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मनु स्मृति- महिला और स्वतंत्रता (भाग-I)


पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थाविरे पुत्राः न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ।।
(मनु स्मृति
.9.3)

आज लगभग सभी लोग मनु स्मृति के इस श्लोक को इसके स्थापित किए गए गलत अर्थ के लिए जानते है। इस श्लोक को अक्सर हिन्दू धर्म में “महिलाओं की स्वतंत्रता” को नकारने और उन्हें सीमित करने के अंतिम प्रमाण के रूप में प्रचारित किया जाता है। फिर भी, अगर हम इस श्लोक को इसके विस्तृत परिपेक्ष में पढ़ेंगे, तभी यह समझ आएगा कि कैसे इस श्लोक के सही अर्थ को घुमा कर इसके प्रयोजन को विकृत किया गया है। आइए अब हम इस श्लोक का वास्तविक अर्थ को संदर्भ सहित समझने का प्रयत्न करते हैं।

सबसे पहले संदर्भ समझते हैं। मनु ने इस श्लोक को 9 वें अध्याय में पुरुषों और महिलाओं की धार्मिकता या कर्तव्यों का विवरण करते हुए लिखा है। वहाँ वह स्पष्ट रूप से कहते हैं, “अब मैं उन धर्मों के पालन के बारे में बात करूंगा, जब एक पुरुष और महिला धर्म के रास्ते पर चलते हुए पति और पत्नी के रूप में एक हो जाते हैं तथा जब यात्रा के दौरान ये एक दूसरे से दूर रहते हैं।”(मनु स्मृति 9.1)

यानि इससे पति और पत्नी के कर्तव्यों या यूं कहे इस श्लोक का संदर्भ एक गृहस्थ के लिए दिया गया है। अब यह देखते हैं कि आखिर मनु स्मृति के 9.3 श्लोक को किस तरह से अनुवादित किया गया है।

अक्सर इसका अनुवाद इस तरह किया जाता है कि, “एक स्त्री की रक्षा कौमार्य से पहले पिता को, उसके यौवन में पति को और बुढ़ापे में पुत्र को करनी चाहिए। इसी कारण, महिलाएं स्वतंत्रता के लायक नहीं हैं”.

यहाँ “रक्षति” का अर्थ “रक्षा करनी चाहिए” लगाया जाता है या अँग्रेजी में “should protect” लिखा जाता है, जबकि इसका अर्थ वर्तमान काल में केवल “रक्षा” लगाया जाना चाहिए था। इस श्लोक की भावना के अनुसार कई टीकाओं में इसी तरह का अनुवाद किया भी गया है।

आइये कुछ उदाहरण देख लेते हैं। मनुस्मृति पर सुप्रसिद्ध टीकाकारों की सूची में से मेधातिथि का नाम प्रमुख माना जाता है। उन्होंने लिखा है, रक्षतीति भवन्तिः लिङर्थे छान्दसत्वात् ततो रक्षेद् इति विधेयप्रत्ययः।

इसका अर्थ यह हुआ है कि वर्तमान काल के रक्षतिको संभावित मनोदशाके रूप में देखा जाना चाहिए अर्थात एक आदेश के रूप में। यह पिता, पति और बेटे तीनों का का अनिवार्य कर्तव्य या दायित्व है कि वे विभिन्न समय में स्त्रियों के जीवन की रक्षा करें। यानि दूसरे शब्दों में कहे तो यह श्लोक महिलाओं के सम्मान के साथ पुरुषों को उनके कर्तव्यों का बोध करा रही है।

अब आते हैं इस श्लोक के अंतिम वाक्य पर जिसे अक्सर “महिलाएं स्वतन्त्रता की अधिकारी नहीं है” के रूप में अनुवादित किया जाता है तथा वर्तमान समय में फेमिनिस्टों द्वारा निशाने पर लिया जाता है।

लेकिन, यह एक गलत अनुवाद है और श्लोक के सही संदर्भ की गलत व्याख्या करता है। आइए देखते हैं कि टिप्पणीकार इस भाग की व्याख्या कैसे करते हैं।

मेधतिथि ने इसकी व्याख्या कुछ इस प्रकार की है,

न स्त्री स्वतन्त्र्यम् अर्हति इति उच्यते। न अनेन सर्वक्रियाविषयम् अस्वातन्त्र्यम् विधीयते। किं तर्हि न अस्वतन्त्रा=अन्यमनस्कता स्वात्मसंरक्षणाय प्रभवति शक्तिविकलत्वात् स्वतः”

इसका अर्थ यह हुआ कि, “यहां गैरस्वतंत्रता को महिलाओं से संबंधित सभी मामलों में नहीं लिया जाना चाहिए, लेकिन जैसा महिलाओं की शारीरिक संरचना की प्रकृति है उसके कारण वे स्वयं की रक्षा करने में सक्षम नहीं हैं, इसलिए उनकी रक्षा की जानी है।”

इसी श्लोक के एक अन्य टिप्पणी में, टिप्पणीकार सर्वनारायण ने इसे पिता रक्षति कन्यादूषणादे:” के रूप में समझाया है, अर्थात पिता को बेटी को बेइज्जती / अवहेलना / छेड़छाड़ आदि से रक्षा करनी चाहिए।

वहीं मनुस्मृति के एक अन्य टीकाकार राघवानंद ने अंतिम भाग को कुछ इस तरह बताया है, “स्वातन्त्र्यं ऋषिक्रीतिथम्। यहाँ स्वातन्त्र्यं” का अर्थ है बिना रक्षक के यानि महिलाओं को रक्षक के बिना नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

इस कारण उसका सही अनुवाद यह होगा कि किसी भी स्त्री को असुरक्षित नहीं छोड़ा जाना चाहिए। अर्थात्, यह श्लोक कर्तव्य के बारे में बता रही है कि पुरुषों द्वारा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि स्त्री के साथ छेड़छाड़ न हो और वह सुरक्षित रहे।

इसलिए, यह स्पष्ट है कि इस श्लोक का अनुवाद कि महिलाएं स्वतंत्रता के लायक नहीं हैंसही अर्थ नहीं है और यह गलत तरीके से उन लोगों द्वारा व्याख्या की गई है, जिन्होंने इस श्लोक को सही तरीके से पढ़ा या अध्ययन नहीं किया है।

इसके अलावा, सुश्री टेरी ब्राउन ने अपनी पुस्तक ‘Essential Teachings of Hinduism’, हिंदू धर्म में महिलाओं के महत्व को कुछ इस तरह रेखांकित किया है कि हिंदू धर्म में, एक महिला की देखभाल इसलिए नहीं की जाती है क्योंकि वह अक्षम या असमर्थ है, बल्कि इसके विपरीत इसलिए की जाती है क्योंकि वह अमूल्य है। वह समाज का शक्ति और गौरव है। जिस प्रकार मुकुट के आभूषणों को बिना सुरक्षा के नहीं छोड़ना चाहिए, उसी तरह किसी महिला को भी असुरक्षित नहीं छोड़ना चाहिए। यदि हमारे पास कीमती गहने हैं, तो हम उन्हें पीतल के बर्तन की तरह यहांवहां नहीं फेंकते हैं बल्कि उन्हें संरक्षित करते है।”

वह मनुस्मृति पर अपनी टिप्पणी में व्याख्या करते हुए बताती है कि नारी स्वातंत्र्यमर्हतिका अर्थ यह नहीं है कि महिला एक दासी है। इसके बजाय, जब वह एक छोटी लड़की होती है, तो उसे पिता के संरक्षण की आवश्यकता होती है। जब वह विवाहित होती है, तो उसे अपने पति की सुरक्षा की आवश्यकता होती है।

जब जीवन का अगला पड़ाव आता है तो पति भी उनाके साथ अगले पड़ाव पर बढ़ता है तथा वह खुद की देखभाल करने की स्थिति में भी होती हैं, इसलिए उनकी देखभाल का कर्तव्य बेटों का है। दूसरे शब्दों में, महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी पुरुषों का कर्तव्य है।

इसके अलावा, मनु पहले पांचवें अध्याय में लिखा है, “बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत् पाणिग्राहस्य यवने। पुत्राणं भर्तरि प्रेते न भजेत्श्च स्वन्त्रताम्। ‘ (मनु स्मृति.5.148)

यहां भी उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा के बारे में लिखा है और उन्हें असुरक्षित न छोड़ने की बात भी कही है। नारद स्मृति ने भी महिलाओं की सुरक्षा का समर्थन किया है, जो कहता है कि पक्षवर्णसने तु राजा भर्ता स्त्रियाँ मत:”, जिसका अर्थ है, यदि महिला के दोनों पक्षों यानि उसके पिता और ससुराल से कोई भी उसकी रक्षा करने के लिए नहीं है, तो उनकी रक्षा का ध्यान रखना राजा का कर्तव्य है।

स्मृति चंद्रिका में भी यही कहा गया है कि, “रक्षेत्कन्यां पिता विन्नां पतिः पुत्रास्तु वार्धके। अभावे ज्ञातयस्तेषां न स्वातन्त्र्यं क्वचित्स्त्रियाः॥

यानि पिता को स्त्री के कन्यारहने पर उसकी रक्षा करनी चाहिए; फिर पति; और बुढ़ापे के दौरान, बेटों को उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए, अगर कोई बेटा नहीं है, तो उसके पति के परिवारजनों को उसकी सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए।

महाभारत में भी इसी अवधारणा को अष्टावक्र द्वरा समझाया गया है जब एक महिला उनसे शादी करने का अनुरोध करती है। अपनी तपस्या और चरित्र के लिए जाने जाने वाले ऋषि अष्टावक्र उस महिला से कहते हैं, “पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । पुत्रश्च स्थाविरे काले नास्ति स्त्रीणां स्वतन्त्रता ॥ (महाभारत 13-20-21 दानाधर्मपर्व में)

यह इंगित करते हुए कि वह उन लोगों से अनुमति के बिना उनसे शादी कैसे कर सकता है जो उनकी रक्षा करते हैं, क्योंकि, महिलाओं को बचपन, युवावस्था, और बुढ़ापे के उम्र में क्रमशः पिता, पति और बच्चों द्वारा संरक्षित किया जाता है।

यहाँ भी गैरस्वतंत्रताका उपयोग असुरक्षित न छोड़नेके अर्थ में प्रयोग किया गया है। इसके बारे में टिप्पणीकार नीलकंठ ने भी स्पष्ट किया गया है और उसकी अध्याय के श्लोक 14 की व्याख्या करते हुए बताया है कि– “नास्ति स्वतन्त्रता स्त्रीणाम्”कहता हैं: “नास्ति इति। अप्रदत्तां त्वां न कामये”, अर्थात कि आपकी रक्षा करने वालों की अनुमति के बिना भी मैं अपने मन में भी आपकी इच्छा नहीं रखूंगा।

कात्यायन स्मृति में कहा गया है, “सौदायिके सदा स्त्रीणां स्वातन्त्र्यं परिकीर्तितम्” (कात्यायन स्मृति 106) यानि हमेशा महिलाओं को संपत्ति में स्वतंत्रता होती है। “सदा स्त्रीणां स्वातन्त्र्यम्” पर जोर देना स्पष्ट रूप से दिखाता है कि महिलाओं को सभी स्वतंत्रता है। महाभारत के एक अन्य प्रसंग में, महाराज पांडु कुंती से कहते हैं: “नातिवर्तव्य इत्येवं धर्मं धर्मविदो विदुः। शेषेष्वन्येषु कालेषु स्वातन्त्र्यं स्त्री किलार्हति।। (महाभारत 1-122-26)

यहाँ पांडु कुंती को दुर्वासा से उपदेशके रूप में मिली मंत्र शक्ति का उपयोग करके संतान प्राप्त करने के लिए कहते हैं। हालाँकि, यहाँ का संदर्भ पूरी तरह से अलग है लेकिन यहाँ शब्दों को देखे तो यह कहता है कि, “महिलाएं ऋतुकाल के दौरान या अन्य समय में जब वे स्वतंत्र है तब अपने पति से प्रेम करने के लिए उल्लंघन नहीं करती हैं। यह दर्शाता है कि महिलाओं को स्वतंत्रता थी।

इसलिए, यह स्पष्ट है कि महिला विरोधी के रूप में प्रस्तुत किए गए मनु स्मृति के इस श्लोक में कुछ भी महिला विरोधी कुछ भी नहीं है। इसके बजाय, यह पुरुषों का कर्तव्य है कि वे यह सुनिश्चित करे कि स्त्रियाँ सुरक्षित रहे और किसी भी प्रकार से या प्रताड़ित न किया जाए।

(यह लेख रामानुज देवनाथन् द्वारा लिखित पहले आंग्ल भाषा में प्रस्तुत किया गया है)


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