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प्राचीन भारत के गणितीय ख़ज़ाने- तीसरा भाग


(प्राचीन भारतीय के गणितीय खजाने, सलिल सावरकर के लेखों की एक नई श्रृंखला है, जो हमारे देश की समृद्ध गणितीय विरासत की हमसे पहचान कराती है। पहला भाग और दूसरा भाग यहाँ पढ़े | पढ़िए उसी श्रृंखला का तीसरा लेख )

संख्या जैसी अमूर्त वस्तुओं को समझने से ही गणित का प्रारंभ होता है। इस लेख में आइए हम इस बात की एक झलक पाने का प्रयत्न करते हैं कि वह क्या था जिसने हमारे पूर्वजों को गणितीय यात्रा करने के लिए क्या प्रेरित किया और वे कैसे इसमें इतना आगे बढ़ गए। डरिये नहीं, इसके लिए हमें अपने आप को विशुद्ध गणित से जोड़ने की आवश्यकता नहीं है। अन्य कई विषय भी हमारे पूर्वजों की सोच को अलग प्रकार से समझने में योगदान दे सकते हैं। आइए देखें कि इस विषय पर भाषा क्या कहती है। जैसे जैसे हम संस्कृत और अन्य भाषाओं को सीखते हैं, एक मूलभूत अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। जबकि अधिकांश अन्य भाषाओं में, केवल एकवचन और बहुवचन मिलते हैं, संस्कृत में हमें द्विवचन की उपस्थिति भी दिखाई देती है। हमारे पास  संख्या में “दो” वस्तुओं का वर्णन करने के लिए शब्दों के अलग-अलग रूप क्यों हैं, यह एक अच्छा प्रश्न है। परंतु उस से भी आश्चर्यजनक प्रश्न है कि यदि “द्विवचन” की आवश्यकता थी, तो हम इस से आगे क्यों नहीं बढ़े और त्रिवचन या चतुर्वचन क्यों नहीं बनाए?

पिछले लेख में, हमने देखा कि संख्या या अंक “दो” का वर्णन करने के लिए, हमारे पूर्वजों ने मानव शरीर के कारकों का स्वतंत्र रूप से शब्दों का उपयोग किया, जैसे, कर, बाहु, नयन, कर्ण आदि। यह शब्दावली बहुत कुछ बताती है! यह एक ज्ञात तथ्य है कि आध्यात्मिकता के क्षेत्र में भारतीय बहुत आगे थे और आज भी हैं। आध्यात्मिक अभ्यास बहुतदृढ़ता से आत्मनिरीक्षण की मांग करते हैं। और आत्मनिरीक्षण बहुधा हमारे शरीर से ही प्रारंभ होता है। कालिदास ने जो कहा था उसे याद करें: शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् (शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का साधन है।)

आइए हम स्वयं को ध्यान से देखें: मैं एक हूं। मेरा एक शरीर, एक आत्मा, एक मन, एक हृदय, एक बुद्धि है! इसी तरह मेरे दो हाथ, दो पैर, दो आँखें, दो कान हैं! लेकिन रुकिए अभी तो कई दूसरे अंग शेष हैं। दांतों, बालों, अस्थियों, रक्तवाहिनियों, मांसपेशियों, कोशिकाओं के बारे में भी सोचिए।  कहीं ये सब ही तो भाषा में “त्रिवचन” या चतुर्वचन” की अनुपस्थिति का कारण नहीं है? ध्यान दें कि मैं विभिन्न “एकल” कारकों और जोड़े में विभिन्न कारकों/ अंगो की बात कर रहा हूँ लेकिन उसके बाद क्या मेरे पास अंगो के कई त्रिक( triplet) या  चार का समूह (quadruplet) हैं ? हाथ, पैर, आंख आदि पर विचार करने के बाद, मुझे ज्ञात होता है कि मैं जो कुछ भी छोड़ रहा हूं, वह प्रचुर मात्रा में है! मेरे 32 दांत हैं, 200 से अधिक अस्थियाँ हैं, सैकड़ों मांसपेशियां हैं और लाखों बाल हैं। इस “बहुलता” के बोध ने भाषा को उसमें अधिक “संख्याओं” के समावेश को रोक दिया। लेकिन, एक ही समय में, गणित ने इसमें और अधिक शब्दों का समावेश जारी रखा। भास्कराचार्य 1(एक), 10(दश), 100 (शत), 100 (सहस्र) से लेकर  1017  (परार्ध) तक के अंकों की एक सूची देते हैं और कहते हैं कि, “सञ्ज्ञा: सङ्ख्याया: स्थानानां व्यवहारार्थं कृता पूर्वै:”, अर्थात्, ये संख्याएँ दिन-प्रतिदिन की प्रथाओं और प्रयोग के लिए बनाई गई हैं। नौवीं शताब्दी में, महावीरचार्य के लिखे हुए “गणितसारसंघ” में 1 (एक) से  1023 (महाक्षोभ) तक की संख्याओं का उल्लेख है। यह ध्यान रखना चितरंजक होगा कि रोमन संख्यात्मक प्रणाली में क्रमशः 50, 100, 500, 1000 के लिए L, C, D, M का प्रतीकों के रूप में प्रयोग था और ये बस वहीं रुक जाता है! प्रतीकों I, V, X, L, C, D, M के साथ, सबसे बड़ी संख्या जो कोई भी लिख सकता है वह 5000 से अधिक नहीं हो सकती है!

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि गणित केवल संख्याओं का खेल नहीं है। यह संख्याओं से शुरू होता है, लेकिन आकार और आकृतियों पर भी उतने ही प्रभावी रूप से काम करता है! भारतीयों ने विभिन्न आकृतियों के क्षेत्रों और आयतन की गणना में गहरी रुचि रखी है। ज्यामिति का एक महत्वपूर्ण पहलू समानता का है, जो त्रिकोणमिति की ओर जाता है, जो पहाड़ की चोटियों और समुद्रों और महासागरों की गहराई की गणना करने में अनुप्रयोग पाता है। हम में से बहुत लोगों ने निश्चित रूप साइन( sine), कोस(कोसाइन) और टेन(tangent, स्पर्शरेखा) के बारे में पढ़ा और सुना है। हमारे पूर्वजों को त्रिकोणमिति का गहरा ज्ञान था, जो उनके लिए उनके द्वारा पाए गए मूल्यों की तालिकाओं से स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। साइन(sine) और कोस(cosine) के लिए उनके द्वारा प्रयुक्त समानांतर शब्द थे ज्या और कोज्या। ध्यान दें कि ये शब्द समानांतर हैं और समानार्थी नहीं हैं। इसके लिए, कई बार विशेष रूप से बल देने की आवश्यकता होती है, क्योंकि स्वभाव से ही हम हम अपर्याप्त जानकारी के आधार पर अपनी राय बनाने और व्यक्त करने के लिए प्रवृत्त होते हैं! चाहे हम बधाई या निंदा करें, जब हम हमारी राय अधूरी जानकारी पर आधारित है, तो हम एक अनुचित काम कर रहे हैं! संस्कृत में तो ऐसी ही स्थिति के लिए सावधान किया गया है- “अल्पविद्या भयंकरी” |

कुछ विशेष कोणों के लिए ज्या के मान 225, 449, 671 आदि हैं। अब अगर हम मानते हैं कि ज्या साइन(sine) का पर्याय है, तो किसी भी सामान्य पाठक का यह विश्वास करना सही होगा कि भारतीय गणितज्ञों के अनुसार, कुछ कोण के ज्या( sine) का मान 225 या 449 है लेकिन किसी भी कोण के साइन(sine) का मूल्य 1 से अधिक कैसे हो सकता है? यह हमारे अपने पूर्वजों के गणितीय ज्ञान के प्रति अविश्वास की भावना पैदा कर सकता है। इसलिए, यह ऊपर कहा गया है कि ज्या और  कोज्या साइन(sine) और कोस(cosine) के समानांतर हैं, और समानार्थी नहीं हैं। इन शब्दों का सही अर्थ नीचे दी गयी आकृति से स्पष्ट होगा।

उपरोक्त आकृति में, C एक वृत्त का केंद्र है, AB एक जीवा( chord) है और CD, AB से अधोलंब(perpendicular) है, क्योंकि CD, AB को E पर काटता है। यदि मानें कि कोण ACE है, तो ज्या a ( sine a)  AE है जबकि कोज्या a (Cos a) CE है। जैसा कि दिख रहा है, कोण के लिए ज्या और कोज्या के मान आधुनिक गणना के साथ मेल नहीं खा रहे हैं! तो अब तक सब ठीक है! लेकिन फिर ऐसे मूल्यों का उपयोग क्या है? ध्यान दें कि वृत्त की त्रिज्या निश्चित है, 3438। यह केवल कोई वृत्त नहीं है! और अब, यदि मान 225, 449 आदि को 3438 से विभाजित किया जाता है, तो हम जो मान प्राप्त करते हैं, वह आधुनिक मूल्यों के बहुत निकट हैं। उदाहरण के लिए ज्या 30( sine 30) 1719 है। यदि हम इसे 3438 से विभाजित करें तो हमें 0.5 मिलता है, जो पूरी तरह से साइन 30 डिग्री से मेल खाता है। भारतीयों के पास “टैन” के लिए कोई भी शब्द (समानांतर या समानार्थी) नहीं था। शब्द उत्क्रमज्या ED  के लिए प्रायोजित है और इस कारण हमें “टेन”( Tangent) के साथ भ्रमित नहीं होना चाहिए।

निस्संदेह, शब्दों के अर्थ में इस विसंगति के कारण पर प्रकाश डालने के लिए, हमें और भी बहुत श्रम करना पड़ेगा। वर्तमान में यह हमारी चिंता का विषय नहीं है, इसलिए हम इस विषय को यहाँ छोड़ देंगे और इस विषय पर किसी और दिन विस्तार से चर्चा करेंगे, लेकिन त्रिकोणमिति के ज्ञान को ध्यान में रखना आवश्यक है, जो हमारे पूर्वजों के पास था।

चूंकि, हम समानता ( similarity) पर चर्चा कर रहे हैं, आइए हम थोड़ा संगीत की और चले और एक अलग प्रकार का आनंद प्राप्त करें। पश्चिमी संस्कृति में, किसी भी सुर को आधार सुर (सा) के रूप में माना जा सकता है और आपको उस सुर के संबंध में एक विशिष्ट सप्तक (octave) मिलता है। परंतु हमारे ग्रंथों में सा, रे, गा और इसी तरह की आवृत्तियों को विशेष प्रकार से निर्दिष्ट किया गया है। वास्तव में, विभिन्न संगीत सुरों की आवृत्तियों को निर्दिष्ट करने के लिए, प्रकृति में उपलब्ध कई अलग-अलग ध्वनियों को संदर्भित किया गया था। उदाहरण के लिए, अमरकोष निर्दिष्ट करता है कि मोर की ध्वनि को सा के रूप में संदर्भित किया गया था, जबकि कोयल की ध्वनि को प के रूप ने संदर्भित किया गया था, इसी प्रकार आगे भी संदर्भ उल्लेखित हैं। इसलिए पश्चिमी संगीत आधार सुर के लिए उदार है, जबकि मूल भारतीय संगीत प्रत्येक संगीत सुर के साथ विशेष प्रतीत होता है। इस कारण से माना जाता है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए हारमोनियम, पियानो, अकॉर्डियन जैसे उपकरण अनुपयुक्त हैं। एक संगीत राग C, E, G समान है C #, F, G # के। एक पैमाने से दूसरे में ऐसा परिवर्तन पश्चिमी संगीत में पूरी तरह से ठीक लगता है, लेकिन शायद हमारी संस्कृति और संगीत में इसकी अनुमति नहीं थी। क्या हमें गणित में एक ही चित्र नहीं मिलेगा? आधुनिक गणित में, त्रिकोणमिति के लिए किसी भी समकोण त्रिभुज पर विचार किया जा सकता है, परंतु हमारे पूर्वजों के लिए त्रिभुज के आकार का भी विशेष महत्व था। कुछ लोगों के लिए पश्चिमी विश्व अधिक उदार है, मैं कह सकता हूँ कि हम अधिक अनुशासित थे!

हमने थोड़ा पहले ज्यामितीय आकृतियों के क्षेत्रों और आयतन का उल्लेख किया। यदि किसी त्रिभुज की सभी भुजाएँ ज्ञात हैं, तो क्या हम उसी का क्षेत्रफल ज्ञात कर सकते हैं? उत्तर सकारात्मक है। इसे हेरॉन का सूत्र (Heron’s formula) कहा जाता है, लेकिन यह भारत के एक प्रख्यात गणितीय प्रतिभा ब्रह्मगुप्त को ज्ञात था। तब एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठ खड़ा होता है, कि फिर चतुर्भुज का क्षेत्रफल प्राप्त करने का वैसा ही समान सूत्र क्यों नहीं है? कारण सीधा है। चतुर्भुज के केवल चार पक्ष दिए गए हैं, उसी का क्षेत्र निश्चित नहीं है। इसके बाद, यदि कोई चतुर्भुज के क्षेत्र की गणना करने का प्रयत्न करता है, जिसमें केवल पक्ष की लंबाई( side length) दी गई है, तो देखें कि भास्कराचार्य इस पर क्या कहते हैं .

स पृच्छको पिशाचो वा वक्ता वा नितरां तत:। यो न वेत्ति चतुर्बाहुक्षेत्रस्यानियतां स्थितिम्॥

इसका लगभग हास्यास्पद अर्थ ये है कि जो भी व्यक्ति ऐसा मूर्खतापूर्ण प्रश्न पूछ रहा है वह पिशाच के समान है, यानि वह स्वयं मूर्ख है।

किसी त्रिभुज के क्षेत्र के लिए सूत्र का अस्तित्व, जो कि केवल उसके पक्षों पर आधारित है, यह बताता है कि हम इस तथ्य से अवगत थे कि दिए गए तीन पक्षों के साथ एक और केवल एक त्रिभुज उपस्थित है। यह निश्चित रूप से, सिर्फ एक अनुमान है, क्योंकि दो अलग-अलग त्रिभुज समान क्षेत्र वाले हो सकते हैं। चतुर्भुजों के विषय में इस तरह के एक सूत्र की अनुपस्थिति से पता चलता है कि वे जानते थे कि दिए गए पक्षों के साथ कई अलग-अलग चतुर्भुज संभव हैं।

भारतीयों ने न केवल बहुभुजों बल्कि चक्र में भी गहरी रुचि ली। एक वृत्त की परिधि और क्षेत्र को प्राप्त करने का प्रयास किया गया। मान 22/7 हमें ज्ञात है। हम इसे पाई (π) कहते हैं। हालाँकि पाई 22/7 के बराबर नहीं है और इसलिए 7 इकाई व्यास वाले एक वृत की परिधि 22 इकाई नहीं हो सकती है। यह 22 के आसपास होगा। इस घनिष्ठता को शब्द स्थूल द्वारा इंगित किया गया था। भास्कराचार्य कहते हैं –

द्वाविंशतिघ्ने विहृतेऽथ शैलै:। स्थूलोऽथवास्याद्व्यवहारयोग्य:॥

यदि किसी वृत्त का व्यास 22 से गुणा किया जाता है और तब उत्पाद 7 से विभाजित होता है, तो यह वृत्त की परिधि का अनुमानित या व्यावहारिक रूप से स्वीकार्य मान देता है।

वृत में रुचि ने भारतीयों को गोल के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया। यह वास्तव में प्रशंसनीय है कि उन्होंने पृथ्वी, चंद्रमा आदि जैसी आकाशीय वस्तुओं की त्रिज्या प्राप्त करने की कोशिश की, न केवल उन्हें बहुत सटीक आंकड़े मिले, इसके माध्यम से उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि पृथ्वी आकार में गोलाकार थी, अन्य संस्कृतियों से बहुत पहले। यदि पश्चिमी देशों ने उन दिनों में भारतीय ग्रंथों का अधिक गंभीरता से अध्ययन किया होता और भारतीयों के ज्ञान को महत्व देकर साथ में शोध और अध्ययन किया होता, तो विज्ञान और प्रौद्योगिकी के कितने ही चमत्कार कितने ही वर्षों या सदियों पहले विश्व को मिल जाते !

This article was first penned by Salil Sawarkar in English and was published here. It has been translated into Hindi by Krishnanand Gaur.


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