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श्रीमद्भगवद्गीता- एक दृष्टिकोण


गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्रसंग्रहै:
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनि: सृता।।
(महाभारत, भीष्मपर्व अध्याय ४३/)

अर्थात गीता भली प्रकार मनन करके हृदय में धारण करने योग्य है, जो पद्मनाभ भगवान के श्रीमुख से नि:सृत वाणी है,फिर अन्य शास्त्रों के संग्रह की क्या आवश्यकता?

मानव सृष्टि के आदि में भगवान श्री कृष्ण के श्री मुख से नि:सृत अविनाशी योग अर्थात श्रीमद्भगवद्गीता जिसकी विस्तृत व्याख्या वेद और उपनिषद में है, उसी आदिशास्त्र को भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के प्रति पुनः प्रकाशित किया।

गीताका सार इस श्लोक से प्रकट होता है:-

एकं शास्त्रं देवकीपुत्र गीतम्
एको देव देवकीपुत्र एव।
एको मंत्रस्तस्य नामानि यानि
कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा।।
(गीतामाहात्म्य)

अर्थात एक ही शास्त्र है जो देवकीपुत्र कृष्ण ने श्री मुख से गायन किया,वह है गीता

गीता को आमतौर पर भगवद् गीताके रूप में ही जाना जाता है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन के विभिन्न क्षेत्रों पर उपदेश देते हैं, लेकिन यह पूर्णत: आश्चर्यजनक है कि भगवद्गीताके अतिरिक्त भी लगभग साठ प्रकार की गीताहमारी समृद्ध भारतीय परंपरा की अमूल्य धरोहर हैं। प्रत्येक की अपनी अलग ही सांस्कृतिक विरासत है और भक्त के हृदय में अपना एक विशिष्ट स्थान प्राप्त है। गीतावह गीत या कविता है जो सीधे मानव के हृदय तक मार्ग बनाती है। गीता में विद्या प्राप्त करने वालों के उत्सुक प्रश्नों के बारे में विद्वानों (जीवन्मुक्ति और अपरोक्षज्ञानियों) द्वारा दिए गए निर्देश या उत्तर हैं।

अठारह अध्यायों एवं सात सौ श्लोकों से सुसज्जित गीता को उपनिषद एवं ब्रह्मसूत्र के साथ ही प्रस्थानत्रयीमें स्थान प्राप्त है।

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।।
(गीता, १५/१०)

अर्थात इस प्रकार यह अति गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। इसे तत्त्वसे जानकर मनुष्य पूर्ण ज्ञाता तथा कृतार्थ हो जाता है अतः योगेश्वर श्रीकृष्ण की यह वाणी स्वयं में पूर्ण शास्त्र है।

सृष्टि का आदि शास्त्र गीता को ही कहा गया है।

इमं विवस्वते योगम् भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि इस अविनाशी योग को मैंने आरंभ में सूर्य से कहा, सूर्य ने इसे स्वयंभू आदि मनु से कहा अर्थात गीता ही आदि शास्त्र है जिसके अनुसार एक परमात्मा ही सत्य है और वह कणकण में व्याप्त है।

भगवान श्री कृष्ण की हजारों वर्ष के बाद जिन महापुरुषों ने एक ईश्वर को सत्य बताया, वे गीता के ही संदेश को आगे बढ़ाते रहे। ईश्वर से ही लौकिक एवं पारलौकिक सुख की कामना, ईश्वर से डरना, अन्य किसी को ईश्वर ना मानना;यहाँ तक सभी महापुरुषों ने बताया किंतु ईश्वरीय साधना, ईश्वर तक की दूरी तय करना यह केवल गीता के क्रमबद्ध ज्ञान से ही संभव है।

विभिन्न मतों में गीता अपने नवीन रूपों में स्थानस्थान पर प्रकट है, परंतु सबका आधार एक ही है।

योगेश्वर कृष्ण की कहीं बात को ही प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वभावजनित विचारों के अनुरूप ग्रहण करता है अतः मतभेद की संभावना को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।

वर्तमान में गीता पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है,सभी अपनी सत्यता का उद्घोष करते हैं परंतु इसके शुद्ध अर्थ से कोसों दूर हैं। कृष्ण एक योगीथे तथापि वे कोई अन्य नवीन सत्य नहीं बता रहे बल्कि ऋषिभिर्बहुधा गीतम्अर्थात् ऋषियों ने अनेकों बार जिसका गायन किया है वही कहने जा रहे हैं। श्री कृष्ण ने महापुरुषों द्वारा शोधित सत्य को ही उद्घाटित किया है।

गीता एक सार्वलौकिक,सर्वकालिक धर्मग्रंथ है। यह प्रत्येक देश, प्रत्येक जाति सबके लिए है। यह केवल दूसरों से सुनकर या किसी से प्रभावित होकर मनुष्य को पढ़ने के लिए नहीं है अपितु यह हृदय में जागृत होने वाला भाव है। केवल शब्द ज्ञान के आधार पर ही इसकी वाणी में निहित यथार्थ को नहीं परखा जा सकता। गीता को जानने के लिए इसके क्रियात्मक पथ से चलकर इस अपौरुषेय स्थिति को पाए जाने के उपरांत ही अपने आपको परमात्मा में विलीन करके समझा जा सकता है। वस्तुतः वेद अपौरुषेय है किंतु समयसमय पर उनका वाचन करने वाले अनेक महापुरुष ही थे और उन्हीं की वाणी का संकलन वेदकहलाता है। वेद के दो भाग हैंकर्मकांड और ज्ञान कांड। कर्मकांड समाजशास्त्र हैं, जैसेवास्तु शास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्वेद,गंधर्ववेद इत्यादि वही ज्ञान कांड उपनिषद है और उनका भी मूल योगेश्वर कृष्ण की प्रथम वाणी गीताहै। सारांश रूप में गीता अपौरुषेय परमात्मा से संबंधित उपनिषद सुधा का ही सार सर्वस्व है।

गीता- एक सार्वभौमिक सत्य

यह सार्वभौम है। गीता वह कसौटी है जिस पर प्रत्येक धर्म ग्रंथ में उपस्थित सत्य अनावृत्त हो उठता है। परस्पर विरोधी कथनों का समाधान निकल आता है। प्रत्येक धर्म ग्रंथ में संसार में जीवन यापन की कला और कर्मकांडो का बाहुल्य है। जीवन को आकर्षक बनाने के ढेरों उपाय हैं। कर्मकांडो की इसी परंपरा को हम धर्म समझने लगते हैं। गीता इस क्षणिक व्यवस्था से ऊपर उठकर आत्मिक पूर्णता को प्रतिष्ठित करने का क्रियात्मक अनुशीलन है। इसका प्रत्येक श्लोक भौतिक जीवन यापन के लिए नहीं बल्कि आंतरिक युद्ध की आराधना की मांँग करता है।यह उस अमरत्व की उपलब्धि कराता है जिसके बाद जन्म मृत्यु का बंधन कोई अर्थ ही नहीं रखता।

गीता एक युद्ध ग्रंथ है जो वास्तविक विजय दिलाता है किंतु गीता के युद्ध अस्त्रशस्त्र से लड़े जाने वाले सांसारिक युद्ध नहीं हैं, यह शतशत प्रवृत्तियों का संघर्ष है जिसके रूपात्मक वर्णन की सनातन परंपरा रही है। वेद में इंद्र और वृत्र, विद्या और अविद्या, पुराणों में देवासुर संग्राम, महाकाव्यों में रामरावण और कौरवपांडव के संघर्ष को ही गीता में धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र,दैवीय संपद् एवं आसुरी संपद्, सजातीय एवं विजातीय, सद्गुणों और दुर्गुणों का संघर्ष कहा गया है।

गीता का धर्मक्षेत्र

गीता का कुरुक्षेत्र कोई भूखंड नहीं बल्कि श्रीकृष्ण के शब्दों में – “इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। अर्थात हे कौन्तेय! यह शरीर ही एक क्षेत्र है जिसमें बोया हुआ भला और बुरा बीज संस्कार रूप में सदैव उगता है।

मानव क्षण मात्र भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता पुनरपि जननम् पुनरपि मरणम्, पुनरपि जननी जठरे शयनम् जन्म जन्मांतर से हम यही कार्य करते आए हैं और यही हमारा कुरुक्षेत्र है। सद्गुरु का मार्गदर्शन पाकर साधक जब परम धर्म परमात्मा की ओर अग्रसर होता है तब यह क्षेत्र धर्मक्षेत्र बन जाता है।यह शरीर ही कुरुक्षेत्र है।

गीता छन्दोबद्धहै, पूर्णत: व्याकरणसम्मत है; किंतु इसके सभी पात्र प्रतीकात्मक है।अमूर्त योग्यताओं के मूर्त रूप मात्र हैं। गीता के आरंभ में अनगिनत पात्रों के नाम लिए गए हैं, जिसमें कुछ पांडव पक्ष के और कुछ कौरव पक्ष के हैं परंतु अंत में एकमात्र अर्जुन ही ऐसे पात्र हैं जो योगेश्वर के समक्ष हैं। यहांँ अर्जुन केवल व्यक्ति विशेष ना होकर, मात्र योग्यता के प्रतीक हैं। गीता के आरंभ में अर्जुन सनातन कुलधर्म के लिए विकल है किंतु योगेश्वर कृष्ण ने इसे अज्ञान ही बताया और निर्देश दिया कि आत्मा ही सनातन है, शरीर नाशवान है इसलिए युद्ध करो। इस आदेश में यह कहीं स्पष्ट नहीं होता है कि अर्जुन कौरवों को ही मारें। पांडव पक्ष भी शरीरधारी ही थे, दोनों ओर संबंधी ही थे।जब यह शरीर नाशवान है, इसका अस्तित्व ही नहीं है तो अर्जुन कौन थे? कृष्ण किसकी रक्षा में खड़े थे?

कृष्ण ने कहा जो शरीर के लिए परिश्रम करता है वह पापायु मूढ़बुद्धि पुरुष व्यर्थ ही जीता है।

वस्तुत: अनुराग ही अर्जुन है।अनुरागी और स्नेही के लिए ऐसे दिव्य महापुरुष सदैव खड़े रहते हैं। अर्जुन एक समर्पित, विनयशील शिष्य थे, वहीं योगेश्वर श्री कृष्ण ज्ञानी सद्गुरु। अर्जुन ने स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर दिया और कृष्ण ने उन्हें स्वयं में समाहित। अर्जुन आर्त अधिकारी हैं, योगेश्वर कृष्ण एक सद्गुरु जो सदैव अपने अनुरागी शिष्य का मार्गदर्शन करने हेतु प्रतिबद्ध हैं।

गीता के ग्यारहवें अध्याय में योगेश्वर कृष्ण का विराट स्वरूप देख कृतज्ञ अर्जुन क्षमा याचना करने लगे। श्री कृष्ण ने क्षमा किया और याचना के अनुरूप सौम्य स्वरूप में आकर कहा,” हे पार्थ! मेरे इस स्वरूप को ना पहले किसी ने देखा है ना भविष्य में कोई देख सकेगातो क्या उस दर्शन की योग्यताएंँ अर्जुन तक ही सीमित रह गई थीं? जबकि उसी समय संजय भी देख रहे थे, तो संजय की योग्यता अर्जुन के समान थीं?

पहले भी उन्होंने कहा,” बहुत से योगीजन ज्ञानरूपी तप से पवित्र होकर मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।क्या कहना चाहते हैं मधुसूदन श्री कृष्ण?
यही कि अनुरागही अर्जुन है, जो आपके हृदय की विशेष भावना है‌। अनुरागविहिन मानव ना पूर्व में यह रूप देख सका, ना कभी भविष्य में देख सकेगा। मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा।
किएँ जोग जप ग्यान बिरागा।
(रामचरितमानस, /६१/)

अर्जुन मात्र एक प्रतीक है। बिना स्नेह अथवा अनुराग के भक्ति की योग्यता प्राप्य नहीं। गीता के पात्र प्रतीकात्मक हैं और यथास्थान इसका संकेत भी है।

माना कि योगेश्वर कृष्ण और समर्पित अर्जुन का अस्तित्व रहा था, निश्चय ही कुरुक्षेत्र सा कोई विश्वयुद्ध हुआ हो किंतु गीता में मात्र भौतिक युद्ध का चित्रण कदापि नहीं है क्योंकि उस ऐतिहासिक युद्ध के मुहाने पर अधीर एवं विचलित तो सिर्फ अर्जुन ही थे ना कि उनकी सेना; सेना तो युद्ध हेतु तत्पर ही खड़ी थी। क्या ही अंतर आ जाता किसी एक योद्धा की अनुपस्थिति से। परंतु गीता का उपदेश दे श्रीकृष्ण ने सव्यसाची अर्जुन को सेना के साथ धर्म की रक्षा योग्य बनाया।

वस्तुतः साधन लिखने से नहीं आता, ना ही प्रवचन सुनने एवं देने से आता है। सब कुछ पढ़ने के बाद भी उस मार्ग पर चलना शेष रहता है। अनुसरण आवश्यक है।

जब तक आप को प्रेरणा नहीं मिले आप उस मार्ग पर नहीं चल सकते और यही प्रेरणा गीता का मूल है।गीता के समापन पर जब संपूर्ण प्रश्न समाप्त हो गए तो जो प्रश्न अर्जुन नहीं कर सके थे अथवा जो उनके हित में थे, उन्हें भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं ही उठाया और उनका समाधान भी दिया। अंततः भगवान ने कहा, ” हे पार्थ! क्या तुमने मेरे उपदेश को एकाग्रचित्त हो श्रवण किया?क्या मोह से उत्पन्न तुम्हारा अज्ञान नष्ट हुआ?” अर्जुन ने कहा

नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव ।।
(१८/७३)

भगवन्! मेरा मोह नष्ट हुआ। मैं स्मृति को प्राप्त हुआ। मैंने मात्र श्रवण ही नहीं किया अपितु स्मृति में धारण कर लिया है। मैं आपके आदेश का पालन करूंँगा और युद्ध करूंँगा।

वे धनुष उठा लेते हैं,युद्धरत होते हैं, विजय प्राप्ति के पश्चात् एक विशुद्ध धर्म समाज की स्थापना करते हैं और गीता को धर्मशास्त्र के रूप में स्थापित करते हैं।

जहाँ वेद श्रवण योग्य हैं वहीं गीता स्मरण योग्य है। यह मानव मात्र को सनातन दर्शन,अविरत शांति,स्थिर समृद्धि, ऐश्वर्यसंपन्न जीवन प्रदान करने वाला ईश्वरीय गायन है।

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

इति!

संदर्भ:-

  • श्रीमद्भगवद्गीता (गीता प्रेस)
  • श्रीमद्भगवद्गीता टीका (स्वामी अड़गड़ानंद जी)
  • श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप (स्वामी प्रभुपाद जी)

 

(Image credit: dollsofindia.com)


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