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जन-जन के मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम – भाग १

राम लक्ष्मण सीता

“राम, तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है।

कोई कवि बन जाय, सहज संभाव्य है।”

कवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी कालजयी रचना ‛साकेत’ के शुरुआत में ही ऊपर लिखी पंक्तियों से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के चरित(चरित्र) की महिमा को स्पष्ट कर दिया। और इसमें कोई अतिश्योक्ति भी नहीं कि श्रीराम ने मानव के तौर पर उच्च आदर्शों को बखुबी ऊँचा उठाया, जो आजतक जीवन जीने के श्रेष्ठ मूल्य है।

वहीं महाप्राण निराला की कालजयी कविता “राम की शक्ति पूजा” में श्रीराम के पुरूष से पुरूषोत्तम बनने का वर्णन है। इस लंबी कविता में निराला ने राम को उनकी परंपरागत दिव्यता के महाकाश से उतार कर एक साधारण मानव के धरातल पर खड़ा कर दिया है, जो थकता भी है, टूटता भी है और जिसके मन में जय एवं पराजय का भीषण द्वन्द्व भी चलता है। निराला ने ‛जिस तरह से “राम की शक्ति पूजा” में राम के मानवीय रूप को दिखाया है वो पहले कभी देखने को नहीं मिला था। वाल्मीकि, तुलसी, कम्बन आदि की रामायण से अलग हैं क्यूंकि यहां पर राम डरते भी है घबराते भी हैं और रोते भी हैं। राम की शक्ति पूजा राम के मानवीय रूप का दर्पण है।’

इसीलिए ही अंत में निराला जी इस नवीन व आदर्श पुरूष के लिए कहते हैं:-

“होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन

कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।”

भारत में बड़े-बड़े महापुरुष तथा ऋषि-मुनि हुए हैं किंतु मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के प्रति आस्था रखने वाले लोगों की संख्या इतने युगों के बीत जाने के बाद भी कम नहीं हुई और न ही उनकी मान्यता में कोई कमी आई है। यदि इसके कारणों पर विचार करें तो यह पता चलता है कि श्रीराम का जीवन कुछ इस तरह भारत के जन-जन के हृदय पटल पर अंकित हो गया है कि उसे काल की कोई अवधि मिटा नहीं सकती। इस लिए देश के लोग श्रीराम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहते हैं। अर्थात वह मनुष्य जो मर्यादा बना सकता है। भगवान राम उसकी अंतिम सीमा थे। वह पुरुष भी उत्तम थे और उनकी मर्यादाएं भी उत्तम थीं। उन्होंने मानव मात्र के लिए मर्यादा पालन का जो आदर्श प्रस्तुत किया वह संसार के इतिहास में कहीं और नहीं मिल सकता।

भगवान श्रीराम जन-जन के नायक हैं। उन्होंने पापियों के भय से त्रस्त जन समूह को एकत्रित कर ही बुराई का अंत किया और राम राज्य को स्थापित किया। श्रीराम सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे। केवट से लेकर शबरी, जामवंत, सुग्रीव, ऋषि-मुनि सभी के बीच रहे। सबके बीच रहकर मानव मूल्यों का निर्माण किया। जनमानस में कोई भेदभाव नहीं किया। सर्वप्रथम राज्य की प्रजा का ध्यान रखा।

दरअसल श्रीराम के लोकनायक चरित्र ने जाति, धर्म और संप्रदाय की संकीर्ण सीमाओं को लांघ कर जन-जन को अनुप्राणित किया। भारत में ही नहीं, दुनिया में श्रीराम अत्यंत पूज्यनीय हैं और आदर्श पुरुष हैं। थाईलैंड, इंडोनेशिया, श्रीलंका, नेपाल, बर्मा आदि कई देशों में भी श्रीराम आदर्श के रूप में पूजे जाते हैं। वे मानवीय आत्मा की विजय के प्रतीक महापुरुष हैं, जिन्होंने धर्म एवं सत्य की स्थापना करने के लिये अधर्म एवं अत्याचार को ललकारा। इस तरह वे अंधेरों में उजालों, असत्य पर सत्य, बुराई पर अच्छाई के प्रतीक बने। और इसलिए ही बाबा तुलसी ने ‛रामचरितमानस’ में बहुत सुंदर कहा है:-

“हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥

रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥”

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