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तन्त्रयुक्ति- एक प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक-सैद्धान्तिकग्रन्थ निर्माण पद्धति- भाग -१

यह प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक ग्रंथों के बारे में ज्ञान की स्थिति है। कम ज्ञात तथ्य यह है कि भारत में वैज्ञानिक और सैद्धांतिक ग्रंथों के निर्माण के लिए एक पद्धति थी। यह तन्त्रयुक्ति का पद्धति है।

सामाजिक परिप्रेक्ष्य में श्रीमद्भगवत गीता का महत्व- मालिनी अवस्थी जी के साथ

इंडिक टुडे प्रस्तुत करता है श्रीमद्भगवत गीता और सामाजिक जीवन का समन्वय, श्रीमती मालिनी अवस्थी जी द्वारा। उनके साथ बातचीत कर रहे हैं “मैं मुन्ना हूं” और “रूही एक पहेली” उपन्यासों के लेखक श्री मनीष श्रीवास्तव।

हिन्दू मंदिरों में शिव – 7 – रावणानुग्रह मूर्ति

कैलाश पर्वत पर आह्लादक कर देने वाली ऋतु थी। अनन्त प्रतीक्षा के प्रतीक नंदी महाराज पर्वत की कंदराओं में विचरण कर रहे थे तभी बड़े धमाके से उस प्रदेश में कुछ आ गिरा। शान्त रमणीय स्थल पर अचानक हुए इस कोलाहल से आश्चर्यचकित नन्दी महाराज (नंदिकेश्वर) वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा कि एक बड़ा सा खेचरी यांत्रिक वाहन वहां पड़ा हुआ था और उसका चालक उसे वापस हवा में उड़ाने का निरर्थक प्रयास कर रहा था।

श्रीमद्भगवद्गीता- जीवन का मूल दर्शन

कुरुक्षेत्र की धर्म युद्ध पृष्ठभूमि में ५००० वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया जो श्रीमद्भगवदगीता के नाम से प्रसिद्ध है। यह कौरवों व पांडवों के बीच युद्ध महाभारत के भीष्मपर्व का अंग है। जैसा गीता के शंकर भाष्य में कहा है- तं धर्मं भगवता यथोपदिष्ट वेदव्यासः सर्वज्ञोभगवान् गीताख्यैः सप्तभिः श्लोकशतैरु पनिबन्ध । गीता में १८ अध्याय और ७०० श्लोक हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता- एक दृष्टिकोण

मानव सृष्टि के आदि में भगवान श्री कृष्ण के श्री मुख से नि:सृत अविनाशी योग अर्थात श्रीमद्भगवद्गीता जिसकी विस्तृत व्याख्या वेद और उपनिषद में है, उसी आदिशास्त्र को भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के प्रति पुनः प्रकाशित किया।

कौटिलीय अर्थशास्त्र में वर्णित स्वधर्म संकल्पना

इस लेख का प्रयोजन उपरोक्त चार वर्णों एवं आश्रमों के स्वधर्म को कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार विस्तार से चित्रित करना है। इस लेख में राजा द्वारा उसके साम्राज्य में स्वधर्म के संरक्षण एवं प्रबंध में उसकी भूमिका का भी वर्णन किया गया है।

हिन्दू मंदिरों में शिव- भाग – ५-मानुष लिङ्ग परिचय

शैव सम्प्रदायों में लिङ्गार्चा का विशेष महत्त्व है। सामान्य जन के लिए स्वयम्भू लिङ्ग तथा ज्योतिर्लिंगों का दर्शन दुर्लभ है इसीलिए मानवसर्जित लिङ्गपूजा का प्रारम्भ हुआ। शिवालयों में स्थापित मानुष लिङ्गों के निर्माण, आकार तथा प्रतिष्ठा के भी विशेष विधान हैं।