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प्राचीन भारत के गणितीय ख़ज़ाने – दूसरा भाग


प्राचीन भारत के गणितीय कोश सलिल सावरकर द्वारा लिखित शृंखला है जो हमारे देश की सम्पन्न गणितीय परंपरा की हमसे पहचान कराती है, उसी शृंखला में दूसरा भाग अब प्रस्तुत है। प्रथम भाग यहाँ पाया जा सकता हैं |

एक प्रगतिशील अथवा उन्नत समाज की पहचान कैसे की जा सकती है? यह एक कठिन प्रश्न लगता है; क्योंकि इसके लिए, इसके कई संभावित उत्तर हो सकते हैं! कुछ लोग इसे समाज में मानवीय-प्रकृति की व्यापकता के साथ, या दलित लोगों के प्रति करुणा के साथ जोड़ने की कोशिश करेंगे या एक बहुत ही सीधे अभिप्राय में योग्यतम की उत्तरजीविता से संबंधित मानेंगे।

परंतु, यदि हम स्वयं को केवल तकनीकी प्रगति तक ही सीमित रखते हैं, तो यह स्पष्ट है कि विभिन्न विज्ञानों के बारे में गहन जानकारी और उसके अनुप्रयोग एक उन्नत समाज की निशानी है, विज्ञान की महत्ता इस संस्कृत श्लोक से भी ज्ञात होती है-

विज्ञान दीपेन संसार भयं निवर्तते ॥

और फिर, जैसा कि कई शिक्षाविदों ने बताया, और हमने भी पिछले लेखों में अनुभव किया कि गणित के बिना, विज्ञान में सच्ची प्रगति संभव ही नहीं है।

हालाँकि इस लेख का उद्देश्य दूसरों के दोषों को इंगित करना नहीं है, लेकिन फिर इस तथ्य की उपेक्षा नहीं की जा सकती है कि आज का एक तकनीकी रूप से उन्नत यूरोप तीन से चार सौ साल पहले तक अज्ञानता के अंधकार में डूबा हुआ था जबकि भारत, लगभग निश्चित रूप से, शीर्ष पर था! ऐसा क्या था जिसने भारतीयों को तकनीकी ज्ञान में दूसरे सब लोगों से कोसों आगे रखा हुआ था।

एक वैज्ञानिक विचार या स्वप्न वास्तविकता में तभी बदल पाता है, जब इसे एक सशक्त गणितीय पृष्ठभूमि द्वारा समर्थित किया जाता है! मनुष्य अपने स्वभाव के कारण विश्व भर में होने वाले विभिन्न घटनाओं के बारे में उत्सुक रहा है। फिर चाहे यह यह प्रतिदिन घटने वाले सूर्योदय और सूर्यास्त हों, या रात में चमकदार आकाश, या यदा कदा होने वाले भूकंप, टकराव और धूमकेतु की सामयिक घटनाएं हों! लेकिन गणितीय ज्ञान की कमी ने दूसरों को अंधकार में रखा, वे लोग बस अनुमान लगा पाए या आश्चर्यचकित हुए और अंत में सब कुछ के लिए सर्वोच्च शक्ति को श्रेय मिला । गणित की स्पष्ट समझ ने भारतीयों को कई अन्य संस्कृतियों से आगे रखा।

गणित में अंक एक बहुत ही मूल वस्तु है, और भारतीयों का संख्या के बारे में एक स्पष्ट विचार था। हम जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में में संख्याओं और उनके विभिन्न कार्यों को सीखते हैं और समय के साथ उन पर महारथ प्राप्त कर लेते हैं! परिपक्व होने तक हम संख्याओं को इस सीमा तक स्वीकार कर लेते हैं, कि हम कभी आश्चर्यचकित नहीं होते कि ऐसी अमूर्त वस्तु कभी खोजी गई थी।

किसी वस्तु की १ के रूप में पहचान करना, कुछ दूसरी वस्तुओं को १ के समान नहीं मानना और यहां तक ​​कि शून्य की पहचान करना वास्तव में ज्ञान का एक प्रतीक था! भारतीयों ने न केवल संख्या की खोज की, वे स्पष्ट रूप से कुछ विशिष्ट मात्राओं की ‘संख्या’ को समझने में सक्षम थे, भले ही वह संख्या अस्तित्व में हो या काल्पनिक। यह तथ्य विभिन्न संख्याओं के लिए प्रयुक्त विभिन्न शब्दों के माध्यम से दिखाई देता है। ध्यान से देखने पर कोई भी एक स्पष्ट रूप से संबंधित संख्याओं के गणितीय अर्थ और सामान्य अर्थ के बीच समानता को देख पाएगा। इन उदाहरणों से प्रत्यक्ष होना बड़ा ही मनोरंजक होने वाला है।

संख्या अथवा क्रमांक १ के लिए, हमें चंद्र, सोम, शशांक, और इसी तरह के शब्द मिलते हैं। ये सभी शब्द चंद्रमा के पर्यायवाची हैं। इसी समय, भू, भूमि, मही जैसे शब्द भी १ के लिए उपयोग किए जाते हैं, जो पृथ्वी के समानार्थी शब्द हैं। इसलिए जब हम अच्छी तरह से जानते थे कि कोई भी वस्तु अद्वितीय थी, तो हमने स्वतंत्र रूप से संख्या १ का वर्णन करने के लिए उन शब्दों का इस्तेमाल किया। परब्रह्म या उच्चै: श्रवस् जैसे शब्द भी इसी उद्देश्य के लिए उपयोग किए गए थे। यह ध्यान रखना रोचक है कि पृथ्वी और चंद्रमा विद्यमान वस्तुएं थीं (और हैं), जबकि परब्रह्म और उच्चै: श्रवस् (कदाचित) काल्पनिक थे।

क्रमांक २ के लिए, उनके पास पूरे मानव शरीर में स्पष्ट विकल्प थे, जैसे कि हम मनुष्य के दो हाथ, दो आँखें, दो कान, जन्म से देखते आयें हैं! उन्होंने दो का वर्णन करने के लिए कर, बाहु, नयन, कर्ण का उपयोग करने में संकोच नहीं किया। इसी समय, अश्विन, और अयन (जो चलन का प्रतीक है) का भी उपयोग किया गया था।

हमने पहले लेख में भारतीयों के प्रसिद्ध ‘शून्य’ के बारे में चर्चा की है। जब हम संस्कृत ग्रंथों के माध्यम से जाते हैं, हमें शून्य का वर्णन करने के लिए पूर्ण, ख, आकाश, गगन जैसे शब्द मिलते हैं। हो सकता है कि हमारे पूर्वज यह कहने की कोशिश कर रहे हों कि, यह पूरा ब्रह्मांड सिर्फ एक शून्य है! निस्संदेह यह सिर्फ एक अनुमान है। दार्शनिकों ने इस पर अधिक प्रकाश डाला।

दशमलव प्रणाली वास्तव में हमारा महत्वपूर्ण योगदान है! लेकिन आधार के रूप में दस का उपयोग करने का क्या कारण हो सकता है? सम्भवतया ही कोई महान गुण दस से जुड़ा हुआ हो। पाइथागोरस दस को एक दिव्य संख्या के रूप में मानते थे, क्योंकि यह पहले चार पूर्णांक (१०=१+२+३+४) के जोड़ के बराबर है। हालांकि, पाइथागोरस और उनके शिष्यों ने संख्याओं और गणित की रहस्यमय शक्तियों पर स्वयं बहुत ही दृढ़ता से विश्वास किया।

यह कहा जाता है कि पाइथागोरस के शिष्यों में से एक को कड़ी सजा मिली थी, सिर्फ इसलिए कि उन्होंने २ के वर्गमूल ( √२) का सही उत्तर पूछा। यह संख्या दो पूर्णांक के अनुपात के रूप में नहीं लिखी जा सकती थी, और इस कारण यह पाइथागोरस के लिए यह अविश्वसनीय था। उसका विश्वास था कि कुछ बुरी वस्तु हमारे शुद्ध संसार या दिव्य दुनिया में लाई गई हैं।

विचार-विषय यह है कि, हमें इस तरह के अंधविश्वासों के बारे में चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। हमारी संस्कृति में दस का महत्व ग्रीक विद्वानों के अंध विश्वास के साथ कभी भी भ्रमित नहीं होना चाहिए। आज के कई विद्वानों द्वारा यह सुझाव दिया गया है कि दशमलव प्रणाली के आधार को दस के रूप में चुनने का कारण, इस तथ्य में निहित है कि हमारे हाथों की दस उंगलियां हैं, और गिनती करते समय, हम कालांतर से अपनी अंगुलियों के सहायता लेते आए हैं। और अब ध्यान से खोजें तो पाएँगे कि शब्द दस का वर्णन करने के लिए अँगुल शब्द का उपयोग कितने ही समय से हो रहा था! इसका उपयोग बीस की संख्या का वर्णन करने के लिए भी किया जाता है, जिसका कारण, अब स्पष्ट है।

ऐसे सभी शब्दों की एक सूची को पढ़ना बहुत ही रुचिकर है, यद्यपि यह इस लेख की सीमा से परे है। इसलिए हम उस शब्दावली पर ज्यादा ध्यान नहीं देंगे, लेकिन यह उल्लेख करना चाहेंगे कि संस्कृत के छंदों से गुजरते समय, यदि इन अर्थों पर ध्यान नहीं दिया जाता है, तो एक छंद पूरी तरह से अलग अर्थ प्राप्त कर सकता है या कई बार, शब्दों का पूरी तरह से अर्थहीन क्रम बन सकता है।

एक उदाहरण के रूप में, आइए देखें कि भास्कराचार्य अपने जन्म वर्ष के बारे में क्या कहते हैं।

रस-गुण-पूर्ण-द्वि-सम-साम-नृपसमये अभवत् ममोत्पत्तिः।

इससे पता चलता है कि जब एक वर्ष ‘रस-गुण-पूर्ण-मही’ जैसा था, तब उनका जन्म हुआ था। लेकिन रस-गुण-पूर्ण-मही का क्या अर्थ हो सकता है? यह माना गया कि छह मूलभूत पाक रस होते हैं, इसलिए रस क्रमांक ६ को इंगित करता है। इसी तरह, तीन गुण माने गए है सो दूसरा क्रमांक ३ मान लिया गया था। जैसा कि पहले से ही देखा गया है, पूर्ण का मतलब शून्य है, और मही का अर्थ है १, इसलिए हमें वर्ष ६३०१ के रूप में मिलता है।

एक और तथ्य जो संस्कृत ग्रंथों को पढ़ते समय ध्यान में रखना चाहिए, वह यह है कि संख्याओं को दाईं से बाईं ओर पढ़ा जाना चाहिए। तो, ६३०१ वास्तव में १०३६ को निरूपित करता है है। इसलिए भास्कराचार्य का जन्म शालिवाहन शक १०३६ या फिर ईसवी सन १११४ ( १०३६ में ७८ जोड़ने पर) में माना गया।

जैसे-जैसे हम विभिन्न संस्कृत छंदों के माध्यम से गणित में और गहरे जाते हैं हमें कुछ और आश्चर्यचकित करने वाले उदाहरण मिलते हैं। सूर्य के बारे में एक प्रसिद्ध सुभाषित है, जो इस प्रकार है:

रथस्यैकं चक्रं भुजगिमिताः सप्ततुरगा
निरालम्बो मार्गश्चरणरहित: सारथिरिप।
प्रपयन्तं याति प्रतिदिनम पापस्य नभस:
सत्यनिष्ठा: सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे।।

सूर्य के रथ के सात घोड़े और एक पहिया क्यों बताए गए हैं? क्या ऐसा था कि कवि किसी तरह यह बताना चाह रहा था कि एक श्वेत रंग सात रंगों में विघटित हो सकता है? या कि सात रंग मिलकर एक श्वेत रंग बनाते हैं? क्यों साँप से बनी थी बागडोर? सांप की चाल पर ध्यान डालें। यह हमेशा लहराती है, क्या ऐसा था कि प्रकाश की लहराती प्रकृति सांप के चाल के माध्यम से दिखाई गयी थी? क्या ऐसा है कि हमारे पास इस तरह के विचार थे? या यह केवल एक संयोग है? यदि ऐसा है, तो यह एक बहुत ही रुचिकर संयोग है!

हम सभी को ‘सूर्यनमस्कार’ का कुछ ज्ञान है। “सूर्यनमस्कार” करते हुए हम लोग “ओम आदित्याय नम:” का उच्चारण करते हैं। इसे एक प्रकार की शारीरिक गतिविधि माना जा सकता है, लेकिन तब हम ठीक बारह नाम ही क्यों लेते हैं?

वास्तव में, संस्कृत साहित्य में सूर्य के कितने ही और नाम हैं। अमरकोश में सूर्य के लिए 37 नाम हैं जिसमें सूर्य, आदित्य, भास्कर, रवि जैसे प्रचलित नाम और ब्रध्न, द्युमणि, और विकर्तन जैसे सामान्य नाम हैं। कोई भी एक तर्क दे सकता है कि केवल बारह नमस्कार हैं-और इसलिए हम सूर्य के १२ नामों का उच्चारण करते हैं! लेकिन, ऐसा भी तो हो सकता है कि १२ नाम एक तरह से वर्ष के १२ माह का प्रतीक हैं जो भारत में रोमन सभ्यता से सदियों पहले से विद्यमान रहे हैं।

गणपति के बड़े भाई को कार्तिकेय के रूप में जाना जाता है, क्योंकि उनकी मातायें कृतिका थीं! उन्हें षाण्मातुर के नाम से भी जाना जाता है , अर्थात, जिनकी छह माताएँ थीं। ये क्रमांक ६ कहा से आ गया है? एक पल के लिए मिथकों के बारे में भूल जाते हैं , और आकाश का निरीक्षण करने का प्रयत्न करते हैं! कृतिका नक्षत्र का अवलोकन करें। हम स्पष्ट रूप से छह तारों को देखेंगे!

वास्तव में यह तीसरा नक्षत्र कई तारों से बना है, लेकिन जब हम इसे देखते हैं, तो सामने के छह तारे (षट्भुज के रूप में) थोड़े अलग दिखाई देते हैं। इससे पता चलता है कि भारतीय न केवल गणितज्ञ थे, बल्कि उत्सुक आकाश पर्यवेक्षक भी थे, स्पष्ट रूप से गिनती करने में सक्षम थे, और फिर विभिन्न रूपों में ज्ञान को संरक्षित भी कर सकते थे।

पूरी तरह से अलग-अलग नामों या शब्दों का उपयोग करके संख्याओं को लिखने से उन्हें छंद बनाने में सहायता मिली, जो सीखना और स्मरण करना आसान था! प्राचीन काल के गणितज्ञों और बुद्धिजीवियों ने भी कदाचित अनुभव किया कि एक जिज्ञासु मन एक वैज्ञानिक दिमाग में विकसित होता है। इसलिए, रूपकों की जानकारी या उपयोग के गोपित करने की प्रवृति को अपनाया गया था ताकि यह मस्तिष्क की तार्किक तर्क क्षमताओं को बढ़ाए। संभवतः एक कारण यह भी है कि इस तरह से, वे ज्ञान को गोपित करने और छात्रों के लिए एक पात्रता मानदंड के रूप में इसका उपयोग करने में सक्षम बने।

This article was first penned by Salil Sawarkar in English and was published here. It has been translated into Hindi by Krishnanand Gaur.


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