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प्राचीन भारत के गणितीय ख़ज़ाने – प्रथम भाग

भारतीय गणित

प्राचीन भारत के गणितीय ख़ज़ाने सलिल सावरकर द्वारा लिखित एक नयी शृंखला है जो हमारे देश की सम्पन्न गणितीय परंपरा की हमसे पहचान कराती है, उसी शृंखला का यह प्रथम भाग है। 

बहुभिर्प्रलापैः किम्, त्रयलोके सचराचरे। यद् किंचिद् वस्तु तत्सर्वम्, गणितेन् बिना न हि ॥ – महावीराचार्य
(बहुत प्रलाप करने से क्या लाभ है ? इस चराचर जगत में जो कोई भी वस्तु है वह गणित के बिना नहीं है / उसको गणित के बिना नहीं समझा जा सकता)

भारत के गौरवशाली अतीत का वर्णन करने वाले लेखों की एक श्रृंखला लिखने के लिए किसी को भी सशक्त तर्क की आवश्यकता होगी। इस तरह के लेखों के लेखक को गहन आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता होती है, और “अतीत की महिमा को दर्शाने के लिए क्या कारण हो सकते हैं” ऐसे प्रश्न पूछने पड़ते हैं। अब तक बीत चुके समय में वापस जाने के लिए कोई साधन विकसित नहीं हुआ है। टाइम मशीन, आज भी, एक कपोल कल्पना है, जो केवल काल्पनिक पुस्तकों और मूवीज़ में उपयुक्त है। हम बीते समय में वापस नहीं जा सकते, न ही हम उस मृत अतीत को वर्तमान में ला सकते हैं। इसलिए ये प्रश्न स्वाभाविक है कि हम कोई भी शोधकार्य क्यों करें जो भले ही बुनियादी स्तर पर पुरातन पाण्डुलिप्पियों में कुछ ऐसा ढूँढने वाला हों जो हमारे पूर्वजों के स्मरणीय कार्यों का व्याख्यान करती हों।

क्या हम अपने पूर्वजों को परम ज्ञानी के रूप में चित्रित करने की कोशिश कर रहे हैं? क्या हमें लगता है कि प्राचीन भारत वास्तव में एक सर्वोच्च तकनीकी शक्ति था? क्या यह वास्तव में हमारा दृढ़ विश्वास है कि संपूर्ण आधुनिक ज्ञान / विज्ञान, जो पश्चिमी देशों से हमारे द्वारा प्राप्त किया गया है, पूरी तरह से भारतीयों को ज्ञात था? और क्या यह वास्तव में ऐसा है, कि पिछले समय में हमारे विमान नष्ट कर दिए गए थे, टेस्ट ट्यूब तोड़े गए थे, और कंप्यूटर वायरस से भर दिए गए थे जिसने इस सारे तकनीकी ज्ञान और कौशल को मिटा दिया?
उदाहरण के लिए ऋग्वेद में ईंधन रहित विमान की चर्चा है –

अनेनो वो मरुतो यामो अस्त्वनश्वश्चिद्यमजत्यरथी: । अनवसो अनभीशू रजस्तूर्वि रोदसी पथ्या याति साधन्।। – ( ऋग्वेद 6 । 66 । 7 )

इस तरह के सवाल रुचिकर हैं और इस धरती पर पैदा हुए व्यक्ति को इनमें से प्रत्येक को सकारात्मक रूप से स्वीकारना पसंद है, क्योंकि हमारे गौरवशाली अतीत के बारे में सोचकर प्रत्येक व्यक्ति उच्च और उन्नत महसूस करता है। हर व्यक्ति के दिमाग में एक प्राकृतिक विचार कौंध जाता है कि यदि हमारे पूर्वज विद्वान थे, तो उनकी विरासत ने हमें भी विद्वान बना दिया होगा!

यह लगभग स्वीकृत तथ्य है कि हमारे विश्वविद्यालयों को तोड़ दिया गया था और ग्रंथों को जला दिया गया था। जो लिखित ग्रंथ खो गये हैं उसमें अनमोल ज्ञान हो सकता है, लेकिन अब उनके अंशों का केवल अनुमान लगाया जा सकता है, ये सिद्ध नहीं हो सकते हैं, जब तक कि… जब तक कि एक अलग जगह पर कुछ नई खुदाई सतह पर पुरानी पांडुलिपियां नहीं ढूँढ लाती है, या कुछ विदेशी विश्वविद्यालय इसे स्वीकार करते हैं कि उनके पास पुरानी भारतीय ज्ञान से भरी पुस्तकों का एक बड़ा संग्रह है, या एक विद्वान व्यक्ति उपलब्ध संस्कृत छंद की गूढ़ व्याख्या करता है, और उनमें छिपे संदेशों पर प्रकाश डालता है। जब तक ऐसा नहीं होता है, तब तक भारतीयों का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ हमारे स्वर्णिम अतीत को ही देखता रहेगा , साथ ही अन्य संस्कृतियों और देशों को दोष देता रहेगा, हमारे ज्ञान से भरे शास्त्रों को लूटने और हमारे संस्थानों को गिराने के लिए।

यह लगभग एक निस्संदेह तथ्य है कि कुछ वैज्ञानिक गणनाओं व गणितीय परिणामों का एक समूह, भारतीयों को ज्ञात था; और यह कि उन नियमों का व्यावहारिक उपयोग किसी ना किसी तरह से किया गया था, वर्षों के लिए, वास्तव में, कई शताब्दियों के लिए। यहां तक कि यूरोपीय विद्वानों ने भी माना है कि मूलभूत गणित और मौलिक विज्ञान का एक बड़ा हिस्सा भारतीयों को पता था। पश्चिमी विद्वानों की इस स्वीकारोक्ति ने कई भारतीयों के मन में एक विचार पैदा कर दिया है और वे दावा करते रहे हैं कि सम्पूर्ण आधुनिक विज्ञान भारतीयों को ज्ञात था और तथाकथित आधुनिक विज्ञान में हमारे लिए कुछ भी “आधुनिक” नहीं है।

हालाँकि, लेखक का इस मोड़ पर उद्देश्य कुछ कहना या हासिल करना नहीं है। उसका लक्ष्य सरल है। कोई भी गलत या असाधारण दावा नहीं किया जाएगा। हालाँकि उसी समय, लेखक भारत के शानदार अतीत के तथ्यों और आंकड़ों को उभारने से भी नहीं बचना चाहता। इस श्रृंखला का पूरा विचार आम भारतीयों को अपने पूर्वजों के प्रखर कार्य से अवगत कराना है, जिससे उनके मन में उचित गर्व की भावना पैदा हो; जो उन्हें नए विचारों को बनाने और विकसित करने की नई चुनौतियों के लिए प्रेरित कर सके। जैसा कि जब भी हम नोबेल पुरस्कार विजेताओं या फील्ड्स मेडल विजेताओं या एबल पुरस्कार विजेताओं की सूची से गुजरते हैं, तो सदैव हमें इन सूचियों में
नगण्य भारतीयों के नाम देख कर केवल निराशा और मायूसी के सिवा कुछ नहीं मिलता।

हालाँकि, यह ध्यान देने योग्य है कि दशमलव प्रणाली पूरी दुनिया को हमारा योगदान है। शून्य की अवधारणा एक और मील का पत्थर है, जिसे भारतीयों ने हासिल किया है। ध्यान दें कि यह किसी भी वस्तु के गैर-मौजूद होने का प्रतीक नहीं है! गैर-अस्तित्व की पहचान करना और फिर उसे एक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना और इस तरह इसे अस्तित्व में लाना हमारे पूर्वजों की उच्च सोच का एक प्रतीक है! दशमलव संख्या प्रणाली ने न केवल संख्याओं के लेखन को सरल बनाया, इसने गणनाओं को भी सरल बनाया। और फिर भारतीयों को शून्य पर इन कार्यों के परिणामों के बारे में पता था। यद्यपि भारतीय गणना में बहुत सक्षम थे, लेकिन वे मूर्खतापूर्ण भूलों से भी अवगत थे, जो कि दिग्गजों से भी हो सकती हैं; और जिसके परिणामस्वरूप, उन्होंने परिणामों के मिलान या प्रति परीक्षण (टैली) करने के तरीके विकसित किए।

हमारे पूर्वजों को नकारात्मक संख्या और उनकी व्यावहारिक जरूरतों के बारे में भी अच्छी तरह से पता था। जबकि एक शुद्ध गणितज्ञ सिर्फ गणितीय वस्तुओं के रूप में नकारात्मक संख्याओं को स्वीकार करेगा, जिस तरह से उन पर मूलभूत संचालन किया जा सकता है और अधिक परिणाम बनाने से आगे बढ़ेगा, यह समझना चाहिए कि एक सामान्य व्यक्ति के लिए, नकारात्मक संख्याओं का विचार अज्ञेय और अथाह है जिसे समझना कठिन है।

ऐसा लगता है कि आम आदमी की इस कठिनाई को ध्यान में रखते हुए, भारतीयों ने क्रमशः सकारात्मक और नकारात्मक मात्रा के लिए लाभ और हानि जैसी शब्दावली का उपयोग किया। गणित में शून्य से विभाजन एक गंभीर बात है और आज भी, यह गणना नियम विरुद्ध है। हमारे पूर्वज शून्य की इस गंभीर समस्या के बारे में जानते थे और इसलिए, उनमें से कुछ ने इस गणना से खुद को दूर रखा, जबकि अन्य ने इस बारे में सिर्फ़ चर्चा की। यह ध्यान देने योग्य है कि उन्होंने सावधानीपूर्वक इस विभाजन का कोई परिणाम नहीं लिखा।

“कुछ नहीं या अभाव” को नाम दिया गया था और भारतीयों द्वारा उसे शून्य के रूप में पहचाने जाने की कोशिश की गई थी। दूसरे चरम पर, भारतीयों ने भी “सब कुछ या समस्त” को पहचानने की कोशिश की। कई विद्वानों ने यह साबित करने की कोशिश की है कि प्रसिद्ध शांति मंत्र अनंत की ओर ही हमें इंगित कर रहा है –

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते पूर्णश्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

एक शुद्ध गणितज्ञ आमतौर पर सटीकता प्राप्त करने की कोशिश करता है, हालांकि, कई बार, सटीक उत्तर प्राप्त करना संभव से परे है। व्यावहारिक गणितज्ञ इस सीमा के बारे में जानते हैं, और इसलिए वे अनुमानित उत्तर स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, और कम से कम लगभग सही उत्तर पाने के लिए तरीके विकसित कर रहे हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि यह दृष्टिकोण, हालांकि व्यावहारिक है, कहीं भी नया नहीं है। भारतीयों को इस समस्या के बारे में एक स्पष्ट विचार था और हम भारतीय गणित के इतिहास में कई मौके पाते हैं, जहाँ कुछ प्रश्नों के “लगभग सही” उत्तर दिए गए हैं, और फिर लोग इस “लगभग शुद्धता” के बारे में पूरी तरह से जागरूक थे। गणितज्ञों ने संख्याओं के मान (या मानों को खोजने के लिए सूत्र) दिए हैं, जैसे कि पाई और २ का वर्गमूल, जो उनके सटीक मूल्य के बहुत अच्छे अनुमान हैं। आर्यभट्ट ने आर्यभट्टीयम में लिखा है-

चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्त्राणाम्। अयुतद्वयस्य विष्कम्भस्य आसन्नौ वृत्तपरिणाहः॥

गणना की नियंत्रण ने भारतीयों को कई नए क्षेत्रों का पता लगाने का नेतृत्व किया, जो एक प्रमुख क्षेत्र खगोल विज्ञान है! इस देश के कुछ महान गणितज्ञों के संस्कृत छंदों के माध्यम से हमें पता चलता है कि उन्होंने पृथ्वी की त्रिज्या का पता लगाने का प्रयास किया था, और एक संख्या तक पहुंचने में सफल रहे, जो वास्तव में बहुत सटीक है! उनकी विधियों या उनके तरीकों के पीछे के तर्क की प्रशंसा करते हुए या उनके व्यापक प्रयास जो त्रिज्या को खोजने में चले गए को सराहने के पश्चात भी किसी को भी इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि इस तरह के प्रयास पृथ्वी के बारे में हमारी समझ को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं;कि सदियों से हम जानते हैं कि पृथ्वी गोल है ना कि सपाट।

मृदम्ब्वग्न्यनिलाकाशपिण्डोऽयं पाञ्चभौतिकः। कपित्थफलवद्वृत्तः सर्वकेन्द्रेखिलाश्रयः ॥
स्थिरः परेशशक्त्येव सर्वगोऴादधः स्थितः । मध्ये समान्तादण्डस्य भूगोलो व्योम्नि तिष्ठति ॥

खगोल विज्ञान का अध्ययन भारतीयों द्वारा बड़े पैमाने पर किया गया था और उन्हें सौर और चंद्र ग्रहणों, ग्रहणों के समय और प्रकार के बारे में निश्चित विचार था! यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि ‘सहस्र-चंद्र-दर्शन’ नामक एक विशिष्ट अनुष्ठान यहां पिछली कई सदियों से किया जा रहा है, और यह विशेष रूप से कहा जाता है कि इस तरह के अनुष्ठान को तब देखा जाना चाहिए जब कोई व्यक्ति 80 वर्ष में प्रवेश करता है (अर्थात, 79 वर्ष को पूरा करने के बाद!), इस अवधि के रूप में एक व्यक्ति ने निश्चित रूप से एक ‘नव चन्द्रोदय’ देखा है, एक हजार बार! इन गणनाओं को करने में, सभी संभावित चंद्र ग्रहणों को भी ध्यान में रखा गया है। इस प्रकार, केवल ग्रहण से डरने के अलावा और सूर्य व चंद्रमा को खाने की कोशिश करने वाले राक्षसों की कुछ दन्तकथाओं का निर्माण करते हुए भी, भारतीयों ने खगोल का अध्ययन किया और प्रकृति के सरल नियमों के साथ आए, जिसके कारण ये ग्रहण निर्मित होते हैं।

हमारे पूर्वजों के प्रयासों का एक विस्तृत अध्ययन स्पष्ट रूप से दिखाता है कि हमें कई आधुनिक गणितीय अवधारणाओं का ज्ञान था, जैसे कि बाइनरी नंबर, पास्कल ट्रायंगल, फाइबोनैचि अनुक्रम, पाइथागोरस का प्रमेय, पाइथागोरस ट्रिपल, द्विपद सिद्धांत, प्रगति, अनंत श्रृंखला, त्रिकोणमिति, वेलेम्स। विभिन्न साइन और कोस के कोणों,वियोजन , संयोजन, और कैल्क्युलुस का भी! इस कहानी का एक और दिलचस्प हिस्सा यह है कि उन्होंने मनोरंजक गणित जैसे मैजिक स्क्वेर, किसी नंबर का डिजिटल योग पर भी काम किया!

गणित की पढ़ाई क्यों करें? आज की तकनीकी रूप से उन्नत दुनिया में गणित का क्या स्थान है? ये दो प्रश्न महत्वपूर्ण हैं और पिछले कई वर्षों से गणितज्ञों और शिक्षाविदों या शिक्षाविदों के समुदाय द्वारा उत्तर दिया जा रहा है। गणित के महत्व पर बल दिया जा रहा है और इसलिए लेखक इस प्रश्न का उत्तर देने से बचना चाहेंगे। दूसरे प्रश्न के लिए, हमारे पूर्वजों ने जो कहा है, उसे उद्धृत करना बेहतर है:

यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा ।
तथा वेदाङ्गशास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम् ॥

अर्थात् जैसे मोरों के शरीर में शिखा और नागों में मणि का स्थान सबसे उपर है, वैसे ही सभी वेदांग और शास्त्रों मे गणित का स्थान सबसे उपर है ।

This article was first penned by Salil Sawarkar in English and was published here. It has been translated into Hindi by Krishnanand Gaur.


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