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प्राचीन भारतीय वाङ्मय में घोड़े एवं उनका महत्व


घोड़ों को भारतीय वाङ्मय में सदैव ही महत्व प्रदान किया गया है। प्राचीन समय में वीर योद्धा अच्छी नस्ल के घोड़ों से खींचने वाले रथ पर युद्ध करते थे अथवा उनकी पीठ पर सवारी कर संग्राम किया करते थे। अतः यह स्वाभाविक है कि प्राचीन भारतीय इतिहास में घोड़ों का एक व्यापक साहित्यिक वर्णन हमे प्राप्त होता है।

वैदिक वाङ्मय में घोड़ों के बहुत से उदहारण सहज ही देखने को मिल जाते है। वैदिक काल से हमे यह ज्ञात होता है कि घोड़े ना सिर्फ मनुष्यो को लिए अपितु देवताओं के पूजन में भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। वेदों में उल्लेखित वाजिमेध यज्ञ में घोड़े का महत्व अच्छे से वर्णित है।

राजस्थानी चित्रकला शैली में घोडा , सौजन्य ब्रिटिश म्यूजियम 

अश्व शास्त्र के रचियता नकुल के अनुसार घोड़े धर्म और अर्थ को अर्जित करने में सहायक होते है। मनुष्य घोड़े के माध्यम से ही भूमि व सम्पदा अर्जित करता है। घोड़े यश, कीर्ति एवं विजय के संवाहक होते है। उस स्थान पर सब प्रकार के शुभ संकेत सहज विराजमान होते है जहां अच्छी नस्ल के घोड़े पाए जाते है। नकुल कहते है कि यदि किसी के प्रांगण में एक दिवस पर्यन्त यदि घोड़े का प्रवास हो जाए तो वह व्यक्ति समुद्र पर्यंत भूमि पर विजय कर सकता है और यदि किसी के पास सिर्फ घोड़ों की ही सेना हो तो उस व्यक्ति के निवास में साक्षात लक्ष्मी नारायण को छोड़ कर आ जाती है।

संग्राम के प्राण घोड़े ही होते है। उनके बिना किसी भी युद्ध की परिकल्पना करना वैसे ही व्यर्थ है जैसे चन्द्र के बिना रात्रि और स्त्री के बिना पुरुष। घोड़े का विशेषण है उसका अदम्य शौर्य और तटस्थता। संग्राम के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से घोड़े सर्वथा उचित पशु माने गए है। घोड़े सहजता से किसी भी प्रकार के परिवेश में अपने आप को ढाल सकते है साथ ही वह आस पास के परिवेश के प्रति सजग भी रहते है। घोड़ों को नियंत्रित कर सुनियोजित आक्रमण करना पल भर में बड़ी बड़ी सेनाओं को विचलित कर सकता है। वह बिना भोजन पानी के कई दिन सहजता से व्यतीत कर सकते है।

घोड़े पर बैठ युद्ध में जाते हुए राजा सम्मान सिंह, सौजन्य राष्ट्रीय संग्रहालय 

घोड़ों के विषय में सर्वोत्कृष्ट वर्णन 12वी शती में देखने को मिलता है। 12वी शती के चालुक्य नरेश सोमेश्वर के ग्रन्थ “मानसोल्लास” में घोड़ों को लेकर बड़ी ही विस्तृत रूप से जानकारी दी गई है। साथ ही इसी काल का “हरिहर चतुरंग” नामक ग्रन्थ जो कि गोदावर मिश्र द्वारा रचित है, वह भी इस विषय पर व्यापक प्रकाश डालते हुए विराजमान है।चालुक्य नरेश सोमेश्वर घोड़ों की प्रतिभा एवं गुणों से भली भांति परिचित रहे होंगे। उनके ग्रन्थ में यह भाव स्पष्ट है कि सही रूप से सुनियोजित घोड़े, सेना का बड़ा ही महत्वपूर्ण अंग होते है।सोमेश्वर ने घोड़ों को सिर्फ संग्राम और युद्ध तक सीमित ना रखते हुए उन्हें शांति एवं मनोरंजन का स्रोत भी माना है।

गोदावर मिश्र के अनुसार राजा को धर्म, अर्थ एवं काम को अर्जित करने के लिए घोड़ों का संरक्षण करना चाहिए। कालांतर में 14वी शती के जैन रचनाकार हेमसुरी ने “अश्व शास्त्र” नामक ग्रंथ में घोड़ों के महत्व एवं उनसे जुड़े विज्ञान का व्यापक साहित्यिक वर्णन किया है। भारतीय वाङ्मय में प्राचीन काल से मध्य काल तक घोड़ों की महत्व यथा रूप बनी रही।

कालांतर में युद्ध में विभिन्न प्रकार के अस्त्र एवं शस्त्र के आने के उपरांत घोड़ों की महत्ता में भारी कमी देखने के अाई। परंतु उसके बाद भी विश्व के सभी सेनाओं में घोड़ों की एक टुकड़ी देखने को सहज ही मिल जाती है।

सही काल तो नहीं बताया जा सकता परन्तु प्राचीन भारतीय ग्रंथ अश्व शास्त्र में नकुल द्वारा शालिहोत्र, सुश्रुत, गर्ग इत्यादि ऋषियों को अश्व शास्त्र का ज्ञाता बताया गया है। शालिहोत्र तो अश्व शास्त्र के प्रथम ज्ञाता बताए गए है। उनका नाम महाभारत में विभिन्न स्थानों पर उल्लेखित है। एक स्थान पर उनको घोड़े जैसी मेधा वाला बताया गया है।भगवान श्री कृष्ण एवं पांच पाण्डव अश्व शास्त्र के प्रकांड विद्वान थे। नकुल इसीलिए अश्व शास्त्र के रचयिता माने जाते है और ऐसा श्रुति परम्परा में विख्यात है कि इस ग्रन्थ की रचना में शालिहोत्र ऋषि द्वारा व्यापक सहायता प्रदान की गई थी। इसलिए शालिहोत्र के बाद पारंपरिक रूप से नकुल अश्व शास्त्र के ज्ञाता माने जाते है। यही कारण था कि महाभारत के युद्ध में वह पांडवो के सेना का व्यापक नियंत्रण कर रहे थे।

महाभारत के विराट पर्व से नकुल के अश्व प्रेम की व्यापक झलक देखने को मिलती है। विराटनगर में जहां विभिन्न पांडव अपना रूप बदल कर रह रहे थे, ऐसे में नकुल घोड़ों की देख रेख में लगे हुए थे। संभवतः वहीं उन्हें घोड़ों के इस विज्ञान की व्यापक जानकारी प्राप्त हुई होगी। घोड़ों के प्रति इतनी व्यापक जानकारी एवं सहज प्रेम के कारण ही शायद परवर्ती संस्कृत रचनाकारों ने अश्व शास्त्र का लेखक नकुल को माना है। संस्कृत वाङ्मय की यह परम्परा रही है कि लेखक अपना स्वामित्व दिखाने के बजाए किसी देवता, ऋषि, महापुरुष इत्यादि के नाम पर उस ग्रन्थ को आरोपित के देता है जिससे वास्तविक लेखक का नाम कभी भी प्रकाश में नहीं आ पाता। यह कहना कठिन है कि इसके वास्तविक लेखक नकुल थे या नहीं परंतु भाव रूप से उन्हें है इसका लेखक मान लिया जाता है।

घोड़ों के साथ बंदरो का अद्भुत संग प्राचीन इतिहास में जगह जगह देखने को मिलता है।पंचतंत्र के अनुसार घोड़े की अंत्येष्टि में बंदर की चर्बी का प्रयोग बताया गया है। साथ ही बाणभट्ट के कादंबरी में यही वर्णित है कि चंद्रपीड की घोड़ों की सेना के साथ बंदरो को भी भेजा गया ताकि वह किसी महामारी का ग्रास ना बन जाए। संभवतः बंदर के अंदर स्वाभाविक रूप से कोई गुण रहते होंगे जो कि घोड़ों के लिए हानिकारक जीवाणु को मारने मै सक्षम रहते हो।

घोड़ों से जुड़े विभिन्न संस्कृत ग्रंथो की सूची इस प्रकार है:-

१ अग्निपुरण अन्तर्गत अश्ववैद्यक
२ नकुल विरचित अश्व शास्त्र एवं अश्व चिकित्सा
३ कल्हण रचित शालिहोत्रसमुच्चय
४ हयलिलावती
५ जयदत्त सुरी विरचित अश्ववैद्यक
६ वर्धमान विरचित योगमंजरी
७ दीपांकर विरचित अश्ववैद्यक
८ भोज विरचित युक्तिकल्पतरू
९ वागभट्ट विरचित अश्व आयुर्वेद
१० सोमेश्वर विरचित मानसोल्लास

प्राचीन भारतीय वाङ्मय में घोड़ों का विभाजन निम्न आधार पर उल्लेखित है:

१ देश एवं क्षेत्र
२ गुण एवं रूप
३ शकुन एवं अपशकुन (शकुन रूप में वह घोड़े जो यश कीर्ति को लाए तथा अपशुकन रूप में वह घोड़े जो दुख वाम पराजय लाए)

अश्व शास्त्र के अन्तर्गत नकुल के अनुसार घोड़ों के निम्न परिवार भारत वर्ष में पाए जाते थे:

कम्बोज, बल्हिका, वान्यूज, गांधार, अरत्त, वाह्य, सैंधव, तैत्तिक, कुलज, उपकुलज, मेचक, उप मेचक, कैवर्त, अर्जुनीय, पर्वतीय यौधये,यवन, ह्रसयवन, तुषार, कदरे, अवंत्य, काश्मीर, सकनाना, पर्वत्य, उत्तरा, माद्रे, दाक्षिणेय,अंतर्दीपोदभव,कैकेय, अंभस्त, वासंतिक, सौवीर, कैरत, मालव, विंध्यक, कलिंग, मधुर, मानव, कौसल्य, अर्जुनय, पांचाल, सौराष्ट्र,पौंड्रक, कुक्कट, हैमवत, मगध  इत्यादि

नकुल ने बाद में घोड़ों को सत्व, राजस एवं तमस गुणों के आधार पर भी विभाजित किया है:-

सात्विक प्रवृत्ति के घोड़ों के प्रकार: ब्रम्ह, अर्ष, ऐंद्र, यम्य, कुबेर, वरुण एवं गंधर्व
राजसी प्रवृत्ति के घोड़ों के प्रकार: असुर, राक्षस, पिशाच, सर्प, पैत्र एवं शकुन
तामसिक प्रवृति के घोड़ों के प्रकार: पस्व, मत्स्य, वैरुध,
सोमेश्वर के अनुसार घोड़ों के प्रकार मापदंड भिन्न है। उनके अनुसार घोड़े उत्तमोत्तम, उत्तम, मध्यम और अधम गुण के ही होते है।

इसके साथ ही घोड़ों के बालो की संरचना यानी आवर्त के विषय में भी व्यापक जानकारी प्राप्त होती है। नकुल के अनुसार यह बाल घास के समान कोमल घोड़ों के शरीर पर होते है। नकुल के अनुसार घोड़ों के बालो की संरचना के आठ प्रकार है: आवर्त, सूक्ति, संघट, मुकुल, अवलिधक, सत्पदी, पादुकर्ध एवं पादुक।

घोड़ों के वर्ण को लेकर भी प्राचीन भारतीय वाङ्मय में विस्तृत वर्णन किया गया है। श्वेत वर्ण के घोड़ों को विप्र, लाल वर्ण के घोड़ों को क्षत्रिय, पीत वर्ण के घोड़ों को वैश्य एवं श्याम वर्ण के घोड़ों को शूद्र की संज्ञा दी गई है। इसके साथ ही अन्या अन्य वर्णों के भी नाम वर्णित है जैसे कि सन्नध, संविती, नागजातिय, ज्योतिष्मान, पंच भद्रक इत्यादि। भोज के अनुसार घोड़ो के वर्ण के निम्न प्रकार बताये गए है :-

चक्रवाक, श्यामकरण, अष्टमंगल, कल्याणपंचक एवं यमरूप

जयदत्त के अनुसार घोड़े के गंध से शकुन एवं अपशकुन मानकों का निर्णय किया जाता था। अच्छा घोड़ा वह है जिसकी गंध मन को शांति प्रदान करती हो और बुरा घोड़ा वह है जिसकी गंध मन को अशांत कर दे। नकुल के अनुसार कमल, चंदन, मधु इत्यादि के सम्यक गंध वाले घोड़े अच्छे तथा कीट, गधे, सुअर इत्यादि के सम्यक गंध वाले घोड़े बुरे माने गए है।

नकुल के अनुसार अपनी पद चाप को ऊंचा उठा कर गज, व्याघ्र, मयूर, हंस, हिरण, बंदर इत्यादि की चाल वाले घोड़े अच्छे माने गए है। लात मारने व अत्यधिक उछलने वाले घोड़े अच्छे नहीं माने गए है।

सोमेश्वर ने घोड़ों की गति को मुख्य रूप से तीन भागो में विभाजित किया है:

१ युद्ध काल में
२ मनोरंजन काल में
३ यात्रा काल में

युद्ध काल में घोड़े की गति को पुनः दो भागो में विभाजित किया है:

१ उच्चंघिरी: जिस घोड़े के लंबे लंबे पैर हो
२ मध्यपाद: जो घोड़ा समान रूप से चाल चले

मनोरंजन काल में घोड़े की गति को पुनः दो भागो में विभाजित किया है:

१ वक्रपाद: जो वक्र गति से चले
२ समपाद: जो समान गति से चले

यात्रा काल में घोड़े की गति को पुनः दो भागो में विभाजित किया है:

१ नीचपाद: जिसके घुटनों में घुमाव हो
२ स्तब्धपाद: जिसके घुटनों में स्तब्धता हो

शालिहोत्र ने घोड़ों की मानसिक स्थिति की भी व्यापक विवेचना की है। उनके अनुसार घोड़ों के अंदर निम्न मानसिक गुण होते है: भित्ति, हास्य, चांचल्य, प्रा हर्ष, धैर्य, कोप, दुख, हेसित, उत्साह, लज्जा एवं कार्य शकुन।

अतः प्राचीन भारतीय वाङ्मय में उल्लेखित उपर्युक्त उदाहरणों से यह बात तो भली भांति परिचित हो गई है कि भारतीय मनीषी गण ना कि मनुष्यो अपितु जीवो के प्रति भी सजग थे। सजगता का उत्कृष्ट उदाहरण और क्या ही होगा कि घोड़े की मानसिक स्थिति एवं उसके गुणों पर भी व्यापक एवं गंभीर रूप से प्रकाश डाला गया है।

“वसुधैव कुटुंबकम्” की पंक्ति को भारतीय वाङ्मय के विभिन्न ग्रन्थ चरितार्थ करते हुए विराजमान है। महाभारत काल से लेकर सोमेश्वर तक व उसके बाद के विभिन्न लेखकों द्वारा घोड़ों एवं उनके विभिन्न पक्षों पर डाला गया प्रकाश भारतीय ज्ञान कोश की व्यापकता का एक सुन्दर एवं सजीव उदाहरण है।

(यह लेख इंडिक टुडे की हिंदी निबंध प्रतियोगिता के विजेताओं में से एक के रूप में चुना गया था।)

(Featured Image credit: imithila.com)


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