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सर्वत्र विद्यमान गणित

Indian Mathematics

This is a translation of Chandrahas Halai‘s article ‘Mathematics Everywhere‘ into Hindi, by Krishnanand Gaur.

लौकिके वैदिके वापि तथा सामायिकेऽपि य: ।
व्यापारस्तत्र सर्वत्र सङ्ख्यानमुपयुज्यते ॥
कामतन्त्रेऽर्थशस्त्रे च गान्धर्वे नाटकेऽपि वा।
सूपशास्त्रे तथा वैद्ये वास्तुविद्यादिवस्तुषु ॥
छन्दोऽलङ्कारकाव्येषु तर्कव्याकरणादिषु ।
कलागुणेषु सर्वेषु प्रस्तुतं गणितं परम् ॥
सूर्यादिग्रहचारेषु ग्रहणे ग्रहसंयुतौ ।
त्रिप्रश्ने चन्द्रवृतौ च सर्वत्राङ्गीकृतं हि तत् ॥

(सांसारिक जीवन में, वैदिक शिक्षा में, धार्मिक व्यवहार में, व्यवसाय में, हर वस्तु में, गणित उपयोगी है। प्रणय में, अर्थशास्त्र में, संगीत, नृत्य और नाटक में, खाना पकाने में, चिकित्सा में और वास्तुकला में, छंद, कविता, तर्क और ज्ञान में, व्याकरण, और सभी कलाओं में, गणित सर्वोच्च स्थान रखता है। इसका उपयोग सूर्य और अन्य खगोलिय ग्रहों के चाल की गणना में किया जाता है।)

बहुभिर्विप्रलापै: किं त्रिलोक्ये सचराचरे ।
यत्किञ्चिद्वस्तु तत्सर्वं गणितेन विना न हि ॥

(तीनों लोकों में जो कुछ भी है, जो चल और अचल जीवों के पास है-वे सब वास्तव में गणित से अलग होकर नहीं रह सकते।)

उपरोक्त श्लोक एक दिगम्बर जैन भिक्षु महावीर (जीवन काल ८१५-८७७ ईस्वी) द्वारा ईस्वी सन् ८५० के आसपास लिखी गई पुस्तक गणितासरसंग्रह से लिए गए हैं।

आप सोच रहे होंगे कि गणित के साथ कला का क्या मेल है? और तो और खाना पकाने के साथ गणित का क्या लेना देना? इसके उत्तर के रूप में, ये लीजिए, यहाँ भास्कराचार्य (भास्कराचार्य II) (जन्म १११४ ईस्वी सन) की पुस्तक लीलावती से एक प्रश्न है:

एकद्वित्र्यादियुक्त्या मधुरकटुकषायाम्लकक्षारतिक्तैः।
एकस्मिन् षड्रसैः स्युर्गणक कति वद व्यंजने व्यक्तिभेदाः ॥

(कितने अलग-अलग तरीकों से हम छह अलग-अलग प्रकार के स्वाद वाले पदार्थों का उपयोग करके एक व्यंजन को सजा सकते हैं – मीठा, कड़वा, नमकीन, खट्टा, तीखा और गर्म, एक बार में एक, फिर दो, फिर तीन और इसी तरह ६ तक)

भास्कराचार्य ने अपनी पुत्री लीलावती को गणित पढ़ाने के लिए ११५० ईस्वी सन में इस पुस्तक को लिखा था और इसका नाम अपनी पुत्री के नाम पर रखा था। यह पुस्तक जो पूरी तरह से पद्य रूप में लिखी गई है, इसमें अंकगणित, बीजगणित, ज्यामिति, क्षेत्रमिति, साहचर्य, संख्या सिद्धांत और अन्य मूलभूत विषयों को शामिल किया गया है। इस पुस्तक का उपयोग लगभग ७०० वर्षों तक एक मानक पाठ्यपुस्तक के रूप में किया गया था।

उपरोक्त पाक समस्या का आइए हम गणित का उपयोग करके हल करने का प्रयास करें –

सर्वप्रथम ऐसा सम्भव है कि मेरे आलसी स्वभाव के कारण हो सकता है कि मैं अपने व्यंजन की सजावट ही न करूं। अब, यह केवल एक तरीके से किया जा सकता है। इस उप-योग को याद रखें, १।

अब दूसरी सम्भावना ये है कि आलसी होने के बाद भी मुझे स्वादिष्ट खाना अच्छा लगता है और मैं छह सामग्रियों का उपयोग करके व्यंजन को सजा सकता हूँ। अब, यह केवल एक ही तरीके से किया जा सकता है। इस उप-योग को याद रखें, १।

अब मैं छह स्वाद बढ़ाने वाले अवयवों में से किसी भी क का उपयोग करके व्यंजन का स्वाद बढ़ा सकता हूँ। यह छह अलग-अलग प्रकारों से किया जा सकता है। उप योग = ६।

अगली सम्भावना में मैं छह में से किसी भी पाँच सामग्री का उपयोग करके पकवान को सजा सकता हूं। यह छह अवयवों में से किसी भी एक को छोड़कर प्राप्त किया जा सकता है। अब, यह छह अलग-अलग तरीकों से किया जा सकता है। उप योग = ६।

अब, मैं छह स्वाद वाले पदार्थों में से किसी दो का उपयोग करके पकवान का स्वाद बढ़ाना चाहता हूँ। यह कितने अलग-अलग तरीकों से किया जा सकता है?

लीलावती के उसी अध्याय में जिसमें से दी गई समस्या को लिया गया है, भास्कराचार्य ने किसी भी एक समय के लिए हमें दी गयी वस्तुओं(n) के संयोजन की संख्या(r) की गणना के लिए सूत्र दिया है-

आधुनिक अंकन के अनुसार वही सूत्र कुछ इस प्रकार प्रदर्शित होता है-

आइए इस सूत्र का उपयोग करके गणना करें कि मैं छह अलग-अलग स्वाद वाले पदार्थों में से किसी दो का उपयोग करके अपने व्यंजन को कितने तरीके से सजा कर सकता हूँ-
६ * ५
————- = १५
१ * २

सो यह सजावट १५ विभिन्न प्रकार से हो सकती है।

इसी प्रकार किन्ही भी तीन अवयव का उपयोग यदि किया जाए तो-
६ * ५ * ४
————————- = २०
१ * २ * ३
सो यह २० प्रकार से किया जा सकता है

अब अगर ४ पदार्थों का उपयोग किया जाए तो क्या होगा-
६ * ५ * ४ * ३
———————————- = १५
१ * २ * ३ * ४
सो इसका उत्तर हुआ १५

सो निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कुल १+६+१५+२०+१५+६+१= ६४ विभिन्न प्रकार से व्यंजन को सजाया या स्वादिष्ट बनाया जा सकता है।

यह उदाहरण प्रकट करता है कि प्राचीन और मध्यकालीन भारतीयों में गणित और दैनिक जीवन में इसके अनुप्रयोगों के बारे में कितनी जागरूकता थी। प्राचीन भारतीयों ने गणित को सबसे महत्वपूर्ण विषय माना। वेदांग ज्योतिष (५०० ईसा पूर्व) के इस श्लोक से यह स्पष्ट होता है-

यथा शिखा मयूराणां , नागानां मणयो यथा ।
तद् वेदांगशास्त्राणां , गणितं मूर्ध्नि वर्तते ॥

जैसे मोरों में शिखा और नागों में मणि का स्थान सबसे उपर है, वैसे ही सभी वेदांग और शास्त्रों मे गणित का स्थान सबसे उपर है ।


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