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श्री कृष्णा से रणछोड़ तक


विकिपीडिया तथा कई वेब समाचार एजेंसियां यह कहती हैं  “श्रीकृष्ण से कंस वध का प्रतिशोध लेने के लिए जरासंध ने कई बार मथुरा पर चढ़ाई की जिसके कारण भगवान श्रीकृष्ण को “मथुरा छोड़ कर भागना पड़ा” फिर वह द्वारिका जा बसे, तभी उनका नाम “रणछोड़” कहलाया।

यह पहली भ्रान्ति नहीं है जो फैलाई गयी है इस प्रकार की कई बातें आपको विकिपीडिया पर आज भी मिल जाएँगी। पिछले कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर इसके बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है और अब यह तो स्थापित हो चुका है कि सूचना के इस मध्यम पर लेफ्ट का पूरा अधिकार है। आज यह स्थापित हो चुका है कि लेफ्ट का यह हथकंडा कुछ नया नहीं है। इतिहास को तोड़ने मरोड़ने को लेकर काफी कुछ अब लिखा जा चुका है। आप यहाँ पर भी कुछ पढ़ सकते हैं।

फिलहाल लौट कर आते हैं “रणछोड़” नामकरण पर जिसके बारे में श्रीमद्भागवत महापुराण में दिया गया वर्णन भिन्न है। किन्तु उसके पहले किंचित पीछे की ओर चलते हैं और बात करते हैं महारथी जरासंध की जिनके युद्ध कौशल के बारे में प्राचीन समय में किसी को संदेह नहीं था। अपने बहनोई राजा कंस की श्री कृष्ण द्वारा वध किये जाने के पश्चात जरासंध ने पूरे दल-बल के साथ मथुरा पर चढ़ाई की थी। राजा दंतवक, चेदिराज, शिशुपाल, कलिंगपति पौंड्र, भीष्मक का पुत्र रुक्मी, काध अंशुमान तथा अंग, बंग, कोसल, दषार्ण, भद्र, त्रिगर्त आदि राजा इस युद्ध में उनके सहायक थे। इतना ही नहीं, जरासंध का इस युद्ध में साथ देने शाल्वराज, पवनदेश का राजा भगदत्त, सौवीरराज गंधार का राजा सुबल नग्नजित् का मीर का राजा गोभर्द, दरद देश का राजा तथा कौरवराज दुर्योधन आदि भी उसके सहायक थे।

सत्ताईस दिवस तक मगध की विशाल सेना मथुरा नगर के चारों फाटकों को घेर कर पड़ी रही किन्तु मथुरा के अभेद्य दुर्ग पर जरासंध विजय प्राप्त नहीं  कर सका और उसे निराश होकर मगध लौटना पड़ा। अगली बार जरासंध पूर्ण योजना के साथ मथुरा पहुँचा था किन्तु यादवों ने अपनी सेना इधर-उधर फैला कर लुका-छिपी के युद्ध द्वारा मगध-सैन्य को दोबारा से बहुत छकाया। श्रीकृष्ण को यह ज्ञात था कि यादव सेना की संख्या तथा शक्ति सीमित होने के कारण वह मगध की विशाल सेना का खुलकर सामना नहीं कर सकते इसीलिए उन्होंने लुका-छिपी वाला आक्रमण ही उचित समझा। इस कारण हताश जरासंध को एक बार पुनः विफलता का सामना करना पड़ा। पुराण कथाओं के अनुसार जरासंध ने अठारह बार मथुरा पर चढ़ाई की जिसमे सत्रह बार यह असफल रहा था। अंतिम चढ़ाई में उसने अपने मित्र शल्य के कहने पर विदेशी शक्तिशाली शासन कालयवन को भी मथुरा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।

यह “कालयवन” यवन देश का राजा था। वह जन्म से ब्राह्मण किन्तु कर्म से म्लेच्छ था। शल्य ने यह सहायता क्यूँ ली इसके पीछे भी एक कथा है जो लगे हाथों आपको सुनाता चलता हूँ। कालयवन ऋषि शेशिरायण का पुत्र था जो त्रिगत राज्य के कुलगुरु थे। ऋषि शेशिरायण को एक समय अपने एक अनुष्ठान के लिए बारह वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करना था। उसी अनुष्ठान के चलते किसी सभा में उन्हें “नपुंसक” कह दिया गया जो उन्हें चुभ गया। उन्होंने निश्चय किया कि वे तप द्वारा ऐसे पुत्र की प्राप्ति करेंगे जो अजेय हो एवं कोई योद्धा उसे जीत न सके।

भोले बाबा के सिवा और कौन उनको यह वरदान दे सकता था भला? भगवान शिव ऋषि शेशिरायण के तप से प्रसन्न होकर प्रकट हो  जाते हैं। प्रभु को सम्मुख देख ऋषि वरदान मांगते हैं कि-“मुझे ऐसा पुत्र दें जो अजेय हो, जिसे कोई हरा न सके। सारे शस्त्र निस्तेज हो जायें एवं कोई उसका सामना न कर सके”

महादेव ने तथास्तु कहा और बोले “तुम्हारा पुत्र संसार में अजेय होगा। किसी भी अस्त्र-शस्त्र से उसकी हत्या नहीं होगी। सूर्यवंशी या चंद्रवंशी कोई योद्धा उसे परास्त नहीं कर पायेगा”

यही दिया हुआ “वर” वह कारण था कि शल्य ने जरासंध को एक सलाह दी थी। वह सलाह यह थी कि जरासंध, कृष्ण को हराने के लिए कालयवन से सहायता मांगे। शल्य ने कालयवन को मथुरा पर आक्रमण के लिए मनाया और वह मान गया। कालयवन ने मथुरा पर आक्रमण के लिए सब तैयारियाँ कर लीं। दूसरी ओर जरासंध भी सेना लेकर मथुरा की ओर निकल गया। उधर कालयवन की सेना ने मथुरा को घेर लिया एवं मथुरा नरेश के नाम सन्देश भेजकर उन्हें ललकारा।

श्रीकृष्ण मुस्कुराये थे, संदेसा वापिस भिजवाया कि “युद्ध केवल उनके और कालयवन के मध्य होना चाहिए, सेना की हानि व्यर्थ में क्यों हो”।

कालयवन ने प्रसन्न हो कर यह निवेदन स्वीकार कर लिया था लेकिन अक्रूर और बलराम चिंतित थे और तब श्रीकृष्ण ने मुस्कुरा कर दोनो को शांत किया था। कृष्ण ने दाऊ बलराम को बताया कि वे राजा मुचुकुन्द द्वारा कालयवन को मृत्यु देंगे।

अब आप पूछेंगे कि यह राजा मुचुकुन्द कौन थे? तो साहब, राजा मुचुकुन्द त्रेता युग में ‘इक्ष्वाकु वंश’ के राजा थे अर्थात श्री राम के वंशज थे। मुचुकुन्द ने देवताओं और असुरों के बीच हुए युद्ध में देवताओं का साथ देकर दानवों का संहार किया था, जिस कारण देवता युद्ध में विजयी हुए थे। सदा की भांति इन्द्र प्रसन्न हुए थे एवं राजा मुचुकुन्द को वर मांगने को कहा था। राजा मुचुकुन्द ने वापस पृथ्वीलोक जाने की इच्छा व्यक्त की जिसपर इन्द्र ने उन्हें बताया था कि “पृथ्वी और देवलोक में समय का बहुत अंतर है जिस कारण अब पूर्व समय नहीं रहा। पृथ्वी पर उनके सब बंधु मृत्यु प्राप्त हो चुके हैं तथा उनके वंश का अब पृथ्वी पर कोई बचा नहीं है।”

राजा मुचुकुन्द ने दु:खी होकर वर माँगा था कि “वह तुरंत एक गहरी निद्रा में जाना चाहते हैं”

इंद्र ने उनको किसी निर्जन स्थान पर निद्रालीन हो जाने को कहा था। साथ ही ये भी वचन दिया था कि किसी भी समय यदि कोई भी उनकी निद्रा में विघ्न डालेगा तो मुचुकुन्द की दृष्टि पड़ते ही वह भस्म हो जायेगा।

और अब आप को पुनः लौटा कर ले चलता हूँ श्रीकृष्णा के “रणछोड़” नामकरण की कथा की ओर। यह कथा विकिपीडिया की नहीं बल्कि श्रीमद्भागवत महापुराण की है जिसके दशम स्कन्ध, अध्याय 51, श्लोक १-१२ के अनुसार-

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श्री शुकदेवजी कहते हैं- “प्रिय परीक्षित! जिस समय भगवान श्रीकृष्ण मथुरा नगर के मुख्य द्वार से निकले, उस समय ऐसा मालूम पड़ा मानो पूर्व दिशा से चंद्रोदय हो रहा हो। उनका श्यामल शरीर अत्यन्त ही दर्शनीय था, उस पर रेशमी पीताम्बर की छटा निराली ही थी; वक्षःस्थल पर स्वर्ण रेखा के रूप में श्रीवत्स चिह्न शोभा पा रहा था और गले में कौस्तुभमणि जगमगा रही थी। चार भुजाएँ थीं, जो लम्बी-लम्बी और कुछ मोटी-मोटी थीं। हाल के खिले हुए कमल के समान कोमल और रतनारे नेत्र थे। मुखकमल पर राशि-राशि आनन्द खेल रहा था। कपोलों की छटा निराली हो रही थी। मन्द-मन्द मुस्कान देखने वालों का मन चुराये लेती थी। कानों में मकराकृत कुण्डल झिलमिल-झिलमिल झलक रहे थे। उन्हें देखकर कालयवन ने निश्चय किया कि “यही पुरुष वासुदेव है।” क्योंकि नारदजी ने जो-जो लक्षण बतलाये थे- वक्षःस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न, चार भुजाएँ, कमल से-नेत्र, गले में वनमाला और सुन्दरता की सीमा; वे सब इसमें मिल रहे हैं। इसलिये यह कोई दूसरा नहीं हो सकता। इस समय यह बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के पैदल ही इस ओर चला आ रहा है, इसलिये मैं भी इसके साथ बिना अस्त्र-शस्त्र के ही लडूँगा।”

ऐसा निश्चय करके जब कालयवन भगवान श्रीकृष्ण की ओर दौड़ा, तब वे दूसरी ओर मुँह करके रणभूमि को छोड़ कर चल दिए। रणछोड़ भगवान लीला करते हुए भाग रहे थे; कालयवन उनके पीछे-पीछे दौड़ते हुए पग-पग पर यही समझता था कि प्रभु अब हाथ आये और तब हाथ आये।

कालयवन प्रभु पर आक्षेप करता रहा “अरे भाई! तुम परम यशस्वी यदुवंश में पैदा हुए हो, तुम्हारा इस प्रकार युद्ध छोड़कर भागना उचित नहीं है।” कालयवन कृष्ण की पीठ देखते हुए भागने लगा और इसी तरह उसका अधर्म बढ़ने लगा। क्योंकि माना जाता है कि भगवान की पीठ पर अधर्म का वास होता है और उसके दर्शन करने से अधर्म बढ़ता है। परन्तु अभी उसके अशुभ निःशेष नहीं हुए थे, और कृष्ण किसी को भी तब तक दण्ड नहीं देते, जबकि पुण्य का बल शेष रहता है।

जब कालयवन के पुण्य का प्रभाव समाप्त हो गया तो कान्हा कालयवन को अपनी लीलाओं में उलझाते हुए बहुत दूर एक पर्वत की कन्दरा में ले गये। यह वही कन्दरा थी जहाँ राजा मुचुकुन्द निद्रासन में था। प्रभु ने राजा मुचुकुन्द पर अपने वस्त्र डाल दिये किन्त्तु कन्दरा में प्रवेश करते हुए कालयवन को लगा कि श्री कृष्ण वहां छुप कर सो गए है।

स्मरण रहे कि मुचुकुन्द को देवराज इन्द्र का वरदान था कि जो भी व्यक्ति उसे निद्रा से जगाएगा, तब मुचुकुन्द की दृष्टि पड़ते ही वह जलकर भस्म हो जाएगा। कालयवन ने मुचुकुन्द को कृष्ण समझकर लात मारकर उठाया और क्रोधित मुचुकुन्द की दृष्टि पड़ते ही वहीं भस्म हो गया।

तो यह थी श्री कृष्णा के रणछोड़ होने की कथा और साथ ही यह भी बताता चलूं कि यह हमको इसलिए ज्ञात है क्यूंकि यह हमारे बुन्देलखंड के ललितपुर जिले में है।

रणछोड़ मंदिर गुजरात के द्वारका में स्थित है जिसका महत्व द्वारिका स्थित द्वारिकाधीश मंदिर से कम नहीं है। दोनों ही मंदिरों में मुख्य विग्रह रणछोडरायजी (श्रीकृष्ण) की प्रतिमा काले रंग के पत्थर से बनाई गयी है। बताया जाता है इस मंदिर का निर्माण पूना में पेशवा की अदालत के श्रोफ गोपाल जगन्नाथ की प्रेरणा सेभालचंद्रराव तथा उनके वंशजों ने सन १७७२ में करवाया था इसलिए मंदिर की नक्काशी में महाराष्ट्र के मंदिरों स्थापत्य शैली का प्रभाव है। इस मंदिर में विराजे कलात्मक सिंहासन को  वड़ोदरा के गायकवाड ने भेंट में दिया था।


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