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भारतवर्ष की प्राचीन गुरुकुल प्रणाली – भाग ३

शंकराचार्य

अंग्रेजों के आने के उपरांत यदि अंग्रेजी कदाचित शिक्षा का माध्यम नहीं होती तो अंग्रेज़ी शिक्षा के कुचक्र के पहले अंकुर माता पिता ही पल्लवित होने से रोक लेते, परंतु ऐसा हो न सका। इस विषय में अंग्रेज विद्वान एलफिंस्टन ने सन् १८२४ में शिक्षा पर अपनी रिपोर्ट में स्पष्टतः भारतीयों के लिए भारतीय भाषाओं व शिक्षा व्यवस्था पर बल दिया था।

लेकिन ग्रांट, वार्डन और मैकॉले जैसे अंग्रेज अधिकारी भारतीय जनता के हितचिंतक नहीं थे। इसलिए इन्होंने एलफिंस्टन के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। वहीं ऐसा प्रतित होता है कि भारत के राजा-महाराजा अपने निजी स्वार्थ की राजनीति में ही उलझे हुए थे जिसके कारण वे विदेशियों का यह षड्यंत्र नहीं समझ सके।

“भारत से ही वैश्विक सभ्यता की शुरुआत हुई थी। संस्कृत सभी यूरोपियन भाषाओं की माँ है। हमारा समूचा दर्शन संस्कृत से उपजा है। हमारा गणित इसकी देन है। लोकतंत्र और स्वशासन भी भारत से ही उपजा है।” विल डुरांट (1885-1981) जैसे विदेशी विद्वान भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर उक्त विचार रखते थे।

विल डुरांट अपनी पुस्तक “स्टोरी ऑफ़ सिविलाइजेशन” के लिए जाने जाते हैं। इन्होंने 1930 में एक पुस्तक लिखी थी ‘द केस फॉर इंडिया’। निष्पक्ष रूप से लिखी इस किताब में उन्होंने विस्तार से बताया कि भारत ब्रिटिश शासन से पहले कैसा था ? ब्रिटिशों ने कैसे भारत को लूटा और कैसे भारत की आत्मा की ही हत्या कर डाली ? संस्कृत के बारे में उन्होंने ऐसा क्यों कहा होगा ? ऐसा क्या पाया होगा कि उन्हें यूरोपियन भाषाओं की जननी संस्कृत में ही ऐसी क्षमता पाई। इसकी गहराई में जाकर हर भारतीय को जानना चाहिए।

हमारे निर्यात कारखाने एवं उत्पाद की कमर तोड़ने हेतु भारत में स्वदेशी वस्तुओं पर अधिकतम कर देना पड़ता था एवं अंग्रेजी वस्तुओं को कर मुक्त कर दिया गया था। कृषकों पर तो ९०% तक कर लगा कर फसल भी लूट लेते थे एवं “लैंड एक्विजिशन एक्ट” के माध्यम से सहस्त्रो एकड़ भूमि भी उनसे छीन ली जाती थी, अंग्रेजो ने कृषकों के कार्यों में सहायक गौ माता एवं भैसों आदि को काटने हेतु पहली बार कलकत्ता में कसाईघर चालू कर दिया, शर्म की बात है वह अभी भी चल रहा है।

सत्ता हस्तांतरण के दिवस (१५-८-१९४७ ) के उपरांत तो इस कुचक्र की गोरे अंग्रेज़ों पर निर्भरता भी समाप्त हो गई, अब तो इसे निर्बाधित रूप से चलने देने के लिए बिना रीढ़ के काले अंग्रेज भी पर्याप्त थे, जिनमें साहस ही नहीं है भारत को उसके पूर्व स्थान पर पहुँचाने का।

“दुर्भाग्य है कि भारत में हम अपने श्रेष्ठतम सृजनात्मक पुरुषों को भूल चुके हैं। इसका कारण विदेशियत का प्रभाव और अपने बारे में हीनता बोध की मानसिक ग्रंथि से देश के बुद्धिमान लोग ग्रस्त है” – भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ.कलाम, “भारत २०२० : सहस्त्राब्दी” में यह बात अपनी इस पुस्तक में कहते है।

आप सोच रहे होंगे उस समय अमेरिका यूरोप की क्या स्थिति थी, तो सामान्य बच्चों के लिए सार्वजानिक विद्यालयों की शुरुआत सबसे पहले इंग्लैण्ड में सन् १८६८ में हुई थी, उसके बाद बाकी यूरोप, अमेरिका में अर्थात जब भारत में प्रत्येक गाँव में एक गुरुकुल था, ९७ % साक्षरता थी तब इंग्लैंड के बच्चों को पढ़ने का अवसर मिला था। तो क्या पहले वहाँ विद्यालय नहीं होते थे ? होते थे, परंतु महलों के भीतर, वहाँ ऐसी मान्यता थी कि शिक्षा केवल राजकीय व्यक्तियों को ही देनी चाहिए बाकि सब को तो सेवा ही करनी है।

इन सब बातों की यहां चर्चा करने का उद्देश्य यह है कि हम गुरुकुल जैसी श्रेष्ठ शिक्षा व्यवस्था को अपनी लापरवाही, आपसी फूट व निष्क्रियता के कारण गवा चुके हैं। लेकिन क्या आज भी हम अपनी संस्कृति व शिक्षा की ओर ध्यान दे रहे हैं ? वर्तमान युग में यदि गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की बात की जाए तो सर्वोच्च स्थान गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय का है जो- भारत के उत्तराखण्ड राज्य के हरिद्वार शहर में स्थित है। इसकी स्थापना सन् १९०२ में स्वामी श्रद्धानन्दजी ने की थी। विश्वविद्यालय, हरिद्वार रेलवे स्टेशन से लगभग 5 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है।

लार्ड मैकाले द्वारा प्रतिपादित अंग्रेजी माध्यम की पाश्चात्य शिक्षा नीति के स्थान पर हिन्दी के माध्यम से भारतीय साहित्य, भारतीय दर्शन, भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के साथ-साथ आधुनिक विषयों की उच्च शिक्षा के अध्ययन-अध्यापन तथा अनुसंधान के लिए यह विश्वविद्यालय स्थापित किया गया था। लेकिन स्वतंत्रता के बाद हमने ऐसे गुरुकुल स्थापित करने की ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया।

हर बार नई शिक्षा नीति के नाम पर हम अपने ही गाल बजा लेते हैं लेकिन आज भी सारी शिक्षा व्यवस्था मैकॉले व उनके अनुयायी वामपंथियों की शिक्षा नीति व्यवस्था के आसपास ही घूम रही हैं। स्वाधीनता के बाद कितने शिक्षा मंत्री रहे और उनमें से शिक्षा व्यवस्था में किसने कितना योगदान दिया इसके पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध नहीं है।

क्या वर्तमान में प्राचीन भारतवर्ष की गुरुकुल शिक्षा जैसी सर्वश्रेष्ठ भारतीय शिक्षा प्रणाली की फिर कल्पना की जा सकती हैं ? हमारे शिक्षाविद व सरकार पुनः इस ओर विचार करे। क्योंकि नई शिक्षा व्यवस्था में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का थोड़ा-सा भी अंश नहीं दिख रहा है।

संदर्भ:-
१. श्रीमान अरुण डी. का आलेख से।
२. राजीव दीक्षित जी के भाषण से ।
३. संस्कृति के चार अध्याय- रामधारी सिंह दिनकर
४. सत्यार्थ प्रकाश- महर्षि दयानंद सरस्वती
५. गूगल व विकिपीडिया के स्त्रोत से

Featured Image: Gurukul of Shankaracharya – Raja ravi varma


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