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महाभारत तथा सर्प – एक विरल चित्ताकर्षक संबंध

महाभारत सर्प सांप 

महाभारत का वर्णन कैसे आरंभ होता है? निःसंदेह, हमें ज्ञात है कि महर्षि व्यास ने इसकी रचना की थी, और महाकाव्य का पहला सार्वजनिक अनुष्ठान जनमेजय के सर्प यज्ञ (सर्प-सत्र) में हुआ था, जहाँ उनके शिष्य वैशम्पायन ने व्यास जी के निर्देश पर इसे सुनाया था। यद्यपि हम जो महाभारत पढ़ते हैं उसका वर्णन लोमहर्ष के पुत्र उग्रश्रवा (सौति) ने नैमिषारण्य में ऋषि शौनक के आश्रम में बारह वर्ष के समयकाल में किया था।

महाभारत का प्रथम सार्वजनिक वर्णन युद्ध से जुड़े सभी पात्रों के देहांत के पश्चात हुआ था और ऐसे अन्तिम व्यक्ति महाराज परिक्षित थे। हां, यदि आप भूल गए हैं तो युद्ध में उपयोग किए गए अन्तिम शस्त्र का लक्ष्य परीक्षित जी ही थे।

चलिए, शुरू से शुरू करते हैं  – जनमेजय का सर्प-सत्र। इस सर्प यज्ञ का उद्देश्य तक्षक और उनके परिजनों का विनाश करना था। इस यज्ञ से संपूर्ण नागवंश के अस्तित्व का विनाश होने का भय था। यज्ञ की अग्नि में वास्तव में कई सर्प नष्ट हो गए। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि सर्प-सत्र समय से पहले ही अपने उद्देश्य को प्राप्त किए बिना समाप्त हो गया। इसे पहले अस्थाई रूप से रोका गया और फिर आस्तिक नामक एक युवा ब्राह्मण के कारण इस यज्ञ को पूर्ण रूप से रोक दिया गया।

चलिए इसे प्रश्नों के माध्यम से समझते हैं।

जनमेजय तक्षक का वध करना क्यों चाहते थे? क्योंकि नागराज के दंश से जनमेजय के पिता परीक्षित की मृत्यु हुई थी।

तक्षक ने परीक्षित को क्यों मारा? ऋषि शृंगी के श्राप के कारण तक्षक ने परीक्षित को दंश दिया।

ऋषि शृंगी कौन थे? और इस युवा ऋषि ने परीक्षित को एक सप्ताह के भीतर मृत्यु का श्राप क्यों दिया?

नाग के कारण, विशेष रूप से एक मृत नाग के कारण। एक बार आखेट खेलने निकले थके हुए और भूखे महाराज परिक्षित ने हिरण का पीछा करते हुए शृंगी के पिता ऋषि शमीक के संकल्प से अनभिज्ञ उनके कंधे के चारों ओर एक मृत सांप लपेट दिया। जब शृंगी को यह घटनाक्रम ज्ञात हुआ तब उन्होंने परीक्षित को तक्षक-दंश से मृत्यु का श्राप दिया।

तक्षक ही क्यों? हाँ, वह नागों के राजा थे, लेकिन विशेष रूप से तक्षक ही क्यों? इसके कारण बहुआयामी हैं। चलिए समन्वेषण करते हैं।

संयोगवश परीक्षित के पितामह अर्जुन ने श्री कृष्ण के साथ अग्नि देव के अनुरोध पर खाण्डव-वन को भस्मीभूत कर दिया था। खाण्डव को भस्म करने वाली उस प्रचंड अग्नि से तक्षक बच निकले किंतु उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई। तक्षक तभी से प्रतिशोध की ज्वाला से ग्रस्त थे। अर्जुन के विरुद्ध ना सही उनके पौत्र परीक्षित के विरुद्ध ही सही, श्रृंगी का श्राप तक्षक के लिए प्रतिशोध पूरा करने का कारण बना।

किंतु इसके लिए खाण्डव का प्रसंग एकमेव निमित्त नहीं बना। तक्षक के पुत्र अश्वसेन आग से बच गए थे और उन्होंने एक दशक से अधिक समय तक प्रतीक्षा की जो कर्ण के एक तीर पर आरोहण से समाप्त हुई। युद्ध के सत्रहवें दिन कर्ण ने उस तीर को अर्जुन पर चलाया था। कृष्ण के हस्तक्षेप के कारण भाग्यशाली अर्जुन बच गए, कृष्ण ने अपने पैर से पृथ्वी पर दबाव बनाया जिससे रथ कुछ इंच तक धरती में धंस गया। तीर ने अर्जुन का मुकुट भेद दिया, लेकिन उसका सिर नहीं भेद पाया।

तक्षक का दंश और परीक्षित की हत्या।

एक तरह से देखा जाए तो सर्प के कारण परीक्षित की मृत्यु के साथ महाभारत की कथा समाप्त होती है।

इस तरह से महाभारत की कथा के वर्णन के लिए भी सर्प ही कारणभूत बनते हैं, विशेष रूप से एक ही सर्प – तक्षक।

मैं इस महागाथा को एकमात्र अपूर्व रूप में वर्णन कर सकता हूं, महागाथा महाभारत की कथा कई प्रसंग बुनती है, प्रत्येक प्रसंग एक दूसरे से सर्पों और उनके प्रतिशोध के माध्यम से जुड़ा हुआ है, प्रत्येक प्रसंग के साथ सर्प-सत्र का यज्ञ अनिवार्य रूप से जुड़ा हुआ है।

जनमेजय के सलाहकारों ने राजा को उसके पिता की मृत्यु के समय की परिस्थितियों के बारे में नहीं बताया लेकिन उत्तंक ऋषि जनमेजय के दरबार में गए और उन्होंने महाराज को तुच्छ कार्यों में समय व्यर्थ करने के लिए निंदा करते हुए अपने पिता परीक्षित के मृत्यु का कारण बने तक्षक पर प्रतिशोध लेने के लिए प्रोत्साहित किया।

अब प्रश्न यह उठता है कि महाराज जनमेजय को सर्प-सत्र के लिए प्रोत्साहित करने वाले उत्तंक कौन थे? तथा उन्होने जनमेजय को क्यों उकसाया?

उत्तंक ऋषि आयोद-धौम्य के शिष्यों में से एक थे। जब आयोद-धौम्य के एक अन्य शिष्य वेद को यज्ञ में भाग लेने के लिए निकलना पड़ा तब उत्तंक को रुकने के लिए और अपने गुरु के घर की सेवा करने के लिए कहा गया। उसके बाद वह अपने गुरु की पत्नी के लिए उपहार के रूप में महाराज पौष्य की रानी के कर्ण-कुंडल प्राप्त करने के लिए गए। कुंडल प्राप्त करने के बाद जब उत्तंक घर लौटे, कुंडल को तक्षक ने चुरा लिया और उन्हीं कुंडलों को प्रतिष्ठित किया। उत्तंक ने इन कुंडल को फिर से प्राप्त किया और उन्हें अपने गुरु की पत्नी को उपहार में दिया। लेकिन तक्षक के विरुद्ध उनका क्रोध शांत ना हो पाया। तक्षक से प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से उत्तंक जनमेजय के पास गए।

जनमेजय के जो पुजारी-गण थे उनमें से एक थे सोमश्रवा जो श्रुतश्रवा के पुत्र थे। इनके बारे में कुछ ज्यादा उल्लेखनीय नहीं है, सिवाय इसके कि सोमश्रवा का जन्म एक सर्प के गर्भ से हुआ था!

तक्षक के बारे में और भी बहुत कुछ है और अभी एक और कारण भी है जिसके चलते उन्हें और सर्पों को सर्प यज्ञ में विनाश का सामना करना पड़ा। तो चलिए हम अपने आप से फिर से एक बार पूछें – तक्षक कौन थे?

तक्षक ऋषि कश्यप की दो पत्नियों में से एक कद्रू की चौथी संतान थे। दूसरी ऋषि पत्नी विनता थीं, जिनके पहले बेटे अर्ध-विकृत पैदा हुए और वह अरुण बने, जो सूर्य देवता के सारथी थे। कद्रू के पुत्र सर्प थे। एक तरफ तक्षक नागों के राजा बन गए तो दुसरी ओर शेष ने भक्ति का मार्ग चुना, उन्हें अनंत के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने पृथ्वी को धारण किया और कभी-कभी इन्हें विष्णु के अवतार के रूप में भी देखा जाता है। कद्रू ने अपनी सर्प संतानों को जनमेजय के सर्प-यज्ञ में विनाश का श्राप दिया था। उन्होंने अपनी ही संतानों के विनाश का श्राप क्यों दिया, यह कथा फिर कभी।

सांपों ने इस श्राप के प्रभावों से बचने या उन्हें कम करने के संभावित उपायों पर चर्चा की। अंततः उन्होंने अपनी बहन जरत्कारु का विवाह जरत्कारु नामक एक ब्राह्मण से करने का निर्णय किया। हां, एक ही नाम रखने वाले पति-पत्नी के पीछे एक कहानी है, लेकिन अभी इस कहानी को किसी और समय के लिए छोड़ देते हैं। जरत्कारु युगल का आस्तिक नामक एक बेटा था और उसी ने सर्प-सत्र को समय से पहले समाप्त कर दिया, जिससे सर्पों को विनाश से बचाया गया।

महाभारत सर्प सांप हम आस्तिक के बारे में कैसे जानकारी प्राप्त करते हैं? अपने पिता, प्रमति द्वारा रुरु को बताई गई एक कहानी के माध्यम से। रुरु ने प्रमति से पूछा, आस्तिक द्वारा जनमेजय के ब्राह्मणों द्वारा आयोजित सर्प-सत्र में रक्षित किए गए साँपों की कथा क्या है? एक ब्राह्मण, सहस्रपात के कारण, जो स्वयं दुंदुभ (एक विषरहित साँप) बनने के लिए शापित था।

ऋषि रुरु च्यवन और सुकन्या के पौत्र, प्रमिति और घृताची के पुत्र थे। उनका विवाह गंधर्वराज विश्ववसु और मेनका की पुत्री प्रमद्वरा से होना तय किया गया था। प्रमद्वरा को एक सर्प ने दंश दिया और उसकी मृत्यु हो गई जिसके पश्चात रुरु ने अपना आधा जीवन प्रमद्वरा को देने का वचन दिया और यम ने उसे पुनर्जीवित किया। इसी वजह से रुरु सर्पों को नापसंद करते थे।

ब्राह्मण सहस्रपात को सर्प बनने का श्राप क्यों दिया गया? यह ज्ञात हुआ है कि युवा सहस्रपात ने एक बार अपने ब्राह्मण मित्र खगामा को ग्रास से सर्प बना कर डराया था और भयभीत खगामा ने सहस्रपात को सर्प बनने का श्राप दिया और कहा कि इस श्राप से मुक्ति मात्र रुरु द्वारा संभव है।

जिस प्रकार पृथ्वी को धारण करने वाले और नारायण के आसन के रूप में विराजमान अनंत शेष एक अंतहीन सर्प हैं वैसे ही इस अंतहीन महाकाव्य महाभारत के आरंभ तथा अंत को सर्प जोड़ते हैं।

(This is a translation of original post by Abhinav Agarwal)


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