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एक भिक्षुक से संवाद


महात्मा गांधी से संबंधित हर स्मारक पर अक्सर पर्यटकों का तांता लगा रहता है और उसमें भी विदेश से आने वाले लोगों के लिए महात्मा सदैव ही आकर्षण का केन्द्र रहे हैं। किन्तु आश्चर्यजनक रूप से इस बार बिरला हाउस में कोई भी विदेशी पर्यटक नहीं था।

अनेकों दिक्कतों के बावजूद कोविड महामारी का एक आश्वासन यह भी है कि दर्शनीय स्थलों पर भीड़ कम हो गई है। जब मैं दिल्ली में बिरला हाउस पहुंचा तब वहां भी गिनेचुने पर्यटक थे।

बिरला हाउस दिल्ली के इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण भाग है। महात्मा गांधी जब दिल्ली में होते तब हमेशा इसी भव्य भवन में रुकते। गाँधीजी ने अपने जीवन के अंतिम 144 दिन तीस जनवरी मार्ग पर स्थित इसी भवन में बिताए थे। प्रसिद्ध व्यापारी घनश्याम दास बिड़ला ने बारह कमरों वाले इस भवन का निर्माण 1928 में कराया था जिसे गांधी वध के कुछ वर्ष पश्चात भारत सरकार ने भारी कीमत चूका कर खरीद लिया। आज यह स्थान ‘गांधी स्मृति संग्रहालय’ के नाम से जाना जाता है।

स्मारक के विशालकाय खंडों में सुरक्षित रखे गए गाँधीजी से जुड़े साधनसामग्री देखने के बाद मैं बाहर उद्यान की ओर बढ़ा। महात्मा गांधी की जिस स्थान पर हत्या की गई थी उस स्थान पर एक स्तम्भ का निर्माण किया गया है।

मैं मग्न हो कर नज़दीकी तख्ती पर लिखी गई जानकारी पढ़ रहा था तभी मुझे शांत परिसर के बाहर से कोलाहल सुनाई दिया। बढ़ती जा रही नारेबाज़ी की आवाज़ों ने मेरा ध्यान उस ओर खींचा लेकिन जब मैंने पीछे मुड़कर देखा तो प्रवेश द्वार पर दृश्य बदल चुका था।

परिसर के प्रवेश द्वार पर खड़े वर्दी धारी सुरक्षाकर्मी गायब हो चुके थे और धातु से बने मजबूत प्रवेश द्वार के स्थान पर लकड़ी का फाटक नज़र आ रहा था। शोर का मुआयना करने मैं बाहर निकला तब देखा कि वहां खड़े कुछ दरिद्र फटेहाल लोग नारेबाज़ी कर रहे थे और पुलिसकर्मी उन्हें वहां से हटाने की जद्दोजहद में लगे हुए थे।

कुछ दूर बैठे भिक्षुक ने मुझे बताया कि यह लोग भारत के विभाजन से विस्थापित हुए बन्नू शरणार्थी थे। विभाजन के बाद पाकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों से आए शरणार्थी आए दिन यहां विरोध प्रदर्शन किया करते थे। उनके क्रोध का कारण विभाजन के बाद हिंदू तथा सिक्ख शरणार्थियों से गाँधीजी भेदभावपूर्ण रवैया था।

मैंने देखा तो उस भिक्षुक तथा वहां विरोध कर रहे सभी लोग खादी के कपड़े पहने थे। मैंने उससे पूछा कि “इन शरणार्थियों की समस्या के लिए महात्मा कैसे दोषी हो सकते हैं? महात्मा गांधी तो समस्त विश्व का कल्याण चाहते हैं।”

मेरी बात सुनते ही उस भिक्षुक ने अजीब व्यंग्यपूर्ण हास्य से मेरी ओर देखा और कहा “गाँधीजी बिरला भवन में भव्य कमरों में सोते हैं हैं और यह शरणार्थी खुले आसमान के तले दिल्ली में जनवरी की ठंड भोग रहे हैं। जो लोग यातनाएँ भोग रहे हैं, जिन लोगों का भविष्य सदा के लिए अंधकारमय हो गया है, उनका पक्ष जाने बिना किसी भी निष्कर्ष पर आना मूर्खता है।”

भिक्षुक की यह बात सुनकर मेरा लहज़ा थोड़ा नरम पड़ा। जब मैंने कारण पूछा तो वह बोला “स्वतंत्रता के बाद भारत के राजकोष से गाँधीजी 55 करोड़ पाकिस्तान को देने की ज़िद पर अड़े हैं। इसमें मजेदार बात यह है कि पाकिस्तान भारतीय कोष में हिस्सेदारी चाहता है किन्तु राष्ट्र पर जो ऋण है उसे बाँटना नहीं चाहता। न्यायपूर्ण व्यवहार यही होता कि इस रकम का उपयोग अपने घरबार छोड़कर भारत में शरणार्थी जीवन व्यतीत कर रहे इन लोगों के पुनर्वास में किया जाए। इन शरणार्थियों का मानना है कि महात्मा जी अपनी जिद से इस राष्ट्र को काफी हानि पहुंचा चुके हैं और अब गाँधीजी को राजनीति का त्याग कर हिमालय चले जाना चाहिए।”

भिक्षुक की यह बात सुनकर मैंने असहज होते हुए पूछा “जिन महात्मा गांधी ने इस राष्ट्र को स्वतंत्रता दिलाई उन्हीं से इतनी घृणा? क्यों?” वह मुस्करा कर बोला “आप कह रहे हैं कि गाँधीजी के कारण भारत स्वतंत्र हुआ है। क्या आप बता सकते हैं कि गाँधीजी के किस आंदोलन ने भारत को स्वतंत्रता दिलाई?”

मैं दो घड़ी सोच में पड़ गया। सन १९४२ में ’भारत छोड़ो आन्दोलन’ गाँधीजी का अंतिम अभियान था लेकिन वह तो एक वर्ष में ही समेट लिया गया था। मेरे मौन ने उसे मुझे और उलझाने का अवसर दे दिया। उसने कहा “इंग्लैंड के प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने अपने वक्तव्य में स्पष्ट कहा है कि द्वितीय विश्व युद्ध में आर्थिक रूप से कमजोर हो चुके अंग्रेज अब भारत जैसे बड़े भूभाग को नियंत्रित नहीं कर सकते इसलिए भारत को स्वतंत्र कर देना चाहिए।”

मैंने विरोध प्रदर्शित करते हुए कहा “अंग्रेजों के प्रधानमंत्री की बात हम क्यों मानें?”

तो तुम ही बताओ गाँधीजी का कौन सा आंदोलन सफल रहा? किस अभियान ने अंग्रेजी सत्ता की नींव हिलाई?”

उसके प्रश्न मुझे असहज कर रहे थे। बचपन से पढ़ाई जाने वाली ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ की मान्यता को अस्वीकार करने के लिए मेरा मन तैयार नहीं था।

उसने मुझे समझाते हुए कहा कि भारत में वकालत के असफल प्रयासों के बाद सन 1893 में गांधी वापस दक्षिण अफ्रीका लौट गए। वहीं उन्होंने रंगभेद के विरुद्ध अपने जीवन का पहला अहिंसक प्रतिवाद किया। इस समय दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासियों तथा अंग्रेजों के बीच कुछ समझौते कराने में गाँधीजी सफल भी रहे। इस घटना के बाद उन्होंने सोच लिया कि सभी वैश्विक समस्याओं का समाधान मात्र बातचीत से किया जा सकता है।”

भिक्षुक की इस बात ने मुझे सोचने पर बाध्य कर दिया। तथ्य यही है कि दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति सन 1994 तक जारी रही थी। वैश्विक विरोध के बाद दक्षिण अफ्रीका अपनी यह नीति समाप्त करने के लिए विवश हुआ था। हालांकि दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद गाँधीजी के मन ने ‘अहिंसा का सिद्धांत’ स्वीकार कर लिया था और इसी कारण उन्होंने सशस्त्र क्रांति कर रहे युवाओं को कोसना भी प्रारंभ कर दिया था।

आजाद, भगत सिंह और राम प्रसाद बिस्मिल के साथ उन्होंने राष्ट्र के पूज्य महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी तथा गुरु गोबिंद सिंह जी की भी भरपूर मात्रा में आलोचना की। क्या गज़नवी, ख़िलजी और औरंगज़ेब जैसे आततायिओं को मात्र बातचीत और हड़ताल से समझाया जा सकता था? क्या प्रताप, शिवाजी महाराज और गुरु गोबिन्द सिंह अहिंसा के मार्ग पर चल कर इनसे जीत सकते थे? सुभाष चंद्र बोस से गाँधीजी का वैचारिक मतभेद भी जगप्रसिद्ध है।”

उसकी बातें मेरे मन में घर कर चुके गाँधीवादी विचारधारा की जड़ें हिला रही थीं। किसी भी देश के लिए अपने सांस्कृतिक गौरव सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है लेकिन गाँधीजी तो खजुराहो जैसे कलात्मक स्थापत्यों को देश पर कलंक मानते थे और इन मंदिरों के विध्वंस की वकालत करते थे।

बिरला हाउस के प्रवेश द्वार से बन्नू शरणार्थियों को भगाया जा चुका था। विभाजन से सबसे अधिक प्रभावित हुए इन लोगों की पीड़ा अब मैं समझ चुका था। एक ओर जहां पाकिस्तान से हिंदू तथा सिक्ख नागरिकों को भगाया जा रहा था वहीं दूसरी ओर भारत में रहने वाले सांप्रदायिक लोगों को महात्मा गांधी ने अभय दान दे दिया था।

भिक्षुक ने बातों का सूत्र पुनः स्थापित करते हुए कहा कि चंपारण जैसे कुछेक आंदोलनों से उत्साहित गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन की घोषणा कर दी। गाँधीजी को पूर्ण विश्वास था कि बिना स्थानीय सहयोग के अंग्रेजी सत्ता कमजोर पड़ जाएगी और उन्हें भारतीयों की बातें माननी पड़ेंगी। गाँधीजी के कहने पर विद्यार्थियों ने पढ़ाई छोड़ दी, कर्मचारियों ने सरकारी नौकरियों में असहयोग का बिगुल फूंक दिया लेकिन इस आंदोलन से अंग्रेजों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।

डेढ़ वर्ष के आंदोलन से थक कर हतोत्साहित हो चुके गांधी ने फरवरी 1922 में चौरीचौरा में हुई छोटी सी घटना का बहाना बना कर देशव्यापी आंदोलन समाप्त कर दिया। स्वतंत्रता की आस में नौकरी और व्यवसाय छोड़ चुके नागरिक गाँधीजी के इस निर्णय के कारण ना घर के रहे ना घाट के।

सच तो यह भी है कि गाँधीजी असहयोग आंदोलन के दूरगामी परिणाम देख नहीं पाए। गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें आगाह किया था कि हड़ताल का शस्त्र दोमुंहा साँप है। सरकार के विरुद्ध हड़ताल के आदि हो चुके नागरिक स्वतंत्रता के बाद भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध सड़कें रोक कर बैठ जाएंगे तब उन्हें कैसे रोकेंगे।

मैं मन ही मन में सोच रहा था कि रवीन्द्रनाथ टैगोर की आशंका सही साबित हुई। स्वतंत्रता के पश्चात हुए अधिकांश आंदोलनों में कामचोरों की टुकड़ियों ने देश को बंधक बनाने का काम किया। इन दिनों हुए एंटीसीएए और तथाकथित किसान आंदोलन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

उसने कहा “पश्चिम में चल रहे ख़िलाफत आंदोलन में भी गाँधीजी ने देशवासियों को झोंक दिया जबकि यह आंदोलन किसी भी तरह से भारत के लाभ में नहीं था। महात्मा का मानना था कि इस आंदोलन में भाग लेने से समुदाय विशेष उनके पक्ष में हो जाएगा लेकिन यहां भी गाँधीजी बुनियादी भूल कर रहे थे।”

अब प्रश्न पूछने के बजाय उसके तर्कपूर्ण विश्लेषण को सुनने में मुझे अधिक रुचि थी। भिक्षुक यह समझ चुका था। उसने कहा कि जिन लोगों का खानपान ही हिंसा पर आधारित हो उनसे अहिंसा के सिद्धांतों पर चलने की उम्मीद रखना मूर्खता थी।‌ समुदाय विशेष के लोगों ने भी बारंबार यह प्रमाणित किया कि ख़िलाफत आंदोलन में गाँधीजी उनके साथ थे, वो गाँधीजी के साथ नहीं।

सन 1919 से 1924 तक चले ख़िलाफत आंदोलन के दौरान केरल में सन में 1921 मोपला नरसंहार हो गया। वहां लूटपाट, हत्या, बलात्कार और जबरन धर्मांतरण का नंगा नाच हुआ। लेकिन चौरीचौरा की एक छोटी सी घटना से आंदोलन समेट लेने वाले महात्मा ने कट्टरपंथियों की निंदा करने के बजाय उनकी ‘My brave Mopla brothers’ कह के प्रशंसा की।”

एक के बाद एक आंदोलन की परतें खुलती जा रही थीं और मैं स्तब्ध सोच रहा था कि आज तक इस तरह से हमें क्यूं नहीं बताया गया। आज हो रहे तुष्टिकरण की अतिशयोक्ति के मूल में ख़िलाफत आंदोलन ही था। अनजाने में ही महात्मा कामचोरी, तुष्टिकरण तथा हड़ताल जैसी समस्याओं के बीज बो रहे थे जो आज वटवृक्ष बन कर मुँह फाड़े देश के सामने खड़ी हैं।

भिक्षुक बोलते जा रहा था “इतनी विफलताओं के बावजूद गाँधीजी ने नमक पर लगाए गए कर का विरोध करने के लिए मार्च 1930 में दांडी यात्रा का आरंभ किया। दांडी मार्च के दौरान गांधीजी ने ऐलान किया कि कुत्तेकौवे की मौत मरना पसंद करुंगा लेकिन पूर्ण स्वराज लिए बिना वापस नहीं लौटुंगागाँधीजी ने इसे सविनय अवज्ञा आन्दोलन का नाम दिया। सहस्रों भारतीयों ने अंग्रेजों की लाठियाँ खाईं। कितनों को जेल में ठूंस दिया गया लेकिन यह सब बलिदान व्यर्थ गया।”

गोलमेज सम्मेलन का कारण बता कर गाँधीजी ने यह आंदोलन समाप्त कर दिया। उन्होंने कहा कि गोलमेज सम्मेलन में वह भारत की स्वतंत्रता की चर्चा करेंगे किन्तु इंग्लैंड में इस विषय पर चर्चा ही नहीं हुई। इस तरह से यह आंदोलन भी बिना किसी निष्कर्ष समाप्त हुआ। अंग्रेजों ने नमकटैक्स कभी खत्म नहीं किया। 1946 में नेहरू की अंतरिम सरकार बनने तक भारतीय यह टैक्स चुकाते रहे।”

भारत में स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र और अहिंसक आंदोलन समांतर चल रहे थे। हमें आज तक यही पढ़ाया जाता रहा कि साबरमती के संत ने बिना खड्ग बिना ढाल हमें स्वतंत्र कराया। स्वतंत्रता की बलि वेदी पर लाखों हुतात्माओं ने अपने रक्त का अभिषेक किया लेकिन वह किस्से कभी गाथा नहीं बन पाए।

विचारों का प्रवाह नदी की धारा समान बहता जा रहा था। तर्कों की कसौटी पर इतिहास का विश्लेषण करने के लिए भी दूसरा पक्ष जानना आवश्यक होता है लेकिन यह दूसरा पक्ष कभी सामने ही नहीं आ पाया।

मोबाइल फोन के रिंगटोन से मेरे विचारों का प्रवाह रुका। जेब से फोन निकाला तब तक मैं समय रेखा पर यात्रा कर सन 1948 से वापस सन 2021 में लौट आया था। सामने बिरला हाउस था।

मैंने अनुभव किया कि वह भिक्षुक 1948 में जहाँ था, आज भी उसी स्थान पर है। यदि कोई उसे ढूंढेगा तो वह उसे अवश्य ही मिलेगा। अगर आप सुनना चाहेंगे तो वह अपनी कहानी भी सुनाएगा।

कल गांधीजी की पुण्यतिथि है। महात्मा गांधी ने अपना जीवन सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को प्रतिपादित करने में लगा दिया था। उनके आंदोलनों का प्रामाणिक विश्लेषण ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

संदर्भ

1. Mahatma Gandhi: The Last Phase (1958) by Pyarelal
2.
End of an Epoch (1962) by Manu Gandhi
3.
The Men Who Killed Gandhi By Manohar Malgonkar
4.
गांधी वध : क्यों? – नथुराम गोडसे
5.
International Encyclopedia of the First World War

(Image credit: india.com)


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