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महाभारत और रामायण कब के ?

Ramayana Mahabharata

Indica Bhopal in association with Madhya Pradesh Young Thinkers Forum organized talk by Shri Nilesh Oak, on ‘Antiquity of Indian Civilisation’ on 20 January 2020 at Rajiv Gandhi Praudyogiki Vishwavidyalay, Bhopal.

Prof. Sunil Kumar Gupta, Vice Chancellor, Rajiv Gandhi Praudyogiki Vishwavidyalay chaired the event. Guests include dignitaries like Dr. Anand Singh, Principal, Institute of Hotel Management, Bhopal, Shri Deepak Sharma, Member, Prajna Pravah National Executive Board, Prof. RS Rajput, Director, University Institute of Technology, RGPV Bhopal, Shri Dhirendra Chaturvedi, Joint Director, School Education Department, Madhya Pradesh, and Shri Vijay Manohar Tiwari, State Information Commissioner, Madhya Pradesh.

Event was attended by around 250 comprising professors, college students, and other youngsters from different organisations like Young Thinkers Forum, Tooryanaad NIT Bhopal, Rashtrabodh IEHE Bhopal, and Shankhnaad RGPV Bhopal. Ritul Basu, Convener of Rashtrabodh IEHE and a member of Indica Bhopal team anchored the event. Event concluded with interesting questions-answers session.

Here is a detailed event report-

महाभारत और रामायण कब के?

सवाल ऐसा है, जिसका ठीक-ठीक उत्तर किसी के पास नहीं होता । सवाल है- भारतीय सभ्यता कितनी पुरानी है? इसे यूं भी पूछ सकते हैं- महाभारत का युद्ध कब हुआ था, या राम कितने साल पहले हुए ? समय की सरल रेखा में कुछ सौ या हजार साल पीछे की गणना इन सवालों के जवाब के लिए कोई एक ठीक-ठाक सिरे तक नहीं पहुंचाती । मान्यताएं हजारों और लाखों साल की अविश्वसनीय धारणाएं बनाती हैं । अप्रमाणिक उत्तर कई बार हास्यास्पद होते हैं । ऐसे में भारतीय सभ्यता के प्रति घात लगाए वामियों को मौका मिलता है यह कहने का, कि सब पोंगापंथी कहानियां हैं । मिथक हैं । कपोल-कल्पनाएं । कवियों के दिमाग की उपज ।

भोपाल के राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में आज नीलेश नीलकंठ ओक का व्याख्यान जिन्होंने सुना, वे पहली बार वैज्ञानिक ढंग से अतीत के अंधेरे विस्तार में किसी सिरे तक ले जाए गए । ओक अमेरिका में इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस साइंसेस में प्रोफेसर हैं । मूलत: मराठी भाषी हैं और 25 साल के अपने शोध के बूते, आज दुनिया भर में भारत की सभ्यता की प्राचीनता पर वैज्ञानिक आधार के साथ बात कर रहे हैं । वे खूब सुने जा रहे हैं । प्रश्नों का सामना कर रहे हैं । हर प्रश्न उन्हें उत्साहित कर रहा है । वे इन दिनों भारत की यात्रा पर हैं । इसी कड़ी में भोपाल आए ।

अब आप एक लाइन में उत्तर सुन लीजिए, काम आएंगे । अपने प्रभावशाली प्रजेंटेशन में ओक ने बताया, कि रामायण का समय ईसा से 12 हजार 209 साल पहले का है, और महाभारत 5 हजार 561 साल पहले । इनमें ईसा के 2020 साल और जोड़ लीजिए, तो आज से इन दोनों का सही समय मिल जाएगा । ये गणना किन साक्ष्यों के आधार पर की गई हैं ? महाभारत के सवा लाख श्लोकों में उन्हें 300 से ज्यादा ऐसे स्पष्ट साक्ष्य मिले, जो ग्रहों की स्थितियां बताते हैं ।

इन खगोलीय गणनाओं के गुणाभाग से यह कालखंड सामने आया । रामायण में तो ऐसे 600 से ज्यादा साक्ष्य हैं, जिन्हें अवधारणा, साक्ष्य, विषय, और आधारभूत ज्ञान के क्रम में वैज्ञानिक ढंग से कसकर यह कालखंड निकाला गया । हजारों सालों से भारत की स्मृतियों में सुरक्षित वे सारे साक्ष्य, ओक को मूल भाषा संस्कृत में कंठस्थ हैं । तिथि, पक्ष, मास, और ऋतु उनकी कालगणना के क्रमबद्ध आधार हैं, जो ग्रंथों में दर्ज खगोलीय संकेतों पर टिके हैं।

महाभारत को ही लें । वे भीष्म के निर्वाण की दर्ज तिथि पर ग्रहों की स्थिति को आधार बनाकर, समय के उस बिंदु तक पहुंचते हैं, जब ईसा मसीह (अंग्रेजों की कृपा से हमारा समय ईसा के कैलेंडर से ही शुरू होता है । यह भी गनीमत है कि अंग्रेज भारत आए । अन्यथा कोई और कैलेंडर हमारी दीवारों पर पहले से टंगा था । बस भारत कहीं आहत स्मृतियों में कराह रहा था। ) के 2020 साल से भी हजारों साल पहले हम ग्रहों की उन स्थितियों को पाते हैं, जो महाभारत की प्रमुख घटनाओं में सांकेतिक रूप से काव्यमयी शैली में अंकित और टंकित हैं । आस्थावश ही सही, भारतीय चेतना ने इन कथाओं को अपनी स्मृतियों में बसाए रखा । रामायण की घटनाओं में भी ग्रहों की वही स्थितियां कालखंड को तय करने में काम आईं, और जब ओक का शोध पूरा हुआ तो भारत की सभ्यता की प्राचीनता के एक बिंदु को दुनिया ने साफ देखा ।

अरब और तुर्क के जिन बेरहम हमलावरों और ब्रिटेन के धूर्त कारोबारियों ने, भारत को सदियों तक लूटकर राज किया, वे कैसे बर्दाश्त करते कि उनके कैलेंडरों के पीछे भी एक सभ्य संसार का अस्तित्व सिद्ध हो । बेरहम लुटेरों को तो शोध और विज्ञान से क्या लेना-देना था, लेकिन बदमाश अंग्रेजों ने भारत की हर प्राचीन कथा को ईसा के पीछे दो-ढाई या पांच हजार साल तक ही टटोला ।

ओक ने एक कार्टून दिखाया, जिसमें एक आदमी सड़क पर झुका हुआ है । पुलिस वाला पूछता है कि क्या खोज रहे हो ? वह बताता है कि सिक्का गिर गया है, उसे ही खोज रहा हूं । उसने पूछा-कहां गिरा था ? वह कहता है कि गिरा तो दो किलोमीटर दूर था । पुलिस वाला हैरत में पूछता है, कि फिर यहां क्यों खोज रहे हो ? वह इत्मीनान से जवाब देता है, कि यहां रोशनी बेहतर है, इसलिए यहां खोज रहा हूं ।

अंग्रेजों की रोशनी 2020 साल पहले थी । वे भारत की प्राचीनता को इसी के आसपास खोजते रहे । जो खोजा, हमने भी वैसा ही मान लिया । हमने इंडियन मायथोलॉजी कहने में गर्व महसूस किया । मायथोलॉजी । मिथ । मिथक । कपोलकल्पनाएं । पोंगापंथी धारणाएं ।

दिमाग को साफ करने वाले इस व्याख्यान के आयोजन के लिए विश्वविद्यालय और यंग थिंकर्स फोरम की टीम को धन्यवाद । यू-ट्यूब पर ओक के सौ से ज्यादा वीडियो हैं । 500 से ज्यादा ब्लॉग्स और तीन किताबें हैं । जितना जानो, उतना कम !


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