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श्री स्थल सिद्धपुर – भाग १

matrugaya

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सरस्वती तट पर स्थित प्राचीन नगरी, जहाँ भक्त की भक्ति से प्रसन्न भगवान के नेत्रों से अश्रु बूंदे गिरीं और उन बूंदों ने एक सरोवर (बिंदु सरोवर) का रूप लिया, वेदों में इस स्थल को श्री स्थल कहा गया है। श्री अर्थात देवी लक्ष्मी, पुराणों में इसे सिद्ध स्थल कहा है। सिद्धानां कपिलो मुनिः  सिद्धोमें श्रेष्ठ कपिल मुनि की ये जन्मस्थली है। यहीं कपिल मुनि ने अपनी माता को सांख्यशास्त्र का उपदेश दे उन्हें मोह आदि बन्धनों से मुक्त किया।

श्री स्थल :-

युधिष्ठिर जी ने एक बार पितामह भीष्म से लक्ष्मी जी के निवास स्थल के विषय में पूछा था, तब पितामह ने उन्हें देवी लक्ष्मी और देवी रुक्मणी जी का वृतांत सुनाया था। देवी रुक्मणी ने लक्ष्मी जी से पूछा था

कानीह भूतान्युपसेवसे त्वं

संतिष्ठसे कानिव सेवसे त्वम्।

तानि त्रिलोकेश्वरभूतकान्ते

तत्त्वेन मे ब्रूहि महर्षिकन्ये ॥

महर्षि भृगु की पुत्री तथा त्रिलोकीनाथ भगवान नारायण की प्रियतमे !देवी! तुम इस जगत में किन प्राणियों पर कृपा करके उनके यहाँ रहती हो ? कहाँ निवास करती हो और किन-किनका सेवन करती हो ? उन सबको मुझे यतार्थरूप से बताओ।

माता लक्ष्मी जी ने रुक्मणी जी से कहा कि

वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे

दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने।
अक्रोधने देवपरे कृतज्ञे

जितेंद्रिय नित्यमुदीर्णसत्त्वे ॥

देवी ! मैं प्रतिदिन ऐसे पुरुष में निवास करती हूँ, जो सौभाग्यशाली, निर्भीक, कार्यकुशल, कर्मपरायण, क्रोधरहित, देवाराधनतत्पर, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय तथा बढ़े हुए सत्त्वगुण से युक्त हो।

स्वधर्मशीलेषु च धर्मवित्सु

वृद्धोपसेवानिरते च दान्ते ।

कृतात्मनि क्षांतिपरे समर्थे

क्षान्तासु दान्तासु तथाबलासु ॥

सत्यस्वभावार्जवसंयुतासु

वसामि देवद्विजपूजिकासु ।

जो स्वभावतः स्वधर्मपरायण, धर्मज्ञ, बड़े-बूढों की सेवामें तत्पर, जितेन्द्रिय, मन को वश में रखने वाले, क्षमाशील और सामर्थ्यशाली हैं, ऐसे पुरुषो में तथा क्षमाशील एवं जितेन्द्रिय अबलाओं में भी मैं निवास करती हूँ। जो स्त्रियाँ स्वभावतः सत्यवादिनी तथा सरलता से संयुक्त हैं, जो देवताओं और द्वीजों की पूजा करने वाली हैं, उनमें भी मैं निवास करती हूँ।

सृष्टि की वृद्धि के समय ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र महर्षि कर्दम जी को संतान उत्पत्ती की आज्ञा दी, महर्षि कर्दम ने सरस्वती तट पर स्थित इसी स्थल पर अपना आश्रम बनाया, और यहीं रहकर दस सहस्त्र वर्षों तक तप किया। तप के प्रभाव से उनका विवाह स्वायम्भुव मनु की पुत्री देवहुति से संपन्न हुआ। महर्षि कर्दम और उनकी भार्या देवहुति ऐसे स्त्री-पुरुष हैं, जैसा माँ लक्ष्मी ने बताया था, वे जितेन्द्रिय हैं, धर्मज्ञ हैं, और सत्यवादी है, इस कारण से भी ये स्थल लक्ष्मी का अर्थात श्री का स्थल है।

लक्ष्मी जी ने रुक्मणी जी से आगे ये कहा था कि

नदीषु हंसम्वननादितासु

क्रौञ्चावघुष्टस्वरशॊभितासु।

विकीर्णकूलद्रुमराजितासु

 तपस्विसिद्धद्विजसेवितासु॥
वसामि नित्यं सुबहूदकासु

 सिंहैर्गजैश्च्वाकुलितॊदकासु।

जहाँ हँसोंकी मधुर ध्वनि गूँजती रहती है, क्रौञ्च पक्षी के  कलरव जिनकी शोभा बढ़ाते हैं, जो अपने तटोंपर फैले हुए वृक्षों की श्रेणीयोंसे शोभायमान हैं, जिनके किनारे तपस्वी, सिद्ध और ब्राह्मण निवास करते हैं, जिनमें बहुत जल भरा रहता है तथा सिंह और हाथी जिनके जल में अवगाहन करते रहते हैं, ऐसी नदियों में भी मैं सदा निवास करती रहती हूँ।

श्रीमद्भागवत पुराण में भी श्री स्थल का ऐसा ही सुंदर वर्णन किया गया है

 पुण्यद्रुमलताजालैः कूजत्पुण्यमृगद्विजैः।

सर्वर्तुफलपुष्पाढ्यं वनराजिश्रियान्वितम्॥

मत्तद्विजगणैर्घुष्टं मत्तभ्रमरविभ्रमम्।

मत्तबर्हिनटाटोपमाह्वयन्मत्तकोकिलम्॥

कदम्बचम्पकाशोक करञ्जबकुलासनैः।

कुन्दमन्दारकुटजैश्चूतपोतैरलङ्कृतम्॥

कारण्डवैः प्लवैर्हंसैः कुररैर्जलकुक्कुटैः।

सारसैश्चक्रवाकैश्च चकोरैर्वल्गु कूजितम्॥

तथैव हरिणैः क्रोडैः श्वाविद्गवयकुञ्जरैः।

गोपुच्छैर्हरिभिर्मर्कैर्नकुलैर्नाभिभिर्वृतम्॥

उस समय बिंदु सरोवर पवित्र लताओं से घिरा हुआ था, जिनमें तरह तरह की बोली बोलनेवाले पवित्र मृग और पक्षी रहते थे, वह स्थान सभी ऋतुओं के फ़ल और फूलों से संपन्न था और सुंदर वन श्रेणी भी उसकी शोभा बढ़ाती थी। वहाँ झुंड के झुंड मतवाले पक्षी चहक रहे थे, मतवाले भौरें मंडरा रहे थे, उन्मत्त मयूर अपने पिच्छ फैला फैलाकर नटकी भांति नृत्य कर रहे थे और मतवाले कोकिल कुहू कुहू करके मानो एक दुसरे को बुला रहे थे। वह आश्रम कदम्ब, चम्पक, अशोक, करंज, बकुल, असन, कुंद, मन्दार, कुटज और नये नये आम के वृक्षों से अलंकृत था। वहाँ जलकाग, बत्तख आदि जलपर तैरने वाले पक्षी हंस, कुरर, जलमुर्ग, सारस, चकवा और चकोर मधुर स्वरसे कलरव कर रहे थे। हरिन, सूअर, स्याही, नीलगाय, हाथी, लंगूर, सिंह, वानर, नेवले और कस्तूरीमृग आदि पशुओंसे भी वह आश्रम घिरा हुआ था।

महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म जी ने लक्ष्मी जी के निवास करने वाले स्थल के बारे में बताते हुए जो वृतांत कहा था, और उस वृतांत में जो माता लक्ष्मी जी ने देवी रुक्मणी जी से कहा, वह सभी इस श्री स्थल क्षेत्र में जहाँ भगवान कर्दम मुनि का आश्रम है और बिंदु सरोवर है स्थित है। इस कारण से इसका नाम श्री स्थल होना पुर्णतः उचित है। इन सब से भी अधिक ये स्थल माता लक्ष्मी जी का ननिहाल है, कर्दम मुनि और देवहुति जी की पुत्री ख्याति जी इनकी माता है, और पिता महर्षि भृगु जी हैं। इस कारण से भी ये स्थल देवी लक्ष्मी जी का प्रिय स्थल है।

सन्दर्भ: –

  1. श्रीमद्भागवत गीता साधक संजीवनी – स्वामी रामसुखदास – गीताप्रेस गोरखपुर
  2. श्रीमद्भागवत महापुराण – गीताप्रेस गोरखपुर
  3. महाभारत खंड ६ – गीताप्रेस गोरखपुर

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Image Credit: matrugaya siddhpur


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