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हिन्दू मंदिरों में शिव – 8 – गजासुर-संहार मूर्ति


हिन्दू मंदिरों का हर एक शिल्प कोई न कोई कहानी सुनाता है लेकिन गजासुरसंहार मूर्ति का शिल्प ऐसा है जो वैविध्यपूर्ण कथाओं का संगम है। इस शिल्प को गजान्तक, गजारि, गजासुर वध के नाम से भी जाना जाता है। आइए जानने का प्रयास करते हैं कि यह कथाएं क्या हैं और यह  क्या है।

मत्स्य पुराण में अंधकासुरवध की कथा है। जिसमें शिव देवासुर संग्राम के लिए आगे बढ़ते हैं तब शिव को रोकने हेतु अंधक का नील नामक मित्र हाथी का रूप धर कर इनके मार्ग में आ खड़ा होता है। नंदी से सूचना प्राप्त होते ही वीरभद्र इस हाथी का वध कर देते हैं। गजासुर वध के पश्चात इस हाथी का चर्म शिव धारण कर युद्ध भूमि में प्रवेश करते हैं।

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कूर्म पुराण तथा स्कंद पुराण के काशी खंड में एक कथा है जिसमें काशी के कृत्तिवासेश्वर स्थान का उल्लेख है। महिषासुर के अतिबलशाली पुत्र गजासुर ने ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया था जिसके कारण कामवासना से ग्रसित कोई भी मनुष्य उसे हानि नहीं पहुंचा सकता था। सामर्थ्य के मद में चूर गजासुर जब चलता तो धरती कांपने लगती, नदी में उतरता तो बाढ़ आ जाती और पर्वतों से टकराता तो पर्वत नामशेष हो जाते।

गजासुर की मुक्ति मात्र शिव के हाथों से संभव थी। एक बार जब वाराणसी में यज्ञ कर रहे ऋषियों को वह प्रताड़ित कर रहा था तब क्रोधित शिव ने अपने त्रिशूल से उसे भेद दिया और उसका महाकाय देह त्रिशूल पर टांग कर वे तांडव करने लगे।

इस परिस्थिति में भी गजासुर ने प्रसन्नता से कहा स्वयं शिव के हाथों मृत्यु और मृत्यु के पश्चात शिव के छत्र के रूप में स्थान पा कर मैं कृतकृत्य हुआ। गजासुर का यह वचन सुन कर शिव भी प्रसन्न हुए और उन्होंने गजासुर के चर्म से निर्मित शिवलिङ्ग को काशी में स्थापित किया। बिन्दुमाधव मंदिर के समीप इस महादेव मंदिर को कृत्तिवासेश्वर नाम दिया गया।

दुर्भाग्य से औरंगज़ेब ने इस मंदिर पर आक्रमण किया और कुंड में स्थापित लिङ्ग को खण्डित कर वहां फुव्वारा बनवा दिया। भारत के अन्य प्रमुख मंदिरों की तरह यहाँ भी विधर्मियों द्वारा खण्डन और आस्तिकों द्वारा पुनर्निर्माण का दौर चलता रहा।

राजा पटनीमल ने नर्मदा नदी से प्राप्त शिवलिङ्ग को स्थापित कर इस मंदिर का पुनरोद्धार कराया। स्थानीय लोगों के अनुसार अंग्रेज़ों ने भी इस मंदिर को अपना निशाना बनाया था। २००६ में आई आंधी में प्राकृतिक कारणों से यह लिङ्ग फिर से एक बार खंडित हुआ और तब से अब तक यह स्थान विवादों का केंद्र बना हुआ है। (संदर्भ पत्रिकाडॉटकॉम)

एक मान्यता के अनुसार दक्षिण भारत में स्थित वलुवर को कृत्तिवास शिव का प्रमुख स्थान माना जाता है।

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एक और कथा वराह पुराण में है जिसमें ऋषियों के अहंकार निर्मूलन हेतु शिव की लीला का वर्णन है। एक बार जब शिव अपनी पत्नी समेत दारूकावन (देवदारु वृक्षों के जंगल) में विचरण कर रहे होते हैं तब ऋषियों का एक समूह में वासना से ग्रसित हो जाते है और अहंकार के मद में चूर शिव पत्नी से अयोग्य आचरण करते हैं। शिव से युद्ध हेतु यह ऋषिगण गजासुर नामक असुर को उत्पन्न करते हैं। अन्य कथाओं की तरह ही शिव इस कथा में भी असुर का वध कर उसके चर्म को धारण कर नृत्य करते हैं।

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एक अन्य कथा में गज जैसे मुख वाले शिव भक्त असुर का वर्णन मिलता है। यह असुर अपना सारा समय शिवभक्ति में व्यतीत करता था इसलिए शिव भी इसपर सदा प्रसन्न रहते थे। एक बार उसने शिव से वन्यजीवों द्वारा अपने अनुष्ठान में आने वाली बाधाओं की शिकायत करते हुए शिव से वरदान में अग्नि का आभामण्डल मांग लिया। अब वह निश्चिंत हो कर शिव का गुणगान कर सकता था।

सहस्रों वर्ष तक वह शिव का जाप करता रहा। इसी कारण फिर से एक बार देवाधिदेव को उसके समक्ष उपस्थित होने को विवश होना पड़ा। इस बार जब शिव ने उसे मनचाहा वरदान मांगने को कहा तो प्रत्युत्तर देते हुए उसने कहा कि उसे स्वयं शिव चाहियें।

उसकी यह अभ्यर्थना सुन कर शिव भी अचंभित हो गए। गजासुर की तपस्या निस्वार्थ थी और उसने शिव से कहा कि वो कैलाश त्याग कर सदा के लिए उसके उदर में निवास करें। भोलेनाथ शिव अपने भक्त की इच्छा का अनादर नहीं कर पाए और उन्होंने उसके उदर (पेट) में प्रवेश कर लिया। जब शिव कैलाश पर नहीं लौटे तब चिंतातुर पार्वती ने नंदी द्वारा श्री विष्णु को सहायता के लिए सन्देश भेजा।

जब नंदी तथा श्री विष्णु को ज्ञात हुआ कि शिव अपने भक्त के उदर में छुपे बैठे हैं तो महादेव को वहां से निकालने हेतु उन्होंने एक योजना बनाई। योजनानुसार ग्वाले के भेस में विष्णु बाँसुरी बजाते और नंदी नृत्य करते हुए गजासुर के समक्ष पहुंचे। संगीत तथा नृत्य का यह सुभग समन्वय देखकर गजासुर अति प्रसन्न हुआ और उसने ग्वालारूपी विष्णु से वरदान मांगने को कहा।

मौका पाते ही विष्णु ने गजासुर से कहा कि यदि हमारी कला से आप इतने ही संतुष्ट हैं तो अपने उदर से शिव को मुक्त करें। ग्वाले के मुख से यह सुनते ही गजासुर ने भांप लिया कि हो न हो यह स्वयं विष्णु है। उसने दुखी हृदय से अपने पेट से शिव को मुक्त किया। अपने भक्त की निराशा शिव देख नहीं पाए और उन्होंने गजासुर को समय आने पर योग्य सम्मान देने का वचन दिया। कुछ समय पश्चात दुर्भाग्यवश शिव ने अपने ही पुत्र का मस्तक काट दिया तब इसी शिव भक्त गजासुर को शिवपुत्र का मस्तक बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

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इन सभी कथाओं में गजासुर के चरित्र को भिन्न भिन्न तरीके से वर्णित किया गया है। इन कथाओं से एक बात यह भी स्पष्ट होती है कि पौराणिक काल में गजासुर नाम के एक से अधिक असुर रहे होंगे।

गजासुरसंहार मूर्ति के विषय में आगमों में विस्तृत चर्चा होने के बावजूद मंदिरों में शिल्पकारों ने गजान्तक शिव के प्रतिमा निर्माण में रचनात्मकता का परिचय देते हुए काफी वैविध्यपूर्ण मूर्तियों का उत्कीर्णन किया है।

अंशुमानभेदागम के अनुसार चतुर्भुज या अष्टभुज, जटामुकुटधारी शिव गजासुर के शरीर का आवरण धारण कर नृत्य करते दर्शाए जाते हैं। गजासुरसंहार मूर्ति में शिव के हाथों में त्रिशूल, डमरू, पाश, कपाल जैसे आयुध सजाए जाते हैं।

इस शिल्प में गजासुर का चर्म शिव के आसपास प्रभामंडल के रूप में दिखाया जाता है तथा उसके चारों पैर चार दिशाओं में, उसका मस्तक शिव के चरणों में और पूंछ शिल्प के सबसे उपरी भाग में होनी चाहिए।

इसके उपरांत कुछ शिल्पों में बालस्कंद समेत पार्वती को भयभीत मुद्रा में भी चित्रित किया गया है।

दक्षिण भारत के सभी प्रमुख शिवालयों में गजांतक शिव प्रतिमाएं देखीं जा सकती हैं। होयसल स्थापत्य में वैविध्यसभर मूर्तियां उकेरी गई हैं। चोल स्थापत्य के दारासुरम ऐरावतेश्वर मंदिर का चित्रण भी मनोहारी है जिसे अब तंजावुर संग्रहालय में सुरक्षित किया गया है। वझुवुरू का धातु शिल्प गजांतक शिव का प्रमुख स्थान माना जाता है।

(इस श्रृंखला का प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्ठ और सातवाँ भाग)

(Featured image credit: Sanjeev Jha on Twitter and Arjun Vallabha on Tumblr)


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