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हिन्दू मंदिरों में शिव- प्रथम भाग


आदियोगी की जटाओं से प्रादुर्भूत पुण्यसलिला गंगा के निर्मल जल से कोई प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता, वैसे ही शिव के वैविध्यपूर्ण मनमोहक रूपों से भी कोई अछूता नहीं रह सकता। पौराणिक कथाओं के अनुसार दरिद्र, अशक्त, निर्धनों के आधार और चक्रवर्ती सम्राटों, राजाओं एवं धनिकों के आराध्य देव शिव सभी का कल्याण करते हैं।

शैव दर्शनों और शैवाख्यानों का असर भारतीय समाज पर प्राचीन समय से रहा है इसमें किसी संदेह का स्थान नहीं है। पौराणिक, दार्शनिक एवं प्रतिमाविज्ञान की दृष्टि से भी भगवान शिव का तथा उनकी लीलाओं का वर्णन हतप्रभ कर देने वाला है। अरण्यों में, गांवों में, महानगरों में, भारत के कोनेकोने में शिव प्रतिमाओं को विभिन्न रूपों में पाया जाता है।

जब शिव सर्वदेवों की शक्तियों को समाहित कर त्रिपुरासुरों का वध करते हैं तब उन्हें देवों के देव ‘महादेव’ कहा जाता है। समुद्र मंथन के दौरान जब हलाहल विष को वह अपने कंठ में धारण करते हैं तब उन्हें ‘नीलकंठ’ कहा जाता है। गंगा को अपनी जटाओं में धारण करते शिव ‘गंगाधर’ और तांडव नृत्य करते ‘नटराज’। कामदेव को भस्म करते ‘कामांतक’ और गजासुर का संहार करते ‘गजान्तक’। भैरव, वीरभद्र एवं जालंधर शिव। हर प्रसंग से जुड़ा शिव का नाम उनके व्यक्तित्व का विशिष्ट पहलू प्रस्तुत करता है।

एक रसप्रद कथा के अनुसार एक समय जब माँ पार्वती ने खेलखेल में समस्त सृष्टि के जीवनदाता शिव की आँखें अपने हाथों से ढक दी तब समूचे विश्व में अंधकार व्याप्त हो गया। समस्त जगत का व्यवहार थम गया तब शिव ने अपने भाल से तीसरी आँख उत्पन्न की जिससे सूर्य सम प्रकाश निकला। इस प्रसंग के पश्चात् उन्हें ‘त्रिनेत्र’ कहा गया।

शिव के वैविध्यपूर्ण नामों एवं रूपों की चर्चा के लिए हिन्दू मंदिरों में शिव प्रतिमाओं से अच्छा माध्यम और क्या हो सकता है। हमारे प्राचीन मंदिरों में शिव के इन रूपों का विशद और विशेष चित्रण किया गया है जो आज भी कलाकारों एवं शोधकों के लिए अभ्यास का विषय है। हर प्रदेश की विशिष्ट कला शैली और लोक कथाओं से एकरूप होती इन प्रतिमाओं का अभ्यास हमें हमारे प्राचीन आध्यात्मिक दर्शन के साथसाथ हमारे इतिहास से भी परिचय कराता है। वेद, वेदान्तों और उपनिषदों के उपरान्त लोक गाथाओं में भी शिव अपना अलग स्थान रखते हैं और शिव के इन सभी मंदिरों में हमें जनमानस से शिव का यह जुड़ाव प्रतीत होता है।

रूद्र का सर्वप्रथम उल्लेख हिन्दू ग्रंथों में ऋग्वेद, शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता और अथर्ववेद में पाया जाता है। वेदों में शिव को कर्पूरवर्णी तथा सुवर्ण अलंकारों से युक्त वर्णित किया गया है। रूद्र अपनी जटाओं को कलात्मक रूप से बांधते है, धनुष और बाण धारण करते है। भाव, सर्व, सहस्रबाहु, महादेव, पशुपति जैसे वैविध्यपूर्ण नामों से रूद्र का वर्णन मिलता है। उग्र, ईशान, अघोर, नीलग्रीव, कपर्दिन, सभापति, सेनानी, भीम, शम्भू और शंकर भी रूद्र के नाम हैं। रूद्र का एक ध्यानाकर्षक पहलू यह भी है की कुछ स्थानों पर इनके विवरण में अग्नि की छवि का दर्शन होता है।

पुराणों में त्रिशूलधारी शिव को सर्व जीवों का आधार माना गया है। पौराणिक ग्रंथों में शिव अलंकार और यज्ञोपवित के रूप में विषधारी सर्पों को धारण करते हैं और संगीत और नृत्य के देवता हैं। वेदों के सौम्य रूद्र की तुलना में पुराणों के शिव में उग्र प्रकृति अधिक मात्रा में दिखाई गई है। जब हम शिव को भारत के प्राचीन मंदिरों में देखते हैं तब वैदिक और पौराणिक स्वरूपों का भेद स्पष्ट होता है।

चलिए भारतवर्ष में पाई जाने वाली शिव प्रतिमाओं का व्यापक वर्गीकरण करने का प्रयास करते हैं। यदि हम शिव प्रतिमाओं का अवलोकन करें तो जान पाएंगे कि प्राथमिक तौर पर इन्हें हम ‘लिंगप्रतिमा’ तथा ‘रूपप्रतिमा’ में विभाजित कर सकते हैं।

इससे आगे बढ़ते हुए हम लिंग प्रतिमाओं को अचलचल (स्थावर और जंगम) लिंगों में वर्गीकृत कर सकते है। स्वयंभू एवं मानवनिर्मित शिवलिंगों की चर्चा भी आवश्यक है। लिंगपूजा का प्रारंभिक उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है जहाँ शिवलिंग को ‘शिष्नदेव’ कहा गया है। भारतवर्ष में सर्वाधिक आराधना भी संभवतः लिंग प्रतिमाओं की ही होती है। अर्वाचीन में निर्मित अधिकतर शिवालयों में शिव को लिंग रूप में ही पूजा जाता है।

रूप प्रतिमाओं की चर्चा करें तो इन्हें शिव के विविध भावों से वर्गीकृत किया जा सकता है, जैसे कि भक्तों को अपनी कृपा से अनुग्रहित करते शिव, सौम्य या उग्र रूप में नृत्य करते नटराज शिव, गुरु रूप में ज्ञान, योग एवं संगीत की शिक्षा प्रदान करते दक्षिणामूर्ति आदियोगी शिव। इन रूपों के उपरांत पौराणिक कथाओं में लीलाधर शिव के विवाह, गंगाअवतरण तथा लिंगोद्भव जैसे प्रसंगशिल्पों का भी हिंदू मंदिरों में विशिष्ट स्थान रहा है।

पौराणिक कथाओं में शिव के उग्र रूप को भी कल्याणकारी माना गया है क्योंकि शिव का क्रोध भी असुरों के संहार या देवों के अहंकार को समाप्त करने के लिए ही है। शिव के इन्हीं कठोर रूपों को संहार मूर्तियां कहा गया है। रौद्र रूप में शिव के शिल्प अपनी अलग पहचान रखते हैं। रौद्र शिव को कैसे चित्रित किया जाना चाहिए और कैसे रूपों का निषेध है इसकी भी विशद चर्चा शिल्पशास्त्र के विविध ग्रंथों में की गई है।

पुराणों में शिव और रूद्र के विषय में वैविध्यपूर्ण और कुछेक जगहों पर एकदूसरे से भिन्न कथाएं प्राप्त होती हैं। विष्णु पुराण एवं मार्कण्डेय पुराण के अनुसार एक समय ब्रह्मा तपश्चर्या कर रहे थे और उनकी गोद में एक बच्चा रोये जा रहा था। ब्रह्मा ने उससे रुदन का कारण पूछा तो बच्चे ने बताया कि उसका नामकरण न होने की वजह से वह नाराज़ है। ब्रह्मा ने उसका नामाभिधान करते हुए उसे रूद्र के नाम से पुकारा। फिर भी बच्चा शांत नहीं हुआ, तब ब्रह्मा जी ने उसे भाव, ईशान, शर्व, पशुपति, भीम, उग्र और महादेव जैसे नामों से सम्बोधित किया। इस प्रकार रूद्र का उद्भव हुआ। कुछ अन्य स्थानों पर इसी प्रसंग को अन्य कथाओं के रूप में दर्शाया गया है जिनके विषय में हम आने वाले समय में चर्चा करेंगे।

इसी तरह से विविध सम्प्रदायों से जुड़े ग्रंथों में भी एकदूसरे से भिन्न वर्णन प्राप्त होते हैं और संकुचित दृष्टि से पढ़ने वाले पाठकों के मन में दुविधा उत्पन्न करते है। महाभारत के वन पर्व में अर्जुन हरिरूद्र का वर्णन करते हुए कहते हैं कि “मैं शिव को हरि के रूप में और हरि को शिव के रूप में एकाकार देखता हूँ।” शांति पर्व में श्री कृष्ण महेश्वर की और शिव नारायण की पूजा करते हैं। हरिवंश एवं मार्कण्डेय पुराण में भी हरिहर का विशेष वर्णन मिलता है।

पुराणों में वैदिक अग्नि को शिव और वैदिक आदित्य को विष्णु के रूप में भी माना गया है। मार्कण्डेय पुराण में हरिहर के विष्णु रूप को अर्धनारीश्वर के शक्ति रूप के साथ जोड़ कर देखा गया है। इन सभी पक्षों में भी काफी मतमतांतर हैं। हमारे लिए इस श्रृंखला में मात्र एक ही बात महत्वपूर्ण है कि ग्रंथों में वर्णित इन कथाओं का भौतिक अर्थविवेचन करने के बजाय इसके पीछे छुपे दर्शन का महत्त्व समझें।

शिव के सभी रूप और उनसे जुड़ी कथाएँ एकदूसरे से कहीं न कहीं जुड़ती हैं और इन पौराणिक कथाओं के आध्यात्मिक अर्थ तथा प्रतिमाओं के भौतिक आकारों के पीछे कुछ दार्शनिक रहस्य भी छुपे हुए हैं जिनके बारे में आज तक ज्यादा शोध और चर्चा नहीं की गई है, तो चलिए इन शिव प्रतिमाओं से जुड़ी कथाओं और उनके दर्शन को समझने और सीखने का प्रयास करते हैं।

(क्रमशः)

(इस श्रृंखला का द्वितीयतृतीय और चतुर्थ भाग)


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