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कृष्णसाक्षी

"जब हम एक महिला के जीवन को लिखते हैं, ऐसी स्वीकृत मान्यता है, कि कथा में क्रिया की, गति की माँग के विकल्प के रूप में प्रेम को स्थापित किया जाए। एक कवि के अनुसार , प्रेम ही महिला का सम्पूर्ण अस्तित्व है।"- प्रसिद्ध लेखिका वर्जिनिया वूल्फ अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'ऑर्लैंडो ' में लिखती हैं।  यह कटाक्ष है और सत्य भी। महिलाओं की मुक्ति का संघर्ष ही इसी निष्क्रियता की परिधि से बाहर क्रियात्मकता की आकाश में उड़ने का है।  लेखिका प्रत्याशा नितिन की पुस्तक कृष्णसाक्षी नायिका साक्षी के इसी संघर्ष की कथा है।

वर्तमान में ऐसी कथाओं की बाढ़ सी है जिनमे एक स्पष्ट क्षणभंगुरता का भाव है। उन्हें लिखा भी विचारशून्यता के साथ जाता है और पढ़ा भी उसी विचारशून्यता के साथ जाता है। मेरा मानना है कथा की सफलता इसमें निहित होती है कि वह अपने भीतर एक विचार दर्शन को लेकर चलती है, जो परोक्ष भी होती है प्रत्यक्ष भी। इस दृष्टि से प्रत्याशा का यह प्रयास सफल होता है, क्योंकि एक कसी हुई, बाँधने वाली कहानी के पीछे एक जीवन दर्शन निहित है।  यह कलम की कुशलता है कि एक विचार दर्शन के प्रति ईमानदार रहने के बावजूद कथा कहीं भी नीरस नहीं होती है।  

कथा के प्रत्यक्ष में विवाहित जीवन में शारीरिक एवं मानसिक क्रूरता और मैरिटल रेप जैसा विवादित और संभवतः इसी कारण से सामयिक एवं साहसिक विषय है, कथा के परोक्ष में कर्मशीलता और भाग्यवाद के मध्य का दार्शनिक संघर्ष है।  कथा के प्रारम्भ में साक्षी, पति के द्वारा पारिवारिक हिंसा से प्रताड़ित महिला है जो जीवन से हताश है, और एक मायने में अपने जीवन की विफलता को तय मान कर उसके साथ समझौता कर चुकी है।  कानपूर महानगर के विस्तार के बाहर एक मंदिर में वह अपने प्रश्नों के साथ कृष्ण के समक्ष पहुँचती हैं।  उसके विचार में एक स्पष्ट पराजय का भाव है, और ईश्वर के प्रति एक उलाहना है। साक्षी स्वयं को नास्तिक मानती है।  यह एक आधुनिक कथा के आधुनिक चरित्र का आधुनिक भाव है। ऐसा हम बहुधा अपने आस पास देखते हैं कि एक आधुनिक स्वीकार्यता के नाते हम स्वयं को नास्तिक तो घोषित कर देते हैं, परन्तु कठिन समय में उसी ईश्वर से, जिसका अस्तित्व हम नकारते हैं, प्रश्न पूछना नहीं छोड़ते।  पंडित जी जो साक्षी को मंदिर में शरण देते हैं, और साक्षी जो ईश्वर से रुष्ट है, दोनों में हम एक विचित्र विश्वास, किन्तु दो भिन्न धाराओं की भक्ति देखते हैं। जहाँ मंदिर के पुजारी की भक्ति संभवतः दास्य भाव की है, साक्षी की भक्ति साख्य भाव की है जहाँ भगवान दुर्भाग्य से जूझते नितांत अकेले मनुष्य के लिए सखा और साथी हो जाते हैं।  मनुष्य के वैचारिक संतुलन की धुरी विश्वास पर है , और जब विश्वास की हर अपेक्षा अनुत्तरित रह गयी रह गयी हो, जैसे साक्षी पति, पिता और परिवार से निराश हो जाती है तो ईश्वर में वह विश्वास की धुरी पाती है।  

पति मनीष, जो पत्नी को एक विजित भोग्या केरूप में देखता है, से छूट कर निकली साक्षी, पिता के द्वारा त्यागे जाने के बाद, एक छह माह का समझौता करती है। मनीष इस कथा में खलनायक है दानव, वह एक त्रुटिपूर्ण व्यक्तित्व से अभिशप्त एक पुरुष है जिसमे पति हो पाने की सम्वेदना नहीं है। एक अहँकार में वह साक्षी को छह महीने का समय देता है, इस विश्वास के साथ कि एक निरीह नारी अंततः अपनी अक्षमता को समझ कर पराजित, हताश हो कर परतंत्रता की स्वीकृति के साथ लौटेगी। संभवतः मनीष भी साक्षी में वही भाग्यवादिता देखता है जो पाठक देखता है, जहाँ साक्षी गिरधर को उलाहने तो देती है परन्तु स्वयँ कुछ करने को तैयार नहीं है।  संयोगवश, साक्षी के दफ़्तर में भी इसी समय परिवर्तन होते हैं, और उसकी कंपनी का अधिग्रहण, दो भाइयों - आदित्य एवँ अचिन्त्य के प्रकाशन, बोध प्रकाशन के द्वारा हो जाता है। बड़ा भाई आदित्य, जो बोध प्रकाशन का संस्थापक है, अविवाहित है, और अचिन्त्य, अत्याभिलाषी एवं महात्वाकांक्षी सुपर्णा से संभावित तलाक की स्थिति से गुज़र रहा है। साक्षी इनके निकट होती है, और छह महीने के अंत में किसके साथ जुड़ती है, मनीष, आदित्य या अचिन्त्य के साथ, यह मैं पाठकों के लिए छोड़ता हूँ। एक पक्ष जो इस कथा में छूटा हुआ मुझे जान पड़ा, वह साक्षी का कार्यक्षेत्र है। इस पक्ष पर अधिक प्रकाश होने के कारण साक्षी के स्वाभिमान का सन्दर्भ प्रभावपूर्ण रूप से स्थापित नहीं होता है।  साक्षी तो किसी से कार्यक्षेत्र में टीम लीड होने के बावजूद बात चीत करती दिखती है, उसकी कार्यक्षमता पर कुछ लिखा गया है।  एक शक्तिशाली महिला नायिका के रूप में चित्रित होने के प्रक्रिया में यह अभाव खलता है, एवं साक्षी को कुछ हद तक पुरुष पात्रों पर निर्भर बताता है, चाहे मनीष हो, पंडित जी हों या अचिन्त्य और आदित्य हों। सम्भवत: यह साक्षी के व्यक्तित्व का वह पहलू है जो उसे गिरधर को उलाहना देने को कृष्ण की कर्मशीलता से अधिक प्रेरित करता है। संभवतः साक्षी के व्यक्तित्व की यही रिक्ति उसे पति की प्रताड़ना को निर्विरोध स्वीकार करने को बाध्य करती रही हो। कई बार पात्र कथा के अनुरूप तो होता है, पाठक के नहीं। इस पर प्रश्न नहीं किया जा सकता है और यह लेखक का अधिकार है। बहरहाल, पारिवारिक जीवन के क्षेत्र में साक्षी कृष्णसाक्षी बन कर अंततः परतंत्रता की उस परिधि से बाहर निकल पाती है जिसके बंधन में यह कथा प्रारम्भ होती है। कथा आधुनिक परिपेक्ष्य में है, सामयिक है,और पाठक को अपने साथ जोड़े रखती है और अंत तक पाठक साक्षी के संघर्ष में खुद को हिस्सेदार पाता है, जो कि मेरी दृष्टि में लेखिका की कुशल लेखनी का सूचक है। भाग्यवादिता के भार में दबी निरीह महिला के क्रियाशील आत्मविश्वास की यह यात्रा अत्यंत पठनीय है।  दूसरी ओर आज जब मानसिक अवसाद, अकेलापन जैसे प्रश्न महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं, ऐसे में एक सम्बल के रूप में धर्म की भूमिका पर एक गूढ़, अप्रत्यक्ष चिंतन इस पुस्तक को आम लेखन से भिन्न करता है।  इस में वैज्ञानिक एवं दार्शनिक, ब्लेज़ पास्कल का ईश्वर के सन्दर्भ में वह दर्शन ध्यान आता है कि यदि ईश्वर नहीं है तो भी एक तार्किक व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि ईश्वर को अविष्कृत किया जाए। कथा के परिपेक्ष्य से भिन्न एक दार्शनिक वक्तव्य जो इस कथा में निहित है, इस पुस्तक को केवल पढ़ने योग्य वरन संकलित करने योग्य बनाता है।

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