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मुद्रिकाप्रसंग


रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने अनेक प्रसंगों को बहुत ही गूढ़ रूप से लिखा है और कई प्रसंगों को केवल छुआ मात्र है, उनका विस्तृत उल्लेख नहीं किया है। ऐसा ही एक प्रसंग मुद्रिकाप्रसंग है-

सभी को ज्ञात होगा की सीता जी के पास एक मणिजड़ित रामनाम अंकित मुद्रिका थी। रामचरितमानस में इस मुद्रिका का सर्वप्रथम उल्लेख केवट प्रसंग के समय आता है किंतु वो मुद्रिका सीता जी के पास कैसे थी इस संबंध में बालकांड में विवाह के अवसर पर तुलसीदास जी वर्णन करते हैं

“निज पानि मनि महुँ देखि अति मूरति सुरूपनिधान की।”

अब यहां पर तुलसीदास जी वर्णन करते हैं कि अपने हाथ की मणि में सीता जी राम जी की छवि देखती है किंतु यहां पर यह स्पष्ट उल्लेख नहीं है कि वह मुद्रिका के मणि में देखती हैं अथवा कंगन के मणि में या अन्य किसी मणि में । इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है, किंतु मुद्रिका का आगे भी उल्लेख आता है अतः यह माना जाना चाहिए कि यहां पर मणि मुद्रिका वाली ही मणि होनी चाहिए । इससे यह ज्ञात होता है कि यह मुद्रिका सीता जी को उनके मायके की ओर से प्राप्त हुई थी जिस पर राम नाम अंकित था और वह मणिजटित थी।

अब जब अयोध्या कांड में राम जी को वनवास एवं मुनिवेश धारण करने का आदेश दिया गया तो इसका उल्लेख गोस्वामी जी करते हैं-

“रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई॥”

यहां पर राम जी के मुनिवेश बनाने का वर्णन आता है सीता जी द्वारा किसी भी प्रकार के आभूषणों को त्याग करने का वर्णन तुलसीदास जी ने नहीं किया है क्योंकि राम जी को वनवास दिया गया है । अतः वे किसी भी प्रकार का आभूषण धारण नहीं करते हैं।

तत्पश्चात गंगा तीर पर , गंगा पार करवाने के पश्चात जब केवट हाथ जोड़कर राम जी के सन्मुख होता है तब रामजी संकोचपूर्वक विचार करते हैं कि इसे कुछ दिया नहीं तब तुलसीदास जी वर्णन करते हैं-

“पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥
कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई॥2॥”

अपने प्रिय के हृदय की सीता जी जानने वाली हैं ,वे तुरंत भगवान के संकोच को समझ जाती हैं और तत्काल मणिजटित वह रामनाम अंकित अंगूठी अपने करकमलों से निकालती हैं और रामजी को देती हैं कि यह केवट को दे दीजिए । केवट उस मुद्रिका को लेने से मना कर देता है और वह मुद्रिका श्रीरामजी के पास ही रह जाती है।

किष्किंधा कांड में वही मुद्रिका श्रीरामजी हनुमान जी को देते हैं और सीता जी को पहचान के रूप में देने के लिए कहते हैं

“पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा॥
परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी”

अब हनुमान चालीसा में गोस्वामीजी कहते हैं –

“प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही जलधि लांघी गए अचरज नाही”

गोस्वामी जी ने रामनाम की महिमा का वर्णन करने के लिए ही ऐसा लिखा है क्योंकि प्रभुमुद्रिका के ऊपर रामनाम अंकित है । उस मुद्रिका को मुख में मेलने अथवा रखने का तात्पर्य यह है कि श्रीरामनाम को जो अपने मुख में रखता है वह इस संसाररूपी अगाध समुद्र को सरलतापूर्वक पार कर जाता है। यह @idamrashtram का विचार है ।

सुंदरकांड में हनुमान जी वही मुद्रिका लेकर सीता जी के सन्मुख जाते हैं तो सीता जी उसे श्रीरामजी की दी हुई समझती हैं और मन में यह विचार करती हैं कि श्रीरामजी को कोई जीत नहीं सकता और ऐसी रामनाम जटित मुद्रिका माया के द्वारा भी गढ़ी नहीं जा सकती । अतः यह श्रीरामजी के द्वारा ही दी गई है-

“तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥1॥

जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥2॥”

अब यहां पर प्रश्न यह उठ सकता है कि वह अंगूठी उन आभूषणों में भी तो आ सकती थी जो आभूषण सीता जी ने पुष्पक विमान से नीचे गिराये थे क्योंकि केवट वाले प्रसंग में श्रीरामजी के पास वह अंगूठी रह जाने का उल्लेख स्पष्ट रूप से गोस्वामी जी ने नहीं किया है तो इसका समाधान यह है कि जब हनुमान जी अंगूठी सीता जी को देते हैं तो सीता जी उसे तत्काल श्रीरामजी की दी हुई समझ लेती हैं। यदि वह अंगूठी सीता जी ने गिराई होती तो वह किसी को भी प्राप्त हो सकती थी और वह आकर सीता जी को यह बता सकता था की सीता जी यह अंगूठी आपको श्रीरामजी ने भेजी है किंतु उन्होंने तत्काल उस अंगूठी को रामजी के द्वारा दी हुई जान लिया और हनुमान को श्री रामदूत जानकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान किए।

Featured Image Credit: wlit2011.blogspot.com/


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