प्राचीन भारत के गणितीय ख़ज़ाने- चौथा भाग

सूर्य और अन्य ग्रहों जैसे बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि के लिए आर्यभट्ट द्वारा प्राप्त व्यास आधुनिक विज्ञान द्वारा प्राप्त वास्तविक दूरी से बहुत दूर हैं। इन सभी गणनाओं को करने में उनकी कुछ मान्यताओं और उनकी इसमें असफलताओं के कारणों का अभी भी पूरी तरह से पता नहीं है। हमें उसकी विधि को पूरी तरह समझने के लिए गहरी विवेचना करने की आवश्यकता है।

प्राचीन भारत के गणितीय ख़ज़ाने- तीसरा भाग

(प्राचीन भारतीय के गणितीय खजाने, सलिल सावरकर के लेखों की एक नई श्रृंखला है, जो हमारे देश की समृद्ध गणितीय विरासत की हमसे पहचान कराती है। पहला भाग और दूसरा…

प्राचीन भारत के गणितीय ख़ज़ाने – दूसरा भाग

प्राचीन भारत के गणितीय कोश सलिल सावरकर द्वारा लिखित शृंखला है जो हमारे देश की सम्पन्न गणितीय परंपरा की हमसे पहचान कराती है, उसी शृंखला में दूसरा भाग अब प्रस्तुत है।…

भारतीय गणित

प्राचीन भारत के गणितीय ख़ज़ाने – प्रथम भाग

प्राचीन भारत के गणितीय ख़ज़ाने सलिल सावरकर द्वारा लिखित एक नयी शृंखला है जो हमारे देश की सम्पन्न गणितीय परंपरा की हमसे पहचान कराती है, उसी शृंखला का यह प्रथम…