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हिन्दू मंदिरों में शिव – भाग १०: ब्रह्मशिरच्छेदक मूर्ति

bhairav shiva

कुर्म पुराण के अनुसार एक बार ऋषियों ने पंचमुखी ब्रह्माजी से सृष्टि की उत्पत्ति, रचना और विकास के विषय में पूछा। अब आप कहेंगे कि ब्रह्मदेव के चार ही मुख होते हैं लेकिन उस समय ब्रह्माजी के पांच मुख हुआ करते थे।

ऋषियों के प्रश्न का उत्तर देते हुए ब्रह्माजी ने बड़े ही अहंकार से स्वयं को सृष्टि का कर्ता-धर्ता देवाधिदेव बताया। इसी ‘शिव श्रृंखला’ के एकपाद मूर्ति प्रकरण में हमने देखा है कि कैसे ब्रह्मा और विष्णु की उत्पत्ति शिव के शरीर से हुई थी और कैसे ब्रह्मा विष्णु और महेश्वर इस संसार को चलाते हैं।

ब्रह्माजी के यह मिथ्या वचनों से शिव बड़े क्रोधित हुए और उन्होंने ब्रह्माजी से अपने कथनों के प्रमाण देने की चुनौती दी। वेदों में भी भगवान शिव को ही देवाधिदेव महादेव माना गया था फिर भी गर्वित ब्रह्माजी का पांचवा मुख अपनी बातों पर अडा रहा।

शिव ने उद्दंड ब्रह्माजी को बोधपाठ पढ़ाने हेतु भैरव का आह्वान किया और विक्राल रुप धारण किए भैरव ने अपने नाखून से ब्रह्माजी का अहंकारी मस्तक धड़ से अलग कर दिया। और यह मस्तक भैरव के हाथों में चिपक गया। इस घटनाक्रम के पश्चात भयभीत ब्रह्मदेव ने शिव का आधिपत्य स्वीकार किया। वराह पुराण में भैरव के स्थान पर रूद्र द्वारा ब्रह्मा के शिरच्छेद की कथा है।

Kailashnathar Temple – Kanchipuram (Image Source: Google)

 इस कथा में ब्रह्मदेव का मस्तक भैरव के हाथ में चिपक जाता है और तपस्या के पश्चात वाराणसी के ‘कपालमोचन’ स्थान पर रूद्र को ब्रह्मशिर तथा ब्रह्महत्या के पातक से मुक्ति मिलती है। मान्यता के अनुसार काशी के कोतवाल कपाल मोचन का दर्शन किये वगैर काशी विश्वेश्वर की यात्रा अपूर्ण मानी जाती है। 

चोल, नायक तथा मराठा शासकों द्वारा निर्मित, तमिळनाडु के कन्दियुर गाँव में स्थित ब्रह्मकन्दिश्वरर मन्दिर* को ब्रह्म-शिरच्छेदक शिव का प्रमुख स्थान माना जाता है। यह शिवालय कुंभकोणम से बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस मन्दिर में ब्रह्मदेव तथा सरस्वती के शिल्प भी उकेरे गए हैं। यहां देवी पार्वती भी मंगलनयगी के रूप में विराजमान हैं।

प्रथमदृष्टया यह कथाएं विचित्र और एक-दूसरे से भिन्न लगती हैं। सामान्य मनुष्य की बुद्धि इन कथाओं का अर्थ नहीं समझ सकती। स्टेला क्राम्रिश तथा गोपीनाथ राव की पुस्तकों में ब्रह्मशिरच्छेदक शिव प्रतिमाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है।

पिताजी कहते हैं कि “जब पौराणिक कथाओं का गूढार्थ समझने में असमर्थ हों तब ऋषियों तथा संन्यासियों के आश्रय में जाना चाहिए। पुस्तकालय से जो ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते वह अनुभवों से प्राप्त होता है। हमारे संतों ने सहस्रों वर्षों से ग्रंथों में लिखे चिंतन को लोकोक्तियों और कथाओं में सहेजे रखा है।” मैं हमेशा यही प्रयास करता हूं।

चलिए अब उपरोक्त शिल्प की कथा को पुस्तकालय से बाहर निकल कर संतों के आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करते हैं।

सृष्टिकर्ता ब्रह्मदेव ने ब्रह्माण्ड सृजन आरंभ किया। उन्होंने अनेकों क्षीरमार्गों का निर्माण किया, प्रत्येक क्षीरगंगा के अपने-अपने सूर्य थे, दैदीप्यमान तेजस्वी सूर्य। और प्रत्येक सूर्य के आसपास प्रदक्षिणा करते ग्रहों का सूर्यमण्डल था। विस्तृत और विशालकाय ब्रह्माण्ड गतिशील था लेकिन उसमें जीवन नहीं था। उसमें चेतना का संचार तब हुआ जब ब्रह्माजी ने पृथ्वी पर जीवसृष्टि का निर्माण किया।

जलचर, भूमिचर और खेचर जीवों से पृथ्वी का वातावरण जीवंत हो उठा। पृथ्वी; अनंत ब्रह्माण्ड का यह एकमात्र ग्रह जीवंत था किन्तु यह संसार सुखमय नहीं था। सभी जीवात्माएं दुखी थीं।

ब्रह्माजी अपने ही द्वारा निर्माण किए संसार पर गर्वित हो रहे थे जब वह एक दिशा में देखते तब दूसरी दिशा में हो रही गतिविधियों को नहीं देख पाते इसलिए सभी दिशाओं का अवलोकन करने हेतु उन्होंने चार मस्तकों का निर्माण किया। इतने से भी उन्हें संतुष्टि नहीं हुई और इन चारों के उपर पांचवें मस्तक का उद्भव हुआ, यह मस्तक ब्रह्माजी का अहंकार था। ब्रह्मदेव को इतराते हुए देख कर शिव को बहुत क्रोध आया।

गौरवर्णं  त्रिनेत्रं च   जातमौलिविराजितम ।

ताटकं कुण्डलं सव्यवामश्रुत्योश्च बिभ्रतम ॥

व्याघ्रचर्माम्बरधरं   चतुर्भुजसमन्वितम ।

वज्रं परशुपूर्वासं वामे ब्रहमकरोटिकम ॥

प्रतिमालक्षणानि (श्री तत्वनिधौ)

गौर वर्णी, व्याघ्रचर्म लपेटे हुए, जटा मुकुट धारी, त्रिनेत्र-शिव दाहिने हस्त में वज्र, परशु और वाम हस्त में शूल जैसे शस्त्रों से सज्ज थे। जब बुद्धि माया के आवरण से मुक्त हो जाती है तब ही शिव के इस भैरव स्वरुप का दर्शन हो पाता है। उन्होंने ब्रह्मा का पांचवां मस्तक काट दिया और अहंकार का प्रतीक यह पांचवां मस्तक उनके चौथे हाथ में चिपक गया।

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Painting of Siva as Bhairava, head of Brahma in his upper left hand (Source: Wikipedia)

अपने हाथों में ब्रह्मा का पांचवां मस्तक लिए उन्होंने ब्रह्माजी से पूछा “इस जगत में दुःख है, यातना है, पीड़ा है। यह संसार दुखों का कारक है। क्या आप अपने इस उदास कर देने वाले निर्माण पर गर्व करते हैं? समस्त जगत जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि जैसी समस्याओं से दुःखी हैं। लज्जित होने के बजाय आप इस संसार पर अभिमान कर रहे हैं?”

ब्रह्मा जी ने कहा “मैंने सृष्टि का निर्माण अवश्य किया है किन्तु यह व्याधि, कष्ट, संघर्ष जैसे अनिष्टों को मैंने नहीं बनाया। यहां तक कि मैंने तो आनंद और उल्लास का निर्माण भी नहीं किया। यह सब जीवों ने अपने ही मन से निर्माण किए हैं। अपने जीवन का आनंद लेना या उससे दुःख भोगना यह जीव स्वयं तय करता है। ना मैं उसे सुख देता हूं और ना ही दुःख।”

भगवान ने फिर से प्रश्न पूछा “सर्व दुःखों के कारक इस चंचल मन को किसने बनाया?” प्रत्युत्तर में ब्रह्मा बोले “मेरा बनाया हुआ मन गुणहीन है। मन में उठ रहे अच्छे-बुरे, वासना – विकार से भरे तथा सात्विक विचारों को नियंत्रित करना स्वयं मनुष्य के हाथ में है। सिर्फ मन ही नहीं यह सृष्टि भी गुणहीन है।”

शिव ने इस विचार पर चिंतन किया। वह आंखें बंद कर अपने अंतर्चक्षु से सृष्टि का रहस्य ढूंढने लगे और उन्होंने जीवों के समस्त दुखों का भेद पा लिया। सभी दुःखों का कारण भी मन ही है और निवारण भी मन ही है।

यदि मन को नियंत्रित कर लिया तो जीव निश्चल आनंद को प्राप्त कर सकता है इसके लिए उसे सृष्टि या किसी अन्य जीव पर निर्भर होने की आवश्यकता नहीं है।

ब्रह्महत्या के निवारण हेतु शिव के प्रयास, भैरव प्रतिमा के प्रकार तथा उनकी कथाओं की चर्चा आने वाले समय में इसी श्रृंखला में की जाएगी।

*Featured Image: Kandeeswarar Temple, Kandiyur (Source-Wikipedia)


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