जरी) की बात महर्षि सुश्रुत ने करी थी। वेदों में जो जो विभाग हैं, उन्हें लेकर सुश्रुत ने एक परंपरा चलाई, जो सुश्रुत संहिता नाम से ग्रथित हुई।

हिन्दू मंदिरों में शिव- भाग -४- स्थावर लिंगों का वर्गीकरण तथा स्वयंभू लिंग प्रतिमाएं

शिव के सभी स्वरूपों में सबसे प्रचलित एवं प्रख्यात भी लिंग प्रतिमाएं ही हैं लेकिन जब हम लिंग प्रतिमाओं के विषय में ज्यादा गहराई से जानने का प्रयास करते हैं तब कुछ अद्भुत एवं रहस्यमय तथ्य हमारे सामने प्रस्तुत होते हैं।

आयुर्वेद की कथा – द्वितीय भाग – चरक संहिता

आयुर्वेद को जानने के लिए वृद्ध-त्रयी का अभ्यास अनिवार्य है – चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा अष्टांग हृदयम्। इस भाग में जानिए चरक संहिता के बारे में।

शुभ दीपावली की कहानी

स्वयं दीप बनें

आइए ! इस दीपोत्सव की शुभ बेला में हम भी जलते दीपक के समान इन संदेशों को धारण कर अपने जीवन को अनंत प्रकाश से भर आनंद के सागर में अवगमन करें और अपने संपूर्ण व्यक्तित्व को राष्ट्रहित में समर्पित करें।

प्राचीन भारतीय वाङ्मय में घोड़े एवं उनका महत्व

घोड़ों को भारतीय वाङ्मय में सदैव ही महत्व प्रदान किया गया है। प्राचीन समय में वीर योद्धा अच्छी नस्ल के घोड़ों से खींचने वाले रथ पर युद्ध करते थे अथवा उनकी पीठ पर सवारी कर संग्राम किया करते थे। अतः यह स्वाभाविक है कि प्राचीन भारतीय इतिहास में घोड़ों का एक व्यापक साहित्यिक वर्णन हमे प्राप्त होता है।

मनु स्मृति- महिला और स्वतंत्रता (भाग-I)

“पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। रक्षन्ति स्थाविरे पुत्राः न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ।।” आज लगभग सभी लोग मनु स्मृति के इस श्लोक को इसके स्थापित किए गए गलत अर्थ के लिए जानते है। इस श्लोक को अक्सर हिन्दू धर्म में “महिलाओं की स्वतंत्रता” को नकारने और उन्हें सीमित करने के अंतिम प्रमाण के रूप में प्रचारित किया जाता है।