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बिन्दुसरोवर तीर्थ: सिद्धपुर – भाग ३

iddhpur

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जब कर्दम जी ने इस प्रकार निष्कपट भाव से उनकी स्तुति की तब श्री हरी ने उनसे अमृतमय वाणी में कहा, जिसके लिए तुमने आत्मसंयमादि के द्वारा मेरी आराधना की है, तुम्हारे हृदय के उस भाव को जानकर मैंने पहले से ही उसकी व्यवस्था कर दी है। ब्रह्मावर्त के यशस्वी सम्राट स्वायम्भुव मनु महारानी शतरूपा के साथ जल्द ही तुमसे मिलने यहाँ आएंगे। उनकी कन्या देवहुति विवाह योग्य है। तुम सर्वथा उसके योग्य हो, इसलिए वे तुम्ही से अपनी कन्या का विवाह करेंगे। जैसी भार्या के लिए अनेकों वर्षों से आपका चित्त समाहित रहा है, वह राजकन्या तुम्हारी वैसी ही धर्मपत्नी होगी। उनसे आपकी नौ कन्याएँ उत्पन्न होगी, जिनका मरीचि आदि ऋषि गण पानीग्रहण करेंगे।

सहाहं स्वांशकलया त्वद्वीर्येण महामुने।

तव क्षेत्रे देवहूत्यां प्रणेष्ये तत्त्वसंहिताम्।।

महामुने! मैं भी अपने अंश-कला रूप से तुम्हारे विर्यद्वारा तुम्हारी पत्नी देवहुति के गर्भ में अवतीर्ण होकर सांख्यशास्त्र की रचना करूँगा।

जैसा प्रभु ने कहा था ठीक वैसा ही हुआ, कुछ समय पश्चात कर्दम मुनि के आश्रम पर महाराज मनु एवं महारानी शतरूपा आये और उन्होंने अपनी पुत्री देवहुति की इच्छा से उसका विवाह श्री कर्दम मुनि से करवा दिया। देवी देवहुतिने नौ कन्यायों को जन्म दिया, जिनके नाम इस प्रकार हैं कला, अनसूया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुंधती और शांति। इन नौ कन्यायों का विवाह मरीचि आदि ऋषि जनों से हुआ। कुछ समय पश्चात साक्षात् परब्रह्म भगवान विष्णु सांख्यशास्त्र का उपदेश करने के लिए अपने विशुद्ध सत्त्वमय अंश से अवतीर्ण हुए। जो सिद्धगणों के स्वामी और सांख्याचार्यों के माननीय हुए, और जिन्हें कपिल नाम से ख्याति प्राप्त हुई।

 कर्दम जी ने देखा कि उनके यहाँ साक्षात् देवाधिदेव श्री हरिने ही अवतार लिया है, तो वे एकांत में उनके पास गए और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहने लगे। प्रभो! आपकी कृपा से मैं तीनों ऋणों से मुक्त हो गया हूँ और मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो चुके हैं। अब मैं सन्यास मार्ग को ग्रहण कर आपका चिंतन करते हुए शोकरहित होकर विचरूँगा। आप समस्त प्रजाओं के स्वामी हैं, अतएव इसके लिए मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ।

कर्दम मुनि द्वारा इस प्रकार से आज्ञा मांगने पर भगवान कपिल जी ने कहा, मुने! वैदिक और लौकिक सभी कर्मों में संसार के लिए मेरा कथन ही प्रमाण है। इसलिए मैंने जो तुमसे कहा था कि ‘मैं तुम्हारे यहाँ जन्म लूँगा’, उसे सत्य करने के लिए ही मैंने यह अवतार लिया है। इस लोक में मेरा यह जन्म लिंगशरीर से मुक्त होने की इच्छावाले मुनियों के लिए आत्मदर्शन में उपयोगी प्रकृति आदि तत्वों का विवेचन करने के लिए ही हुआ है। आत्मज्ञान का यह सुक्ष्म मार्ग बहुत समय से लुप्त हो गया है। इसे फिर से प्रवर्तित करने के लिए ही मैंने यह शारीर ग्रहण किया है – ऐसा जानो। मुने! मैं आज्ञा देता हूँ, तुम इच्छानुसार जाओ और अपने संपूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए दुर्जय मृत्यु को जीतकर मोक्षपद प्राप्त करने के लिए मेरा भजन करो। मैं स्वयं प्रकाश और संपूर्ण जीवों के अंतः कारणों में रहने वाला परमात्मा ही हूँ। अतः जब तुम विशुद्ध बुद्धि के द्वारा अपने अंतः करण में मेरा साक्षात्कार कर लोगे, तब सब प्रकार के शोकों से छूटकर निर्भय पद (मोक्ष) प्राप्त कर लोगे। माता देवहुति को भी मैं संपूर्ण कर्मों से छुड़ाने वाला आत्मज्ञान प्रदान करूँगा, जिससे यह संसार रूप भय से पार हो जाएँगी।

पितरि प्रस्थितेऽरण्यं मातुः प्रियचिकीर्षया।

तस्मिन्बिन्दुसरेऽवात्सीद्भगवान्कपिलः किल।।

तमासीनमकर्माणं तत्त्वमार्गाग्रदर्शनम्।

स्वसुतं देवहूत्याह धातुः संस्मरती वचः।।

पिता के वन में चले जाने पर भगवान कपिल जी माता का प्रिय करने की इच्छा से उस बिन्दुसरोवर तीर्थ में रहने लगे

 सन्दर्भ: –

 श्रीमद्भागवत गीता साधक संजीवनी – स्वामी रामसुखदास – गीताप्रेस गोरखपुर

श्रीमद्भागवत महापुराण – गीताप्रेस गोरखपुर

महाभारत खंड ६ – गीताप्रेस गोरखपुर

Image credit: wikimediacommons


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